-Friday World March 9,2026
मध्य पूर्व में ईरान के खिलाफ अमेरिका-इज़राइल के तीव्र हमलों के बाद सुप्रीम लीडर आयतोल्लाह अली खामेनेई की शहादत ने वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य को हिला दिया है। अमेरिका ईरान को अपना प्रमुख दुश्मन मानता है और वहाँ विनाशकारी हमलों के बाद अब सवाल उठ रहा है:
क्या उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन अगला टारगेट हैं?
ट्रंप प्रशासन की आक्रामक विदेश नीति और मौजूदा वैश्विक तनाव के बीच उत्तर कोरिया पर नजर टिकी हुई है। सोमवार (9 मार्च 2026) से अमेरिका और दक्षिण कोरिया ने फ्रीडम शील्ड 2026 नामक बड़ा संयुक्त सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है, जो 19 मार्च तक चलेगा। इस अभ्यास में लगभग 18,000 दक्षिण कोरियाई सैनिक हिस्सा ले रहे हैं, जबकि अमेरिकी सैनिकों की संख्या आधिकारिक रूप से घोषित नहीं की गई है।
फ्रीडम शील्ड 2026: रक्षात्मक अभ्यास या आक्रामक तैयारी?
यह अभ्यास रिपब्लिक ऑफ कोरिया (ROK), यूनाइटेड स्टेट्स और यूनाइटेड नेशंस कमांड (UNC) द्वारा आयोजित है। इसमें ज़मीन, हवाई, नौसेना, अंतरिक्ष और साइबर डोमेन में संयुक्त प्रशिक्षण शामिल है। इस साल 22 फील्ड ट्रेनिंग एक्सरसाइज (वारियर शील्ड) होंगे, जो पिछले साल के 51 से काफी कम हैं।
अमेरिका और दक्षिण कोरिया का कहना है कि यह अभ्यास रक्षात्मक है और कोरियाई प्रायद्वीप पर शांति बनाए रखने के लिए ज़रूरी है। लेकिन उत्तर कोरिया इसे आक्रमण की तैयारी मानता है। प्योंगयांग लंबे समय से ऐसे संयुक्त अभ्यासों को "आक्रमण के रिहर्सल" कहकर निंदा करता रहा है और जवाब में मिसाइल टेस्ट तथा अन्य सैन्य प्रदर्शन करता है।
मध्य पूर्व में संसाधनों का स्थानांतरण: कोरियाई प्रायद्वीप पर असर?
ईरान के खिलाफ चल रहे युद्ध के कारण अमेरिका ने दक्षिण कोरिया से कुछ सैन्य संसाधन – खासकर पैट्रियट एंटी-मिसाइल सिस्टम और अन्य उपकरण – मध्य पूर्व में भेज दिए हैं। दक्षिण कोरियाई मीडिया और सरकारी स्रोतों के अनुसार, C-17 और C-5 जैसे हेवी ट्रांसपोर्ट विमान ओसान एयर बेस से रवाना हुए हैं।
यूएस फोर्सेज कोरिया (USFK) ने इस पर टिप्पणी करने से इनकार किया है और कहा है कि "सुरक्षा कारणों से विवरण सार्वजनिक नहीं किए जा सकते"। दक्षिण कोरियाई अधिकारी भी कहते हैं कि इससे संयुक्त रक्षा व्यवस्था पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा। लेकिन यह स्थानांतरण उत्तर कोरिया के लिए चिंता का विषय बन गया है।
उत्तर कोरिया की प्रतिक्रिया: डर और धमकियाँ उत्तर कोरिया का मानना है कि यह अभ्यास
किम जोंग उन और उसके शासन को खत्म करने की तैयारी है। प्योंगयांग ऐसे ड्रिल्स को "आक्रमण के रिहर्सल" कहता है और जवाब में अपनी सैन्य क्षमता दिखाता है। हाल ही में किम जोंग उन ने अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम को "स्थायी और अपरिवर्तनीय" घोषित किया है और अमेरिका से बातचीत के लिए डिन्यूक्लियराइजेशन की शर्त छोड़ने की मांग की है।
ट्रंप प्रशासन ने अभी तक उत्तर कोरिया पर सीधे हमले की बात नहीं की है, लेकिन ईरान पर कड़े रवैये से किम को चिंता है। कुछ विश्लेषक मानते हैं कि ट्रंप की "मैक्सिमम प्रेशर" नीति फिर शुरू हो सकती है, जबकि अन्य कहते हैं कि ट्रंप की चीन यात्रा (मार्च-अप्रैल 2026) के दौरान किम से बातचीत की संभावना है।
वैश्विक प्रभाव और भारत के लिए संदेश यह तनाव वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा है। उत्तर कोरिया के न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम से एशिया-पैसिफिक में अस्थिरता बढ़ रही है। भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि:
→ एशियाई सुरक्षा संतुलन बिगड़ सकता है
→ चीन-रूस-उत्तर कोरिया अक्ष मजबूत हो रहा है
→ वैश्विक ऊर्जा और व्यापार पर असर पड़ सकता है
भारत को अपनी रक्षा रणनीति मजबूत करनी होगी, रिन्यूएबल ऊर्जा और स्वच्छ तकनीक पर ध्यान देना होगा तथा बहुपक्षीय राजनय के माध्यम से शांति बनाए रखने के प्रयास करने होंगे।
क्या ट्रंप और किम के बीच फिर बातचीत होगी? या तनाव और बढ़ेगा? समय ही बताएगा, लेकिन फिलहाल दुनिया फिर से युद्ध की छाया में है!
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 9,2026