अ-शांति दूत अमेरिका फिर से अपना असली चेहरा दिखा रहा है। जहां पूरी दुनिया शांति और स्थिरता की कामना कर रही है, वहीं वाशिंगटन की सत्ता अपने आर्थिक हितों को बचाने के लिए पश्चिम एशिया को खून से लाल करने की ओर बढ़ रही है। एसोसिएटेड प्रेस और वॉशिंगटन पोस्ट की ताजा रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी मरीन कॉर्प्स की 31वीं एक्सपीडिशनरी यूनिट (31st MEU) मध्य पूर्व पहुंच चुकी है। इसके साथ ही पेंटागन ने ईरान के अंदर हफ्तों तक चलने वाले जमीनी ऑपरेशन का विस्तृत खाका तैयार कर लिया है।
अमेरिका ने क्षेत्र में 3,500 से ज्यादा सैनिक तैनात कर दिए हैं। USS ट्रिपोली पर सवार यह यूनिट अब CENTCOM के क्षेत्र में सक्रिय है। पेंटागन के अधिकारी स्पेशल ऑपरेशन फोर्स और पारंपरिक पैदल सेना को मिलाकर ईरान के अंदर लक्षित रेड्स और लिमिटेड ग्राउंड ऑपरेशन की योजना बना रहे हैं। हालांकि अंतिम फैसला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लेना है।
अ-शांति दूत अमेरिका का खतरनाक मोड़: क्या हो रहा है पश्चिम एशिया में? पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष अब निर्णायक और अत्यंत खतरनाक चरण में पहुंच गया है। एक महीने से ज्यादा समय से चल रहे इस युद्ध में अमेरिका-इजराइल गठबंधन और ईरान के बीच मिसाइलों, ड्रोनों और हवाई हमलों का सिलसिला जारी है। लेकिन अब स्थिति जमीनी स्तर पर पहुंच रही है।
31st MEU में लगभग 2,200 मरीन शामिल हैं, जो USS ट्रिपोली और USS न्यू ऑरलियंस जैसे जहाजों के साथ पहुंचे हैं। कुल 3,500 सैनिक और नाविक इस तैनाती का हिस्सा हैं। यह यूनिट एम्फीबियस असॉल्ट, रेड्स और रणनीतिक स्थानों पर कब्जे के लिए मशहूर है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इसका इस्तेमाल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास या ईरान के तटीय इलाकों में किया जा सकता है – खासकर खार्ग द्वीप जैसे तेल निर्यात केंद्रों पर।
वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, पेंटागन हफ्तों तक चलने वाले ग्राउंड ऑपरेशन की तैयारी कर रहा है। इसमें स्पेशल फोर्सेस के रेड्स और कन्वेंशनल इन्फैंट्री शामिल हो सकती है। अमेरिका का दावा है कि यह पूर्ण आक्रमण नहीं, बल्कि लक्षित कार्रवाई होगी, लेकिन इतिहास बताता है कि ऐसे “लिमिटेड” ऑपरेशन अक्सर बड़े युद्ध में बदल जाते हैं।
ट्रंप प्रशासन ने ईरान को 15-पॉइंट सीजफायर प्लान भेजा था, जिसमें कई सख्त शर्तें शामिल हैं। ईरान ने इसे “अत्यधिक” बताते हुए ठुकरा दिया और अपनी शर्तें रखीं – जिसमें युद्ध क्षतिपूर्ति और संप्रभुता की रक्षा प्रमुख है। एक ओर ट्रंप “हम जीत रहे हैं” का दावा करते हैं, दूसरी ओर नेगोशिएशन की बात करते हैं। इस बीच सैन्य बिल्डअप तेज हो रहा है। 82nd एयरबोर्न डिवीजन के पैराट्रूपर्स भी मध्य पूर्व भेजे जा रहे हैं।
अर्थव्यवस्था के नाम पर लाखों निर्दोषों की कुर्बानी: अमेरिका का पुराना खेल अ-शांति दूत अमेरिका का यह रवैया कोई नया नहीं है। पिछले कई दशकों में उसने इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और सीरिया जैसे देशों में हस्तक्षेप किया। हर बार बहाना अलग रहा – आतंकवाद, हथियार, लोकतंत्र – लेकिन असली मकसद एक ही: तेल संसाधन, वैश्विक बाजार नियंत्रण और आर्थिक वर्चस्व।
इराक युद्ध में लाखों बेगुनाह मारे गए। अफगानिस्तान में 20 साल का कब्जा अंत में तालिबान के हाथों समाप्त हुआ। लीबिया में गद्दाफी के बाद अराजकता फैल गई। अब ईरान की बारी लगी है। अमेरिका का कहना है कि वह ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम और मिसाइल क्षमता को खत्म करना चाहता है, लेकिन गहराई में देखें तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण और तेल बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करना मुख्य वजह है।
दुनिया की अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा असर पड़ सकता है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से रोजाना करोड़ों बैरल तेल गुजरता है। अगर यहां तनाव बढ़ा तो ग्लोबल ऑयल प्राइस आसमान छू सकता है। भारत जैसे विकासशील देश सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे, क्योंकि उनकी ऊर्जा सुरक्षा क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ी है।
ईरान ने साफ चेतावनी दी है कि अगर अमेरिकी सैनिक उसके धरती पर उतरे तो वे उन्हें “आग के हवाले” कर देंगे। ईरानी सेना की ताकत ड्रोन, मिसाइल और असममित युद्ध में है, जो लंबे संघर्ष की क्षमता रखती है।
मानवीय संकट: महिलाएं, बच्चे और आम नागरिक सबसे ज्यादा प्रभावित इस संघर्ष में अब तक हजारों निर्दोष लोग मारे जा चुके हैं। अस्पताल, स्कूल और घर तबाह हो रहे हैं। लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं। खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा व्यवस्था चरमरा गई है। युद्ध का सबसे ज्यादा बोझ महिलाओं और बच्चों पर पड़ रहा है।
दुनिया के कई देश इस बढ़ते तनाव से चिंतित हैं। चीन और रूस अमेरिकी हस्तक्षेप की कड़ी निंदा कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र में बहस हो रही है, लेकिन अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश अक्सर अंतरराष्ट्रीय कानून को अपनी सुविधा के अनुसार तोड़ते हैं।
ट्रंप का रुख विरोधाभासी लगता है। “अमेरिका फर्स्ट” का नारा देते हुए वे युद्ध समाप्त करने की बात करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ सैनिक भेज रहे हैं और पेंटागन ग्राउंड प्लान तैयार कर रहा है। इतिहास गवाह है कि ऐसे ऑपरेशन में अमेरिकी सैनिकों की मौत और लंबा युद्ध दोनों संभावित हैं।
आगे क्या? दुनिया के लिए खतरे की घंटी अभी अंतिम फैसला ट्रंप के हाथ में है। अगर उन्होंने ग्राउंड ऑपरेशन को हरी झंडी दी तो पश्चिम एशिया में आग और भड़क सकती है। इससे सऊदी अरब, यूएई जैसे सहयोगी देश भी प्रभावित होंगे। भारत को कूटनीतिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
दुनिया को अब और युद्ध नहीं, शांति की जरूरत है। अमेरिका को समझना चाहिए कि सैन्य शक्ति से हर समस्या का हल नहीं निकलता। संवाद, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान ही स्थायी समाधान हो सकता है।
लेकिन फिलहाल तस्वीर बेहद चिंताजनक है। 31st MEU की तैनाती और पेंटागन की प्लानिंग से साफ है कि अ-शांति दूत अमेरिका फिर से नर-संहार की राह पर बढ़ रहा है – सिर्फ अपने आर्थिक हितों के लिए। अब तक करोड़ों बेगुनाहों की जान जा चुकी है। क्या दुनिया इस बार भी चुप रहेगी? या अब समय आ गया है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय मिलकर ऐसे एकतरफा हस्तक्षेपों को रोकने के लिए कदम उठाए?
अ-शांति दूत अमेरिका की यह नीति न सिर्फ क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाल रही है, बल्कि पूरी दुनिया की शांति और समृद्धि को प्रभावित कर रही है। अब सवाल यह है – क्या मानवता इस बार आवाज उठाएगी?
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 30,2026