-Friday World March 30,2026
गुजरात के राजकोट शहर में एक स्थानीय पत्रकार ने पुलिस हिरासत में बर्बर यातना के गंभीर आरोप लगाए हैं, जो पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है। पत्रकार सुरेश वडेचा (जिन्हें कुछ रिपोर्ट्स में सुधेश या सुरेश वाड़ैचा भी लिखा गया है), जो ‘खबर राजकोट की न्यूज’ नामक ऑनलाइन मीडिया प्लेटफॉर्म चलाते हैं, का दावा है कि राजकोट क्राइम ब्रांच के डीसीपी जगदीश बांगड़वा और उनकी टीम ने उन्हें बिना किसी एफआईआर के हिरासत में लिया, कपड़े उतरवाकर उनके गुप्तांगों (गुदा मार्ग) में पेट्रोल डाला, उल्टा लटकाकर जानवरों की तरह पीटा और इससे उनके पैर में फ्रैक्चर, कान का पर्दा फटना, कमर व सिर पर गंभीर चोटें आईं।
ये आरोप मात्र व्यक्तिगत शिकायत नहीं, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता, पुलिस की जवाबदेही और मानवाधिकारों के संरक्षण पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। घटना की खबर तेजी से वायरल हुई, खासकर जब गुजरात कांग्रेस विधायक जिग्नेश मेवाणी ने इसे सोशल मीडिया पर साझा किया। मेवाणी ने लिखा कि पत्रकार ने उन्हें बताया, “बिना किसी एफआईआर के डीसीपी जगदीश बांगड़वा ने मेरी टांग तोड़ दी और मेरे गुदा मार्ग में दो बार पेट्रोल भर दिया।” इस पोस्ट ने राजनीतिक और मीडिया हलकों में तूफान खड़ा कर दिया।
पत्रकार का आरोप: क्या हुआ था उस रात? सुरेश वडेचा के अनुसार, पूरा मामला एक स्थानीय बिल्डर असीम आगम से जुड़ा है। वडेचा ने पहले इस बिल्डर की कथित अवैध निर्माण गतिविधियों पर रिपोर्टिंग की थी। उनका कहना है कि बिल्डर के इशारे पर पुलिस ने उन्हें निशाना बनाया। वडेचा ने विस्तार से बताया:
- उन्हें बिना वारंट या एफआईआर के घर से उठाया गया।
- क्राइम ब्रांच में ले जाकर कपड़े उतरवाए गए।
- गुप्तांगों में पेट्रोल डाला गया (कुछ बयानों में दो बार)।
- उल्टा लटकाकर चार घंटे से ज्यादा बेरहमी से पीटा गया।
- नतीजा: पैर में फ्रैक्चर, कान का पर्दा फटना, सिर और पीठ पर गंभीर चोटें।
वडेचा ने कहा, “मुझे जानवर की तरह मारा गया। यह अमानवीय बर्बरता है।” उन्होंने आरोप लगाया कि यह सब उनके रिपोर्टिंग के कारण बदला लेने के लिए किया गया। घटना के बाद पत्रकार ने अपनी स्थिति की तस्वीरें और वीडियो भी साझा किए, जिसमें चोटों के निशान दिख रहे थे।
पुलिस का जवाब: “सब ड्रामा है” राजकोट पुलिस और डीसीपी जगदीश बांगड़वा ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। डीसीपी ने इसे “ड्रामा” बताया और कहा कि आरोप बेबुनियाद हैं। पुलिस का दावा है कि मेडिकल रिपोर्ट में गुदा क्षेत्र में पेट्रोल या किसी भी प्रकार की जलन, बर्न या गंभीर चोट के कोई सबूत नहीं मिले। रिपोर्ट में फ्रैक्चर या अन्य गंभीर इंजरी भी दर्ज नहीं होने का जिक्र किया गया है।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, वडेचा को किसी मामले में पूछताछ के लिए बुलाया गया था, लेकिन कोई शारीरिक यातना नहीं दी गई। डीसीपी बांगड़वा, जो पहले जोन-2 डीसीपी रह चुके हैं और अवैध निर्माण हटाने, अपराधियों की संपत्ति ध्वस्त करने जैसे अभियानों में सक्रिय रहे हैं, को कई लोग सख्त और ईमानदार अधिकारी मानते हैं। कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने उनके समर्थन में पोस्ट भी किए, कहते हुए कि उनका कार्यकाल राजकोट के लिए फायदेमंद रहा है।
विवाद क्यों बढ़ा? राजनीतिक और मीडिया प्रतिक्रिया इस मामले ने गुजरात की राजनीति को भी हिला दिया। जिग्नेश मेवाणी ने इसे मानवाधिकार उल्लंघन करार दिया और डीसीपी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। विपक्षी दलों ने इसे “पुलिस राज” का उदाहरण बताया। वहीं, पत्रकार संगठनों ने भी स्वतंत्र जांच की मांग उठाई।
सोशल मीडिया पर #RajkotJournalistTorture, #PoliceBrutality और #JagdishBangarwa जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। कुछ यूजर्स पुलिस का बचाव कर रहे हैं तो कुछ पत्रकार की बात को मानवता के खिलाफ अपराध बता रहे हैं।
द वायर और अन्य मीडिया आउटलेट्स ने इस घटना को प्रमुखता दी। द वायर की रिपोर्ट में वडेचा के आरोपों को विस्तार से जगह दी गई, साथ ही पुलिस के इनकार का भी उल्लेख किया गया।
बड़े सवाल: प्रेस की आजादी और पुलिस सुधार की जरूरत यह मामला सिर्फ एक व्यक्तिगत घटना नहीं है। यह भारत में पत्रकारों पर बढ़ते हमलों, कस्टोडियल टॉर्चर और पुलिस की मनमानी की एक कड़ी है।
- प्रेस की स्वतंत्रता: अगर एक पत्रकार अपनी रिपोर्टिंग के कारण इस तरह का व्यवहार झेलता है, तो लोकतंत्र की चौथी स्तंभ पर सवाल उठता है। कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि गुजरात समेत कई राज्यों में स्थानीय पत्रकार छोटे-मोटे मुद्दों पर दबाव में रहते हैं।
- कस्टोडियल यातना: भारत में पुलिस हिरासत में मौतें और यातनाएं कोई नई बात नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार पुलिस सुधार की सिफारिश की है, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव कम दिखता है।
- जांच की जरूरत: आरोप इतने गंभीर हैं कि एक स्वतंत्र, निष्पक्ष जांच (जैसे मजिस्ट्रेट या हाईकोर्ट की निगरानी में) होनी चाहिए। मेडिकल रिपोर्ट, सीसीटीवी फुटेज, गवाहों के बयान सबकी जांच जरूरी है।
- बिल्डर-पुलिस-राजनीति का गठजोड़: अगर आरोप सही हैं तो यह अवैध निर्माण के खिलाफ रिपोर्टिंग को कुचलने की कोशिश है। शहरों में बिल्डर माफिया अक्सर प्रशासन से मिलकर काम करते हैं।
आगे क्या? अभी तक कोई आधिकारिक एफआईआर दर्ज होने या डीसीपी पर कार्रवाई की खबर नहीं है। पत्रकार सुरेश वडेचा ने शायद अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहे होंगे। गुजरात सरकार को इस मामले में पारदर्शिता बरतनी चाहिए। अगर आरोप गलत साबित होते हैं तो पत्रकार पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है, लेकिन अगर सच्चे हैं तो दोषियों को सजा मिलनी चाहिए।
यह घटना हमें याद दिलाती है कि कानून का राज हर किसी के लिए समान होना चाहिए—चाहे वह पत्रकार हो, पुलिस अधिकारी हो या आम नागरिक। अमानवीय यातना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं।
राजकोट का यह मामला अभी जांच के अधीन है। दोनों पक्षों के दावों को बिना पक्षपात के देखा जाना चाहिए। लेकिन एक बात साफ है—ऐसे आरोप लोकतंत्र को कमजोर करते हैं। प्रेस की स्वतंत्रता और पुलिस की जवाबदेही दोनों जरूरी हैं। अगर हम चुप रहे तो कल कोई और पत्रकार, कोई और नागरिक इसी तरह की बर्बरता का शिकार हो सकता है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 30,2026
यह आर्टिकल तथ्यों पर आधारित है और विभिन्न समाचार स्रोतों से प्राप्त जानकारी को संतुलित रूप से प्रस्तुत करता है। कोई पक्षपात नहीं, सिर्फ सच्चाई की तलाश।)
संदर्भ: द वायर, द प्रिंट, पीटीआई, भड़ास4मीडिया और सोशल मीडिया रिपोर्ट्स। जांच पूरी होने तक सभी आरोप प्रारंभिक हैं।