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नई दिल्ली, 26 मार्च 2026: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू किए गए युद्ध ने अब अमेरिकी सशस्त्र बलों के अंदर गहरे असंतोष और विद्रोह की चिंगारियां भड़का दी हैं। सक्रिय ड्यूटी पर तैनात सैनिकों, रिजर्विस्टों और सैन्य परिवारों से जुड़े समूहों ने हफपोस्ट को दिए इंटरव्यू में खुलकर कहा है कि वे इजरायल के हितों की रक्षा या राजनीतिक प्यादों की तरह इस्तेमाल होकर अपनी जान गंवाने के लिए तैयार नहीं हैं।
यह असंतोष 28 फरवरी 2026 को ईरान के मीनाब (Minab) शहर में एक लड़कियों के स्कूल पर हुए अमेरिकी हमले के बाद और तेज हो गया, जिसमें 170 से अधिक स्कूली बच्चियों की मौत हो गई। सैनिकों का कहना है कि इस युद्ध का कोई स्पष्ट रणनीतिक उद्देश्य नहीं दिख रहा और वे बिना वजह जान जोखिम में डाल रहे हैं।
सैनिकों की आवाज: "हम इजरायल के लिए नहीं मरेंगे"
हफपोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य पूर्व में तैनात कई सैनिकों और रिजर्विस्टों ने गुमनाम रहकर बताया कि युद्ध की शुरुआत के बाद से उनका मनोबल काफी गिर गया है। एक रिजर्विस्ट, जो लगभग 20 साल से सेना से जुड़ी हैं, ने कहा, “मैं सैनिकों के मुंह से सुन रही हूं – 'We do not want to die for Israel. We don’t want to be political pawns.'” उन्होंने बताया कि पिछले दो हफ्तों में उन्होंने कांशेंस ऑब्जेक्टर (युद्ध से इनकार करने वाले) की जानकारी छह बार शेयर की है, जो पहले कभी नहीं हुआ।
एक अन्य सैनिक ने संभावित ग्राउंड ऑपरेशन को “absolute disaster” (पूर्ण आपदा) बताया। उनका कहना है कि ईरानी ड्रोन और मिसाइल हमलों के सामने जमीन पर कोई मजबूत बचाव योजना नहीं है। सैनिकों में नैतिक संकट गहरा रहा है, खासकर मीनाब स्कूल हमले के बाद। कई सैनिकों ने युद्ध को “राजनीतिक साजिश” करार दिया है, जिसमें अमेरिकी जवानों को इजरायल के हितों के लिए बलि का बकरा बनाया जा रहा है।
भारी नुकसान: सैनिकों की मौत और घायल
CENTCOM (US Central Command) के आंकड़ों और विभिन्न रिपोर्ट्स के मुताबिक, 28 फरवरी से शुरू हुए इस युद्ध में अब तक अमेरिकी सेना को काफी नुकसान हुआ है। विभिन्न स्रोतों में मौतों की संख्या 6 से 13 तक बताई गई है, जबकि घायलों की संख्या सैकड़ों में है। कुछ रिपोर्ट्स में कुल प्रभावित सैनिकों की संख्या 290 तक पहुंचने का अनुमान है।
ईरानी जवाबी हमलों में अमेरिकी ठिकानों को नुकसान पहुंचा है। सैनिकों का कहना है कि हवाई हमलों के अलावा अगर ग्राउंड ऑपरेशन शुरू हुआ तो स्थिति और बिगड़ सकती है, क्योंकि ईरान की भू-राजनीतिक स्थिति और लोकल सपोर्ट अमेरिकी फोर्सेस के लिए चुनौतीपूर्ण है।
ईरान की चेतावनी: "टापू पर कब्जा तो इंफ्रास्ट्रक्चर उड़ा देंगे"
ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकर कालिबाफ (Mohammad Bagher Ghalibaf) ने साफ चेतावनी दी है कि अगर कोई पड़ोसी देश अमेरिका या इजरायल के साथ मिलकर ईरानी टापुओं (जैसे अबू मुसा या खार्ग द्वीप) पर कब्जे की कोशिश करता है, तो ईरान उस देश के महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर पर विनाशकारी हमले करेगा।
ईरान ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को लगभग बंद कर रखा है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो रही है। अगर अमेरिका ईरानी पावर प्लांट्स या एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमला करता है, तो ईरान पूरे क्षेत्र के एनर्जी, ऑयल और यहां तक कि पानी की डेसालिनेशन सुविधाओं को निशाना बनाने की धमकी दे चुका है। ईरान ने UAE के प्रमुख बंदरगाहों (जेबेल अली, खलीफा, फुजैरा) को भी “वैध लक्ष्य” बताया है, क्योंकि वहां से अमेरिकी हमले हो रहे हैं।
युद्ध की पृष्ठभूमि और वैश्विक प्रभाव
ट्रंप प्रशासन ने 28 फरवरी को “Operation Epic Fury” के तहत ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले शुरू किए, जिसमें ईरानी सर्वोच्च नेता अली खामेनेई समेत कई उच्च अधिकारी मारे गए। अमेरिका-इजरायल का दावा है कि यह ईरान की परमाणु क्षमता और मिसाइल कार्यक्रम को रोकने के लिए था, लेकिन आलोचक इसे “रेगिम चेंज” का प्रयास बता रहे हैं।
हॉर्मुज स्ट्रेट बंद होने से तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिसका सीधा असर भारत समेत दुनिया भर की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं और सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है।
अमेरिकी सैनिकों में बढ़ता असंतोष न केवल युद्ध की नैतिकता पर सवाल उठा रहा है, बल्कि सेना के अंदर “कांशेंस ऑब्जेक्शन” की मांग भी बढ़ा रहा है। कई सैनिक कह रहे हैं कि वे “अनावश्यक युद्ध” में अपनी जान क्यों गंवाएं जब इसका कोई स्पष्ट राष्ट्रीय हित नहीं दिखता।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन ने ईरान की प्रतिरोध क्षमता को कम आंका है। हॉर्मुज को फिर से खोलने के प्रयास में अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने की कोशिश करनी पड़ रही है, लेकिन कई देश सतर्क हैं। अगर युद्ध लंबा खिंचा तो अमेरिकी सेना में विद्रोह की आशंका और बढ़ सकती है।
कुछ पूर्व राजनयिकों का कहना है कि युद्ध “त्वरित जीत” के सपने के साथ शुरू हुआ, लेकिन अब यह “लंबी जंग” में बदल रहा है। सैनिकों की निराशा इस बात को दर्शाती है कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि मनोबल से भी लड़ा जाता है।
आम अमेरिकी और वैश्विक प्रतिक्रिया
अमेरिका में युद्ध के खिलाफ प्रदर्शन बढ़ रहे हैं। कई सैन्य परिवार और वेटरन्स ग्रुप ट्रंप की नीति की आलोचना कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र और कई देशों ने नागरिक मौतों, खासकर मीनाब स्कूल हमले की निंदा की है।
ईरान का दावा है कि वह सिर्फ अपनी संप्रभुता की रक्षा कर रहा है, जबकि अमेरिका इसे “आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई” बता रहा है। लेकिन सैनिकों की आवाज साफ है – वे इस युद्ध को “इजरायल के लिए अमेरिकी खून” मान रहे हैं।
आगे क्या?
ट्रंप ने हाल ही में हॉर्मुज खोलने के लिए 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया था, लेकिन बाद में बातचीत की संभावना जताई। अगर कूटनीति कामयाब नहीं हुई तो युद्ध और बढ़ सकता है, जिससे अमेरिकी सैनिकों का गुस्सा और भड़क सकता है।
यह स्थिति न केवल अमेरिका-ईरान संबंधों को, बल्कि पूरे मध्य पूर्व और वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही है। सैनिकों की आवाज याद दिलाती है कि युद्ध में अंतिम कीमत हमेशा आम सैनिक और नागरिक चुकाते हैं।
अमेरिकी सेना में फैला यह असंतोष ट्रंप प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है। अगर सैनिकों का मनोबल और गिरा तो युद्ध की रणनीति पर असर पड़ेगा। दुनिया इस युद्ध को नजदीक से देख रही है, क्योंकि इसका असर सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं – यह तेल की कीमतों, मुद्रास्फीति और वैश्विक स्थिरता को प्रभावित कर रहा है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 26,2026