-Friday World** January 15, 2026
पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर पहुंच गया है। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध जैसी स्थिति बन चुकी है, जहां वॉशिंगटन से तेहरान को लगातार सैन्य हमले की धमकियां मिल रही थी। ट्रंप प्रशासन सख्त कार्रवाई की बात कर रहा था। लेकिन इसी बीच एक ऐसा विकल्प सामने आया है, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया है।
सऊदी अरब-ईरान अब एक साथ खड़े नजर आ रहे हैं।
सऊदी अरब का ईरान को स्पष्ट संदेश: हमारी जमीन और हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं होगा सऊदी अरब ने ईरान को सीधे आश्वासन दिया है कि वह अमेरिका या किसी अन्य देश को ईरान पर हमला करने के लिए अपनी जमीन या एयरस्पेस का इस्तेमाल नहीं करने देगा। एएफपी की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी सैन्य सूत्रों ने बताया कि रियाद ने तेहरान को स्पष्ट कर दिया है
– "हम किसी भी सैन्य कार्रवाई का हिस्सा नहीं बनेंगे और हमारी जमीन या हवाई क्षेत्र से ईरान पर हमला नहीं होगा।"
यह फैसला बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि मध्य पूर्व में अमेरिका के कई बड़े सैन्य अड्डे हैं, जिनमें से कुछ सऊदी अरब में स्थित हैं। जैसे प्रिंस सुल्तान एयर बेस, जहां पैट्रियट मिसाइल सिस्टम और अन्य हथियार तैनात हैं। अमेरिका के लिए ईरान पर हमला करने का सबसे छोटा और आसान रास्ता सऊदी एयरस्पेस से गुजरता है।
अब इस रास्ते पर पूरी तरह ताला लग गया है, जिससे अमेरिकी ऑपरेशन की रणनीति बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।
लेकिन फिलिस्तीन-इजरायल संघर्ष और अमेरिका की इस्लामोफोबिया वाली नीतियों ने इन पुरानी दुश्मनियों को पीछे धकेल दिया है।
इजरायल-अमेरिका की 'गंदी राजनीति' के खिलाफ मुस्लिम दुनिया में एकता की लहर उठ रही है। गाजा युद्ध के दौरान भी शिया और सुन्नी गुट एक साथ खड़े दिखे थे। अब सऊदी का यह कदम इसी बढ़ती एकजुटता का सबसे बड़ा प्रमाण है। यह फैसला इजरायल-अमेरिका गठजोड़ के खिलाफ मुस्लिम देशों की मजबूत एकता का प्रतीक बन गया है।
अमेरिका के लिए बड़ा झटका: सबसे करीबी सहयोगी ने साथ छोड़ा सऊदी अरब अमेरिका का लंबे समय से सबसे मजबूत सहयोगी रहा है। वहां अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं, हथियारों की बड़ी डील्स हैं और तेल व्यापार पर गहरी निर्भरता है। लेकिन ईरान मामले में सऊदी ने तटस्थता नहीं अपनाई, बल्कि ईरान का पक्ष लिया है।
यह ट्रंप प्रशासन के लिए बड़ा झटका है। अमेरिकी विशेषज्ञों और रिपोर्ट्स के अनुसार, गल्फ देश (सऊदी, कतर, ओमान) ने ट्रंप को ईरान पर हमला करने से रोकने के लिए कूटनीतिक प्रयास किए हैं। वे डरते हैं कि ऐसा हमला क्षेत्र में भारी अस्थिरता लाएगा, तेल बाजार हिल जाएगा और ईरान पर हमला बुमरेग हो सकता हैं। सऊदी का यह कदम अमेरिका की क्षेत्रीय रणनीति को कमजोर कर सकता है।
पाकिस्तान की चुप्पी: क्या तैयारी में जुटा है? एक तरफ सऊदी ने खुलकर ईरान का साथ दिया है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान – जो हमेशा 'इस्लामिक एकता' की बात करता है – अभी चुप है। कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। लेकिन सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान चुपचाप तैयारी में जुटा हो सकता है। पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं और वह क्षेत्रीय संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
क्या होगा आगे? क्षेत्रीय युद्ध का खतरा या नई कूटनीति? यह स्थिति मध्य पूर्व में नया मोड़ ला सकती है। अगर अमेरिका ईरान पर हमला करता है, तो ईरान ने पहले ही चेतावनी दी है कि वह सऊदी, यूएई, तुर्की जैसे देशों में अमेरिकी अड्डों पर हमला करेगा।
सऊदी का इनकार अमेरिका के लिए किसी भी ऑपरेशन को बेहद मुश्किल बना देगा। दूसरी तरफ, शिया-सुन्नी एकता इस्लामोफोबिया और पश्चिमी हस्तक्षेप के खिलाफ मजबूत संदेश है। फिलिस्तीन मुद्दे पर यह एकता और मजबूत हो सकती है।
यह घटनाक्रम साफ दिखाता है कि मुस्लिम दुनिया में पुरानी दुश्मनियां कम हो रही हैं और आम दुश्मन के खिलाफ एकजुटता बढ़ रही है। ट्रंप के लिए अब ईरान पर हमला पहले जितना आसान नहीं रहा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World** January 15, 2026