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Monday, 30 March 2026

ट्रंप के हस्ताक्षर डॉलर पर: पेट्रोडॉलर का डेथ वारंट? रूस-चीन-ईरान का गठबंधन डॉलर की सत्ता को चुनौती दे रहा!

ट्रंप के हस्ताक्षर डॉलर पर: पेट्रोडॉलर का डेथ वारंट? रूस-चीन-ईरान का गठबंधन डॉलर की सत्ता को चुनौती दे रहा!-Friday World March 30,2026 
नई दिल्ली, 30 मार्च 2026: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर अब नए डॉलर नोटों पर छपेंगे। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने 26 मार्च 2026 को घोषणा की कि अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ के अवसर पर ट्रंप का सिग्नेचर फ्यूचर पेपर करेंसी पर होगा – यह इतिहास में पहली बार है जब कोई सिटिंग प्रेसिडेंट का नाम और हस्ताक्षर डॉलर पर आएगा। ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट के साथ ट्रंप का नाम होगा, जबकि ट्रेजरर का नाम हट जाएगा। लेकिन इस ऐतिहासिक फैसले को कई विशेषज्ञ डॉलर के लिए डेथ वारंट बता रहे हैं। ठीक उसी समय जब डॉलर की ग्लोबल डोमिनेंस पर सवाल उठ रहे हैं, मध्य-पूर्व का युद्ध, हार्मुज स्ट्रेट का तनाव और रूस-चीन-ईरान का बढ़ता गठबंधन डॉलर की नींव हिला रहा है। 

ट्रंप का सिग्नेचर: गर्व या खतरे का संकेत? ट्रेजरी विभाग का कहना है कि यह कदम सिर्फ 250वीं स्वतंत्रता वर्षगांठ (सेमीक्विनसेंटेनियल) का सम्मान है। लेकिन आलोचक इसे ट्रंप की व्यक्तिगत ब्रांडिंग बता रहे हैं। एक सिटिंग प्रेसिडेंट का सिग्नेचर डॉलर पर लगना 1861 के बाद की परंपरा को तोड़ रहा है। 

दुनिया के कई अर्थशास्त्री पूछ रहे हैं – क्या यह फैसला डॉलर की कमजोरी को छिपाने की कोशिश है? क्योंकि उसी हफ्ते मध्य-पूर्व युद्ध ने तेल आपूर्ति को बाधित किया, तेल की कीमतें 100-110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गईं और पेट्रोडॉलर सिस्टम पर दबाव बढ़ गया। 

रूस का गैसोलीन एक्सपोर्ट बैन: चार महीने का झटका रूस ने 1 अप्रैल 2026 से जुलाई 2026 तक गैसोलीन (पेट्रोल) के निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। डिप्टी प्राइम मिनिस्टर अलेक्जेंडर नोवाक ने घरेलू मांग को प्राथमिकता देने का फैसला लिया। यूक्रेन के ड्रोन हमलों से रूसी रिफाइनरियां प्रभावित हैं और वैश्विक तेल कीमतों में उछाल के बावजूद रूस घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित करना चाहता है। 

यह बैन सिर्फ रूस को नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित करेगा। रूस दुनिया का प्रमुख तेल और पेट्रोलियम उत्पाद निर्यातक है। इस बैन से ग्लोबल सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ेगा और तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। 

 हार्मुज स्ट्रेट: ईरान का टोल बूथ, भुगतान युआन में! मध्य-पूर्व युद्ध में ईरान ने स्ट्रेट ऑफ हार्मुज (जहां दुनिया का 20-25% तेल गुजरता है) पर प्रभावी नियंत्रण कर लिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान अब कुछ टैंकरों को "सेफ पैसेज" देने के बदले टोल वसूल रहा है – और यह टोल **चीनी युआन** में लिया जा रहा है। 

लॉयड्स लिस्ट के अनुसार कम से कम दो जहाजों ने युआन में भुगतान किया। कुछ रिपोर्ट्स में एक टैंकर के लिए 20 लाख डॉलर (लगभग 2 मिलियन डॉलर) का टोल बताया गया है। ईरान का कहना है कि "नॉन-होस्टाइल" जहाज सुरक्षित गुजर सकते हैं, लेकिन डॉलर में भुगतान पर भारी टोल या प्रतिबंध लग सकता है। 

ईरान संसद में कानून बना रहा है कि हार्मुज से गुजरने वाले जहाजों को टोल देना होगा और पसंदीदा भुगतान माध्यम युआन होगा। चीन पहले से ही ईरानी और रूसी तेल युआन में खरीद रहा है। 

 रूस-चीन-ईरान: डॉलर से विद्रोह रूस और ईरान पहले से ही युआन और रूबल में तेल व्यापार कर रहे हैं। चीन ने रूसी तेल आयात बढ़ा दिया है। ईरान युद्ध के बावजूद कुछ तेल युआन में बेचने की तैयारी में है। BRICS देशों में डी-डॉलराइजेशन की चर्चा तेज हो गई है। 

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हार्मुज में तेल व्यापार युआन में शिफ्ट हुआ तो पेट्रोडॉलर सिस्टम* (जिसमें तेल का मूल्य डॉलर में तय होता है) को बड़ा झटका लगेगा। डॉलर की मांग घटेगी, अमेरिका की सस्ती उधार लेने की क्षमता प्रभावित होगी और वैश्विक महंगाई बढ़ेगी।

 ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर दबाव बनाया, लेकिन इससे उल्टा असर पड़ रहा है। ईरान ने असममित युद्ध की रणनीति अपनाई – तेल आपूर्ति बाधित कर डॉलर को निशाना बनाना। 

भारत पर क्या असर? भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है। हमारी 85% तेल जरूरतें आयात पर निर्भर हैं।

 - हार्मुज तनाव और रूसी गैसोलीन बैन से तेल की कीमतें बढ़ीं 

→ पेट्रोल-डीजल महंगा। 

- रुपया पहले ही डॉलर के मुकाबले दबाव में है (हालिया ट्रेड में USD/INR 93-95 के आसपास)। 

- अगर डॉलर कमजोर पड़ा और वैकल्पिक मुद्राएं (युआन) मजबूत हुईं तो भारत को भी व्यापारिक फैसले दोबारा सोचने पड़ सकते हैं।

 भारत रूस से सस्ता तेल खरीद रहा है, लेकिन नई स्थितियों में सप्लाई चेन और भुगतान के नए रास्ते तलाशने होंगे। सरकार ऊर्जा सुरक्षा और नवीकरणीय स्रोतों पर जोर बढ़ा रही है। 

 क्या डॉलर सच में खतरे में है? संकेत चिंताजनक हैं: 

- BRICS देश युआन, रूबल और अन्य मुद्राओं में व्यापार बढ़ा रहे हैं।

 - अमेरिकी कर्ज 39 ट्रिलियन डॉलर के पार। 

- ट्रंप की टैरिफ और सैंक्शन नीतियां कई देशों को डॉलर से दूरी बनाने पर मजबूर कर रही हैं। 

- युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव डॉलर को "सेफ हेवन" के बजाय जोखिम भरा बना रहे हैं।

 कुछ विश्लेषक मानते हैं कि ट्रंप का सिग्नेचर डॉलर पर "आखिरी कोशिश" जैसा है – घरेलू गर्व बढ़ाना, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चुनौतियां बढ़ रही हैं।

आगे क्या? अगर मध्य-पूर्व युद्ध लंबा खिंचा तो तेल की कीमतें 120-150 डॉलर तक जा सकती हैं। हार्मुज में युआन-आधारित टोल सिस्टम स्थायी हुआ तो डी-डॉलराइजेशन तेज होगा। चीन इस मौके का फायदा उठाकर युआन को ग्लोबल एनर्जी ट्रेड में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। 

ट्रंप प्रशासन "मैक्सिमम प्रेशर" कैंपेन चला रहा है, लेकिन परिणाम उल्टे पड़ रहे हैं। दुनिया अब बहुध्रुवीय (Multipolar) व्यापार व्यवस्था की ओर बढ़ रही है।

ट्रंप के हस्ताक्षर डॉलर पर लगना ऐतिहासिक है, लेकिन असली इतिहास रूस, चीन और ईरान के गठबंधन द्वारा डॉलर की सत्ता को दी जा रही चुनौती लिख रहा है। पेट्रोडॉलर का युग खत्म होने की शुरुआत हो सकती है। भारत जैसे देशों को सतर्क रहना होगा – विविधीकरण, घरेलू ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना और नए व्यापारिक साझेदारों के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत करना जरूरी है।

 यह संकट न सिर्फ आर्थिक है, बल्कि नई विश्व व्यवस्था की दस्तक भी है। डॉलर की मौत का वारंट अभी नहीं कटा है, लेकिन उस पर हस्ताक्षर हो रहे हैं – ट्रंप के अपने या उसके विरोधियों के?

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 30,2026