नई दिल्ली, 30 मार्च 2026: भारतीय रुपया आज इतिहास के सबसे काले दिन से गुजरा। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 95 के स्तर को पार कर गया और 95.20 तक पहुंच गया। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की सक्रिय दखल और सट्टेबाजी पर लगाए गए सख्त प्रतिबंधों के बावजूद यह गिरावट नहीं रुकी। मध्य-पूर्व में चल रहे ईरान-अमेरिका-इजराइल युद्ध की वजह से वैश्विक ऊर्जा संकट गहराया है, जिससे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं और विदेशी निवेशक (FII) भारतीय बाजार से सामूहिक पलायन कर रहे हैं।
यह गिरावट सिर्फ मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रही। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का सेंसेक्स 1635 से ज्यादा अंक टूटकर 71,947 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी भी 2% से अधिक गिरावट के साथ लाल निशान में रहा। कुल मिलाकर बाजार से 9 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की निवेशक संपत्ति एक दिन में गायब हो गई।
क्यों टूटा रुपया? मुख्य कारण क्या हैं?
1. मध्य-पूर्व युद्ध का तूफान: फरवरी के अंत से ईरान पर हमलों के बाद क्षेत्र में तनाव चरम पर है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग प्रभावित होने की आशंका से क्रूड ऑयल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गई हैं। भारत अपनी तेल जरूरतों का 85% से ज्यादा आयात करता है, इसलिए आयात बिल आसमान छू रहा है। इससे चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है।
2. FII की भारी बिकवाली: युद्ध की अनिश्चितता के कारण विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) सुरक्षित निवेश की तलाश में अमेरिकी डॉलर की ओर भाग रहे हैं। मार्च में ही FII ने 1.14 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की बिकवाली की है। इस साल अब तक का आंकड़ा 1.27 लाख करोड़ के करीब पहुंच चुका है। डॉलर की मांग बढ़ने से रुपया कमजोर पड़ रहा है।
3. डॉलर की मजबूती: वैश्विक अनिश्चितता के समय डॉलर सुरक्षित मुद्रा (Safe Haven) के रूप में चमक रहा है। अमेरिकी ब्याज दरों और ट्रंप प्रशासन की नीतियों ने भी डॉलर को बल दिया है।
4. एशिया में सबसे खराब प्रदर्शन: इस साल जनवरी 2026 से अब तक रुपया डॉलर के मुकाबले 4.1% गिर चुका है। इस हिसाब से यह एशिया का सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाला चालान बन गया है, जबकि चीनी युआन ने मामूली मजबूती दिखाई है।
RBI की कोशिशें और उनका सीमित असर रिजर्व बैंक ने रुपए को संभालने के लिए कई कदम उठाए। सट्टेबाजी रोकने के लिए बैंकों की ऑनशोर लॉन्ग पोजीशन पर सख्त सीमा लगा दी गई (प्रति दिन 100 मिलियन डॉलर तक)। RBI ने बाजार में डॉलर बेचकर भी हस्तक्षेप किया, जिसमें मार्च में ही 15 बिलियन डॉलर से ज्यादा की बिक्री का अनुमान है। कुछ दिनों पहले रुपया 130 पैसे मजबूत खुला था, लेकिन युद्ध की खबरों और FII बिकवाली ने सब कुछ बेकार कर दिया।
विश्लेषकों का कहना है कि RBI की दखल से अस्थिरता (Volatility) पर कुछ अंकुश लगा है, लेकिन बुनियादी दबाव (Oil import bill और capital outflow) इतना मजबूत है कि अकेले RBI इसे पूरी तरह रोक नहीं पा रहा। कुछ बैंक अब RBI से नए नियमों में ढील की मांग कर रहे हैं, क्योंकि $30 बिलियन के पोजीशन अनवाइंड करने से उन्हें नुकसान हो सकता है।
स्टॉक मार्केट पर असर: सेंसेक्स में भारी गिरावट आज के ट्रेडिंग सत्र में:
- सेंसेक्स→ ओपन: 72,565 | हाई: 73,165 | लो: 71,774 | क्लोज: 71,947 (↓ 2.22%)
- पिछले 52 हफ्तों का लो: 71,425 | हाई: 86,159
रिलायंस, HDFC बैंक, बजाज फाइनेंस जैसी भारी भरकम कंपनियां सबसे ज्यादा टूटीं। दूसरी ओर, कुछ IT और FMCG शेयरों में हल्की खरीदारी देखी गई, लेकिन कुल माहौल बिकवाली वाला रहा।
युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक सेंसेक्स में 10% से ज्यादा की गिरावट आ चुकी है और कुल बाजार पूंजीकरण से 48 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति मिट चुकी है।
आगे क्या? क्या 100 का आंकड़ा छू सकता है रुपया? विश्लेषकों के अनुसार, अगर मध्य-पूर्व में युद्ध लंबा खिंचा तो रुपया 96-98 तक भी जा सकता है। कुछ ब्रोकरेज हाउस तो 100 का स्तर भी संभव बता रहे हैं, हालांकि RBI की निरंतर दखल और संभावित डॉलर-रुपया स्वैप से कुछ राहत मिल सकती है।
सकारात्मक पक्ष: अगर ट्रंप प्रशासन की मध्यस्थता से युद्ध जल्द थमा और तेल की कीमतें 90 डॉलर नीचे आ गईं, तो रुपए में रिकवरी संभव है। साथ ही, मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार (RBI के पास अभी भी पर्याप्त रिजर्व) और मजबूत आर्थिक बुनियाद (GDP ग्रोथ, डिजिटल इकोनॉमी) लंबे समय में सहारा दे सकते हैं।
आम आदमी पर क्या असर?
- महंगाई: पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस और ट्रांसपोर्ट महंगा होने से समग्र मुद्रास्फीति बढ़ सकती है।
- आयात: इलेक्ट्रॉनिक्स, सोना, कच्चा माल महंगा पड़ेगा।
- निर्यातक: अच्छी खबर
– कमजोर रुपया निर्यात को प्रतिस्पर्धी बनाएगा।
- विदेश यात्रा/शिक्षा: विदेश जाने वालों और विदेशी शिक्षा लेने वालों पर बोझ बढ़ेगा।
संकट में अवसर भी रुपए की यह गिरावट चिंताजनक है, लेकिन यह भारत की अर्थव्यवस्था की कमजोरियों (तेल आयात पर निर्भरता) को भी उजागर करती है। सरकार और RBI को दीर्घकालिक समाधान – जैसे घरेलू तेल उत्पादन बढ़ाना, नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर और FII आकर्षित करने वाली नीतियां – पर ध्यान देना चाहिए।
अभी बाजार में अस्थिरता बनी रहेगी। निवेशकों को सलाह है कि घबराहट में फैसले न लें। विविधीकरण और मजबूत बुनियादी कंपनियों पर फोकस रखें।
यह संकट भारत के लिए परीक्षा की घड़ी है। सही नीतियों और वैश्विक स्थिरता से हम न सिर्फ उबरेंगे, बल्कि मजबूत भी होंगे।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 30,2026