-Friday world 13th Feb 2026
भारत-अमेरिका के बीच हाल ही में हुए अंतरिम व्यापार समझौते ने दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों को नई दिशा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फरवरी 2026 में एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर जारी कर भारत पर लगाए गए अतिरिक्त 25% पेनल्टी टैरिफ को हटा दिया। यह टैरिफ पिछले साल अगस्त 2025 में रूस से क्रूड ऑयल खरीदने के कारण लगाया गया था, जिससे भारतीय निर्यात पर कुल टैरिफ 50% तक पहुंच गया था। अब यह घटकर 18% रह गया है, जो भारतीय कारोबारियों के लिए बड़ी राहत है।
लेकिन इस राहत के साथ एक बड़ी शर्त जुड़ी हुई है। ट्रंप के आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि अमेरिकी वाणिज्य विभाग भारत की ऊर्जा खरीद पर निगरानी रखेगा। अगर भारत ने रूस से क्रूड ऑयल का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आयात फिर से शुरू किया, तो 25% का पेनल्टी टैरिफ तुरंत दोबारा लागू हो जाएगा। ट्रंप ने दावा किया है कि भारत ने रूसी तेल खरीद बंद करने की प्रतिबद्धता जताई है और अमेरिका से ऊर्जा उत्पाद (क्रूड, LNG, LPG) अधिक खरीदने पर सहमति दिखाई है। हालांकि, भारत सरकार की ओर से इस दावे की कोई स्पष्ट पुष्टि नहीं हुई है।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने रविवार को इस मुद्दे पर बात करते हुए कहा कि अमेरिका से क्रूड ऑयल या अन्य ऊर्जा उत्पाद खरीदना भारत के रणनीतिक हित में है, क्योंकि इससे ऊर्जा स्रोतों में विविधता आती है। उन्होंने रूसी तेल पर सवालों का जवाब टालते हुए कहा, "यह विदेश मंत्रालय के दायरे में आता है।" गोयल ने जोर दिया कि व्यापार समझौते में किसी देश से खरीद की बाध्यता नहीं है, बल्कि यह व्यापार मार्गों को आसान बनाने और प्राथमिकता सुनिश्चित करने के बारे में है। उन्होंने साफ कहा कि रूसी तेल या रक्षा सौदों का व्यापार समझौते पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी इस पर स्पष्ट रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि 140 करोड़ भारतीयों के हित को ध्यान में रखकर ही निर्णय लिया जाएगा। कंपनियां बाजार की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय गतिशीलता के आधार पर क्रूड ऑयल खरीदने का फैसला खुद लेंगी। इससे साफ है कि रूसी क्रूड पर अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता दे रहा है।
पृष्ठभूमि में देखें तो रूस भारत का सबसे बड़ा क्रूड सप्लायर बना हुआ है। 2025-26 में अप्रैल-दिसंबर तक रूस से 31.5% क्रूड आयात हुआ, जो कुल $105.1 बिलियन का था। हालांकि हाल के महीनों में खरीद में कमी आई है – दिसंबर 2025 में नवंबर से 27% कम। यह कमी अमेरिकी दबाव और वैश्विक बाजार की वजह से हो सकती है, लेकिन पूरी तरह बंद नहीं हुई है।
ट्रंप का यह कदम अमेरिका की "अमेरिका फर्स्ट" नीति का हिस्सा लगता है, जहां वे रूस को अलग-थलग करने के लिए सहयोगियों पर दबाव डाल रहे हैं। लेकिन भारत के लिए यह दुविधा है – एक तरफ अमेरिकी बाजार तक पहुंच और टैरिफ राहत, दूसरी तरफ सस्ता रूसी तेल जो ऊर्जा सुरक्षा और कीमत नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण है। अगर रूस से खरीद पूरी तरह बंद हुई तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर असर पड़ सकता है, जबकि जारी रखने पर अमेरिकी टैरिफ का खतरा मंडरा रहा है।
यह समझौता भारत की कूटनीतिक चतुराई की परीक्षा है। गोयल और विदेश मंत्रालय दोनों ही मुद्दे को अलग-अलग रखकर जवाब दे रहे हैं, जो दिखाता है कि भारत न तो अमेरिका के सामने पूरी तरह झुक रहा है और न ही रूस से रिश्ते तोड़ रहा है। राष्ट्रीय हित सर्वोपरि – यही भारत का रुख है।
कुल मिलाकर, ट्रंप की धमकी के बावजूद भारत अपनी ऊर्जा नीति पर अडिग दिख रहा है। आने वाले महीनों में देखना होगा कि यह संतुलन कैसे कायम रहता है। क्या भारत अमेरिका से अधिक ऊर्जा खरीदकर रूस से दूरी बनाएगा, या बहुपक्षीय नीति जारी रखेगा? समय बताएगा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday world 13th Feb 2026