-Friday World March 30,2026
अ-शान्ति दूत अमेरिका-इजराइल का तानाशाह सद्दाम को समर्थन ओर : ईरान-इराक युद्ध (1980-1988) में खूनी खेल और लाखों जिंदगियों का नुकसान
1980-1988 का ईरान-इराक युद्ध मध्य पूर्व का सबसे लंबा, सबसे खूनी और सबसे विनाशकारी संघर्ष साबित हुआ। 22 सितंबर 1980 को इराक के ईरान पर अचानक हमले से शुरू यह युद्ध आठ साल तक चला और अंत में 1988 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से युद्धविराम हुआ। इस दौरान दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं तबाह हो गईं, लाखों युवा सैनिक और नागरिक मारे गए, और क्षेत्र में सदियों तक याद रहने वाला घाव पैदा हुआ।
अ-शान्ति दूत अमेरिका-इजराइल की भूमिका इस युद्ध को लंबा खींचने और ज्यादा खूनी बनाने में निर्णायक रही। अमेरिका ने इराक को खुलकर समर्थन दिया, जबकि इजरायल ने क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने के नाम पर अपनी रणनीति अपनाई। खाड़ी के अरब देशों ने इराक को अरबों डॉलर की मदद देकर युद्ध को जारी रखा। परिणामस्वरूप अनुमानित **5 लाख से 10 लाख** से ज्यादा लोग मारे गए, जिनमें सैनिक और नागरिक दोनों शामिल हैं। ईरान को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ।
युद्ध की पृष्ठभूमि और शुरूआत 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई। शाह का शासन खत्म हुआ और आयतुल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में नया शासन स्थापित हुआ। ईरान ने अमेरिका को "ग्रेट सैटन" कहा और क्षेत्र में इस्लामिक क्रांति फैलाने की कोशिश शुरू की। सद्दाम हुसैन शासित इराक को यह खतरा लगा। इराक ने ईरान की कमजोर स्थिति का फायदा उठाते हुए 22 सितंबर 1980 को हमला बोल दिया। शुरुआती हमलों में इराक ने कुछ सफलता हासिल की, लेकिन ईरान की जनता और बसीज मिलिशिया ने भारी प्रतिरोध किया।
युद्ध जल्दी खत्म होने की बजाय लंबा खिंच गया। दोनों तरफ ट्रेंच वॉर, मानव तरंग हमले, रासायनिक हथियार और शहरों पर मिसाइल हमले हुए। यह युद्ध प्रथम विश्व युद्ध की याद दिलाता था – खाइयों में लड़ाई, तोपखाने की बौछार और भारी जनहानि।
मौतों का भयानक आंकड़ा ईरान-इराक युद्ध में मौतों का सटीक आंकड़ा विवादास्पद है, लेकिन विभिन्न विश्वसनीय अनुमान भयावह हैं:
- कुल मौतें: 5 लाख से 10 लाख या उससे ज्यादा (Britannica, Wikipedia और अन्य अध्ययनों के अनुसार)।
- सैनिक मौतें: लगभग 5 लाख के आसपास। ईरान की तरफ ज्यादा नुकसान – कुछ अनुमान ईरानी सैनिकों की मौत 7.5 लाख तक बताते हैं, जबकि इराकी पक्ष में 2.5 लाख से 5 लाख।
- नागरिक मौतें: 1 लाख से ज्यादा, जिसमें "शहरों का युद्ध" (War of the Cities) में मिसाइल हमलों से हुई मौतें शामिल हैं।
- कुर्दों पर अनफाल अभियान (1988): इराक ने अपने ही कुर्द नागरिकों पर रासायनिक हमले किए, जिसमें 50,000 से 1 लाख कुर्द मारे गए (Halabja सहित)।
- कुल मिलाकर कुछ अध्ययन 10 लाख से 20 लाख तक कुल हताहत (मारे गए + घायल) बताते हैं। ईरान ने सबसे ज्यादा युवा खोए। बसीज संगठन ने अकेले 1.55 लाख "शहीदों" का आंकड़ा जारी किया था।
ये मौतें सिर्फ युद्धक्षेत्र की नहीं थीं। रासायनिक हथियारों (मस्टर्ड गैस, सारिन आदि) से हजारों लोग तुरंत मरे या बाद में कैंसर और अन्य बीमारियों से। लाखों घायल जीवन भर विकलांग रहे। दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को 1 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का नुकसान हुआ।
अमेरिका की भूमिका: इराक को मजबूत बनाना अमेरिका ने युद्ध के दौरान इराक को खुलकर समर्थन दिया। 1979 की क्रांति के बाद अमेरिका ईरान को बड़ा खतरा मानता था। अमेरिका की नीति थी कि इराक हार न जाए, वरना क्षेत्र में ईरानी प्रभाव बढ़ जाएगा और तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती थी।
अमेरिका ने इराक को:
- अरबों डॉलर की आर्थिक सहायता और कृषि क्रेडिट दिए।
- सैटेलाइट इमेजरी और खुफिया जानकारी प्रदान की, जिससे इराक ईरानी ठिकानों पर हमले कर सके।
- डुअल-यूज टेक्नोलॉजी (दोहरे उपयोग वाली तकनीक) दी, जो हथियार निर्माण में काम आ सकती थी।
- इराक के रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल की जानकारी होने के बावजूद अमेरिका ने मजबूत विरोध नहीं किया। CIA दस्तावेजों से पता चलता है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियां जानती थीं कि इराक ईरान पर केमिकल अटैक कर रहा है, लेकिन उन्होंने इराक को और जानकारी दी ताकि इराक युद्ध में आगे रहे।
1983-1988 के दौरान इराक ने ईरानी सैनिकों पर रासायनिक हथियारों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। अमेरिका ने इसे "अनिवार्य" मानते हुए इराक को सपोर्ट जारी रखा। रीगन प्रशासन ने Operation Staunch चलाया, जिसमें दूसरे देशों को ईरान को हथियार न बेचने के लिए दबाव डाला गया।
इरान-कॉन्ट्रा अफेयर में अमेरिका की नीति और जटिल हो गई, लेकिन कुल मिलाकर अमेरिका इराक को टिकाए रखने में सफल रहा। बाद में 1991 और 2003 में अमेरिका ने इराक के खिलाफ मोर्चा खोला, लेकिन 1980 के दशक में इराक को "बफर" मानकर मदद की।
इजरायल की रणनीतिक भूमिका इजरायल ने भी अपनी सुरक्षा हितों के अनुसार कदम उठाए। इजरायल को सद्दाम हुसैन का इराक बड़ा खतरा लगा, खासकर इराक के परमाणु कार्यक्रम को देखते हुए। 1981 में इजरायल ने इराक के ओसिराक न्यूक्लियर रिएक्टर पर हमला किया।
युद्ध के दौरान इजरायल ने क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने के लिए कुछ कदम उठाए। इजरायल चाहता था कि युद्ध लंबा चले ताकि दोनों देश कमजोर हों और कोई एक पक्ष बहुत मजबूत न हो। इजरायल ने इराक को कुछ हथियार और स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति में भूमिका निभाई, जिससेइ इराकी वायुसेना सक्रिय रही। अनुमान है कि 1981-1983 में ही **500 मिलियन डॉलर** से ज्यादा के हथियारों की आपूर्ति हुई। अमेरिका ने इन कदमों को चुपचाप मंजूरी दी।
इजरायल को ईरानी खुफिया जानकारी भी मिली, जिसने उसके सुरक्षा हितों में मदद की। कुल मिलाकर इजरायल की नीति "दोनों को कमजोर रखना" रही, जिससे युद्ध लंबा खिंचा और मौतों की संख्या बढ़ी।
खाड़ी देशों का इराक के पक्ष में खुला समर्थन खाड़ी के अरब देशों ने इराक को आर्थिक और राजनीतिक रूप से मजबूत समर्थन दिया। इन देशों को ईरान की इस्लामिक क्रांति से सबसे ज्यादा डर था, क्योंकि शिया क्रांति उनके सुन्नी शासन को चुनौती दे सकती थी।
- सऊदी अरब: इराक को सबसे बड़ा वित्तीय सहयोगी। अनुमान के मुताबिक **200 अरब डॉलर** तक की मदद (ऋण और अनुदान) दी गई। सऊदी ने तेल उत्पादन बढ़ाकर बाजार में कीमतें गिराईं, जिससे ईरान की तेल आय प्रभावित हुई।
- कुवैत: शिया बाहुल इराक को बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता दी। युद्ध के दौरान कुवैत ने इराकी जहाजों को सुरक्षा देने के लिए अपना झंडा इस्तेमाल करने की अनुमति दी। कुल मिलाकर खाड़ी देशों से इराक को 160 अरब डॉलर से ज्यादा की मदद मिली।
- बहरीन: यहां शिया बहुल आबादी होने के बावजूद सरकार अमेरिका और इजराइल समर्थक नीतियों वाली थी। बहरीन ने भी इराक के पक्ष में राजनीतिक और सीमित आर्थिक सहयोग किया।
- संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर और अन्य GCC देशों ने वित्तीय मदद, तेल नीति में समन्वय और राजनीतिक समर्थन दिया।
इन देशों का मानना था कि इराक एक "बफर" की तरह काम कर रहा है। युद्ध लंबा खिंचने से ईरान की सेना इराक में घुस नहीं पाई। लेकिन युद्ध के बाद इराक इन देशों पर कर्ज चुकाने के लिए दबाव डालता रहा, जिसका असर 1990 में कुवैत पर इराक के आक्रमण में दिखा।
अन्य देशों की भूमिका
- सोवियत संघ, फ्रांस, चीन: इराक को मुख्य हथियार सप्लायर (90% से ज्यादा हथियार इनसे)।
- ईरान के पक्ष में: सीरिया, लीबिया, उत्तर कोरिया और कुछ हद तक चीन ने सीमित मदद दी। ईरान ज्यादातर अकेला पड़ा रहा।
युद्ध का अंत और दीर्घकालिक प्रभाव 1988 में दोनों देश थक चुके थे। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 598 के तहत युद्धविराम हुआ। सद्दाम हुसैन ने इसे अपनी जीत बताया, लेकिन इराक भारी कर्ज में डूब गया। ईरान ने भारी जनहानि झेली लेकिन क्रांति बची रही।
इस युद्ध ने मध्य पूर्व की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया। अमेरिका-इजराइल की रणनीति ने युद्ध को लंबा खींचा, जिससे लाखों जिंदगियां गईं। बाद में अमेरिका ने 1991 में इराक पर हमला किया और 2003 में सद्दाम को सत्ता से हटाया। क्षेत्र में आज भी अविश्वास और अस्थिरता बनी हुई है।
अ-शान्ति दूत अमेरिका-इजराइल** की नीतियां दिखाती हैं कि बड़े देश अपने हितों के लिए छोटे देशों को युद्ध के मैदान में धकेल देते हैं। ईरान-इराक युद्ध इसका सबसे बड़ा सबूत है – जहां अंतरराष्ट्रीय समर्थन और खाड़ी देशों की मदद से युद्ध आठ साल चला और लाखों मासूम जिंदगियां खत्म हो गईं।
आज जब हम मध्य पूर्व के तनाव देखते हैं, तो 1980-88 के इस खूनी अध्याय को याद करना जरूरी है। शांति की बात करने वाले देशों की असली भूमिका अक्सर अ-शांति फैलाने वाली साबित होती है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 30,2026