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Sunday, 22 March 2026

अमेरिका का साथ मिला तो भी गिड़गिड़ा रहे हैं: नेतन्याहू की मदद मांग, ईरान से नहीं इजरायल से है असली खतरा!

अमेरिका का साथ मिला तो भी गिड़गिड़ा रहे हैं: नेतन्याहू की मदद मांग, ईरान से नहीं इजरायल से है असली खतरा!-Friday World March 23,2026
मध्य पूर्व का युद्ध अब 23वें दिन में है, और स्थिति उलट-पुलट हो रही है। जहां अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर हमले शुरू किए थे, वहीं अब इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू दुनिया भर के नेताओं से गिड़गिड़ा रहे हैं कि "हमारे साथ आओ, ईरान से लड़ो!" अमेरिका का पूरा साथ मिला है—ट्रंप की सेना, हथियार, खुफिया जानकारी—फिर भी इजरायल अकेला महसूस कर रहा है। अगर अमेरिका साथ न होता, तो शायद अब तक माफी मांगकर पीछे हट चुके होते। 

दुनिया को खतरा ईरान से नहीं, बल्कि इजरायल से है—यह बात अब खुलकर सामने आ रही है। हमारे यहां एक पुरानी कहावत है: "जब फलाना में नहीं था गूदा, तो काहें मैदान में कूदा?" यानी अगर ताकत नहीं थी, तो युद्ध क्यों शुरू किया? आज वही हाल है—अमेरिका की बैसाखी पर खड़े होकर भी नेतन्याहू दुनिया से मदद मांग रहे हैं। आइए इस पूरी कहानी को विस्तार से देखते हैं, जहां "विजेता" खुद हार मानने की कगार पर है। 

 अमेरिका का साथ: मजबूत दिखावट, लेकिन हकीकत अलग 

फरवरी 2026 में अमेरिका-इजरायल ने संयुक्त हमले शुरू किए—"ऑपरेशन रोअरिंग लायन" और "राइजिंग लायन"। ट्रंप ने ईरान को "परमाणु खतरा" बताया, नेतन्याहू ने "सभ्यता का दुश्मन" कहा। शुरुआत में दावे बड़े थे: 

- ईरान की मिसाइल फैक्टरियां तबाह।

 - परमाणु संवर्धन क्षमता खत्म।

 - बैलिस्टिक मिसाइल उत्पादन "फंक्शनली डिस्ट्रॉयड"।

 19 मार्च को नेतन्याहू ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा: "ईरान आज यूरेनियम संवर्धन नहीं कर सकता, बैलिस्टिक मिसाइल नहीं बना सकता। हम जीत रहे हैं, ईरान तबाह हो रहा है।" ट्रंप ने भी यही लाइन दोहराई। लेकिन ईरान ने जवाब दिया—मिसाइलें दागीं, ड्रोन हमले किए, होर्मुज पर ब्लैकमेल किया।

 अब 22-23 मार्च को तस्वीर बदल गई। अराद शहर में ईरानी मिसाइल हमले से 180+ घायल। तेल अवीव, दिमोना पर हमले। आयरन डोम ने कई रोके, लेकिन कुछ घुस गए। नेतन्याहू अराद पहुंचे और बोले: "ईरान सभ्यता का दुश्मन है। बच्चों, परिवारों पर हमला कर रहा है। अब समय है कि दुनिया के नेता हमारे साथ जुड़ें। इजरायल अकेले नहीं लड़ रहा—यह सबके लिए लड़ाई है!" 

यह अपील स्पष्ट है—अमेरिका का साथ मिला है, लेकिन पर्याप्त नहीं। ट्रंप ने होर्मुज खोलने की 48 घंटे की अल्टीमेटम दी, पावर प्लांट्स तबाह करने की धमकी दी। ईरान नहीं माना, बल्कि गल्फ एनर्जी साइट्स पर हमले बढ़ा दिए। अब दोनों "ब्रॉडर कोलिशन" चाहते हैं। 

अगर अमेरिका साथ न होता, तो क्या होता? कल्पना कीजिए—अगर अमेरिका न होता:

 - इजरायल अकेला ईरान से लड़ता—मिसाइल स्टॉक, ड्रोन, प्रॉक्सी (हिजबुल्लाह, हूती) से घिरा होता। 

- ईरान के लंबे रेंज मिसाइल्स इजरायल पर गिरते रहते। 
- अर्थव्यवस्था चरमरा जाती—तेल कीमतें, पर्यटन, निवेश सब ठप।

 - शायद अब तक माफी मांगकर सीजफायर की गुहार लगा चुके होते। 

लेकिन अमेरिका की वजह से इजरायल "मजबूत" दिख रहा है। फिर भी गिड़गिड़ाहट क्यों? क्योंकि युद्ध लंबा खिंच रहा है। ईरान की रेजिलिएंस (सहनशक्ति) कम नहीं हुई। मिसाइल फैक्टरियां तबाह हुईं, लेकिन अंडरग्राउंड स्टॉकपाइल और प्रॉक्सी बचे हैं। ईरान रोजाना हमले कर रहा है, और इजरायल में नागरिक घायल हो रहे हैं। 

 दुनिया को खतरा ईरान से नहीं, इजरायल से है 

यह युद्ध शुरू करने वाला इजरायल है—अमेरिका को साथ मिलाकर ईरान पर हमला। ईरान जवाब दे रहा है, लेकिन आक्रामकता इजरायल की तरफ से शुरू हुई। दुनिया देख रही है: 

- होर्मुज पर ब्लैकमेल ईरान कर रहा है, लेकिन तेल कीमतें बढ़ाने वाला इजरायल-अमेरिका का हमला है। 

- गल्फ देश (सऊदी, यूएई) ईरानी राजनयिक निकाल चुके हैं, लेकिन डायरेक्ट जंग से दूर। 

- यूरोप "यह हमारी जंग नहीं" कह रहा है।

 - चीन, रूस, भारत तेल सप्लाई से चिंतित, लेकिन मदद नहीं दे रहे। 

नेतन्याहू कहते हैं "ईरान खतरा है", लेकिन हकीकत में इजरायल की आक्रामक नीति से क्षेत्र अस्थिर हो रहा है। अगर इजरायल शांत रहता, तो युद्ध न होता। कहावत सटीक बैठती है—गूदा नहीं था, तो मैदान में क्यों कूदा?अमेरिका की छत्रछाया में कूदे, अब निकल नहीं पा रहे। 

वैश्विक प्रभाव: युद्ध का बोझ सब पर 

- तेल कीमतें आसमान छू रही हैं—भारत, यूरोप प्रभावित। - डिजिटल केबल्स पर खतरा—होर्मुज नीचे कटने से इंटरनेट ठप। 

- नागरिक मौतें—ईरान में 1500+, इजरायल में सैकड़ों घायल। 

- मनोवैज्ञानिक दबाव—नेतन्याहू और ट्रंप मदद मांग रहे हैं, दुनिया चुप।

मदद की गुहार, लेकिन जवाब चुप्पी अमेरिका का साथ मिला है, फिर भी नेतन्याहू दुनिया से गिड़गिड़ा रहे हैं। ईरान से नहीं, इजरायल से खतरा है—क्योंकि युद्ध शुरू करने वाला वही है। अगर ताकत नहीं थी, तो क्यों कूदा मैदान में? अब समय है कि दुनिया सोचे—क्या यह "सभ्यता की लड़ाई" है, या आक्रामकता का नतीजा? 

युद्ध लंबा चलेगा, तबाही बढ़ेगी। दुनिया सांस थामे देख रही है—क्या कोई साथ देगा, या इजरायल-अमेरिका अकेले रहेंगे? जवाब मिलने पर पता चलेगा कि असली "गूदा" किसके पास था।

 Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 23,2026