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8 शव्वाल को इस्लामी इतिहास में यौम अल-ग़म (दुख का दिन) के रूप में याद किया जाता है। यह वह दिन है जब 8 शव्वाल 1344 हिजरी (21 अप्रैल 1926) को मदीना मुनव्वरा के पवित्र कब्रिस्तान जन्नतुल बकीअ (जन्नत अल-बकीअ) के खूबसूरत गुंबदों, मीनारों और मजारों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया। इस घटना ने दुनिया भर के मुसलमानों के दिलों में गहरा घाव छोड़ दिया, जो आज भी नहीं भर पाया है।
जन्नतुल बकीअ इस्लाम का सबसे पुराना और सबसे महत्वपूर्ण कब्रिस्तान है। यहां पैगंबर मुहम्मद ﷺ की अज़वाज-ए-मुतहर्रात (पवित्र पत्नियां), अहल-ए-बैत के कई सदस्य, सहाबा-ए-किराम और इस्लामी इतिहास की अन्य महान हस्तियां दफन हैं। सदियों तक यहां भव्य मजारें बनी रहीं, जहां मुसलमान ज़ियारत (दर्शन) के लिए जाते थे। लेकिन वहाबी विचारधारा के प्रभाव में इन मजारों को “शिर्क” और “बिदअत” बताकर तोड़ दिया गया।
आज ज्यादातर मुसलमान — शिया मुसलमानों के अलावा सुन्नी मुसलमानों की भी बड़ी संख्या — इन मजारों को पवित्र मानते हैं और इनके पुनर्निर्माण की मांग करते हैं। केवल वहाबी विचारधारा के अनुयायी ही इस विध्वंस को सही ठहराते हैं। बाकी मुस्लिम दुनिया इसे इस्लामी विरासत का अपमान और ऐतिहासिक स्थलों का विनाश मानती है।
जन्नतुल बकीअ: इस्लाम की पवित्र विरासत जन्नतुल बकीअ मस्जिद-ए-नबवी के बगल में स्थित है। पैगंबर ﷺ के समय से ही यह कब्रिस्तान इस्तेमाल होता आया है। यहां दफन प्रमुख शख्सियतें शामिल हैं:
- अहल-ए-बैत: जनाबे फातीमा जहरा S,A -इमाम हसन इब्न अली (अ.), इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.), इमाम मुहम्मद अल-बाकिर (अ.), इमाम जाफर अस-सादिक (अ.)।
- सहाबा-ए-किराम: हज़रत उस्मान (रज़ि.) सहित कई अन्य।
- पैगंबर ﷺ की बेटियां और अन्य रिश्तेदार।
- अज़वाज-ए-मुतहर्रात: हज़रत आयशा, हज़रत उम्म सलमा, हज़रत ज़ैनब बिन्त जहश आदि कई पत्नियां।
पहले यहां सुंदर गुंबद, मीनारें और मकबरे बने हुए थे, जो मुसलमानों की आस्था का केंद्र थे। ज़ियारत करना मुसलमानों के लिए सम्मान और याद का प्रतीक था — न कि पूजा।
विध्वंस की घटना: 8 शव्वाल, 1344 हिजरी 1925-1926 में अब्दुल अजीज इब्न सऊद (सऊदी राज्य के संस्थापक) के आदेश पर इख़वान मिलिशिया ने जन्नतुल बकीअ के सभी भव्य निर्माणों को ध्वस्त कर दिया। इसी दौरान मक्का में **जन्नतुल मुअल्ला** (जहां पैगंबर ﷺ की मां, दादा आदि दफन हैं) का भी विध्वंस हुआ।
यह दूसरा बड़ा विध्वंस था। पहला 1806 में हुआ था, जब वहाबी-सऊदी गठबंधन ने मदीना पर कब्जा किया और मकबरों को तोड़ दिया। बाद में ओटोमन साम्राज्य ने इन्हें फिर से बनवाया, लेकिन 1926 में सऊदी नियंत्रण के बाद फिर से तोड़ दिया गया।
कारण: वहाबी विचारधारा (मुहम्मद इब्न अब्दुल वहाब की शिक्षाओं पर आधारित) सख्त तौहीद पर जोर देती है। इसके अनुसार कब्रों पर गुंबद या मकबरा बनाना शिर्क की ओर ले जाता है। इसलिए इब्न सऊद ने क़ाज़ी अब्दुल्लाह इब्न बुलैहिद से फतवा लेकर यह कार्रवाई की।
आज भी सऊदी सरकार का यही रुख है — कब्रों को समतल रखना और किसी भी भव्य संरचना को अनुमति न देना।
मुसलमानों की व्यापक भावना: वहाबी के सिवा सभी मजारों को पवित्र मानते हैं
शिया मुसलमान तो जन्नतुल बकीअ को अहल-ए-बैत की कब्र मुबारक मानते हैं और हर साल 8 शव्वाल को बड़े पैमाने पर याद करते हैं। लेकिन यह केवल शिया मुद्दा नहीं है।
सुन्नी मुसलमानों की भी बड़ी संख्या — खासकर सूफी परंपरा, मालिकी, शाफई, हनफी और हंबली मदाहिब के अनुयायी — मजारों को सम्मान देते हैं। वे ज़ियारत को सुन्नत मानते हैं। कई प्रमुख सुन्नी विद्वान और बुद्धिजीवी इस विध्वंस को “अनुपयुक्त” और इस्लामी विरासत के विनाश के रूप में देखते हैं।
दुनिया भर में (भारत, पाकिस्तान, ईरान, इराक, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि में) मुसलमान हर साल 8 शव्वाल को यौम अल-ग़म या यौम-ए-इनहेदाम-ए-बकीअ के रूप में मातम मनाते हैं। मजलिसें, रैलियां, प्रदर्शन और दुआएं होती हैं। कई संगठन और बुद्धिजीवी जन्नतुल बकीअ और जन्नतुल मुअल्ला के मजारों के पुनर्निर्माण की मांग करते हैं। ये मांगें संयुक्त राष्ट्र और ओआईसी (इस्लामी सहयोग संगठन) तक पहुंच चुकी हैं। कुछ प्रस्तावों में कहा गया है कि धार्मिक स्थलों की रक्षा और संरक्षण अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी है।
विरोध और प्रतिक्रियाएं विध्वंस के तुरंत बाद दुनिया भर में विरोध प्रदर्शन हुए। भारत, पाकिस्तान और अन्य देशों में मुसलमानों ने सऊदी नीति की निंदा की। आज भी हर साल प्रदर्शन होते हैं।
कई सुन्नी विद्वानों ने भी कहा कि मजारों का विनाश इस्लामी एकता के खिलाफ है। वे मानते हैं कि कब्रों पर सादी संरचना बनाना सम्मान का प्रतीक है, न कि शिर्क।
वहाबी विचारधारा के अनुयायी ही इसे सही ठहराते हैं और कहते हैं कि इससे शिर्क रुका। लेकिन मुस्लिम बहुसंख्यक (सुन्नी + शिया) इसे ऐतिहासिक विरासत का नुकसान मानते हैं।
वर्तमान स्थिति और चुनौतियां आज जन्नतुल बकीअ समतल है। कब्रों पर सिर्फ सादी पत्थर या फ्लैट मार्कर हैं — कोई गुंबद, मीनार या भव्य मज़ार नहीं। सऊदी सरकार सख्ती से अपनी नीति लागू रखती है।
फिर भी मुसलमानों की मांगें जारी हैं:
- मजारों का पुनर्निर्माण।
- ज़ियारत की स्वतंत्रता।
- इस्लामी विरासत की रक्षा।
कुछ अभियान “Rebuild Baqi” के नाम से चल रहे हैं। बुद्धिजीवी, इतिहासकार और धर्मगुरु इसमें सक्रिय हैं।
विरासत संरक्षण और मुस्लिम एकता 8 शव्वाल की यह घटना सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि इस्लामी इतिहास में एक दर्दनाक अध्याय है। यह हमें याद दिलाती है कि धार्मिक स्थलों का सम्मान सभी मुसलमानों की साझा जिम्मेदारी है।
वहाबी विचारधारा के अलावा ज्यादातर मुसलमान जन्नतुल बकीअ की मजारों को पवित्र मानते हैं और इनके पुनर्निर्माण की मांग करते हैं। यह मांग इस्लामी एकता, विरासत संरक्षण और धार्मिक स्वतंत्रता की भावना से उपजी है।
जब तक मुसलमान एकजुट होकर अपनी आवाज नहीं उठाते, इस्लामी इतिहास की ये अनमोल निशानियां समतल पड़ी रहेंगी। अल्लाह तआला हमें हिदायत दे कि हम अपनी पवित्र विरासत की रक्षा करें और आपसी एकता बनाए रखें।
पुनर्निर्माण की मांग सिर्फ एक इमारत की नहीं, बल्कि मुसलमानों की साझी आस्था और सम्मान की है। यौम अल-ग़म हमें सोचने पर मजबूर करता है — क्या हम अपनी विरासत को ऐसे ही खोते रहेंगे, या मिलकर उसे वापस पाएंगे?
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 28,2026