-Friday World March 10,2026
वर्तमान समय में मध्य पूर्व में अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच चल रहा युद्ध वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला रहा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर खतरा मंडरा रहा है, जहां दुनिया का लगभग 20% तेल और काफी मात्रा में प्राकृतिक गैस गुजरता है। भारत, जो अपनी 80-85% कच्चे तेल की जरूरत आयात करता है और उसका बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आता है, इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में शुमार है।
युद्ध शुरू होने के बाद से ही ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 80-90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई हैं, जबकि कुछ समय पहले यह 65-70 डॉलर के स्तर पर थी। प्राकृतिक गैस और एलपीजी की कीमतों में भी 40-50% तक उछाल आया है।
यह युद्ध सिर्फ ऊर्जा कीमतों तक सीमित नहीं है। भारत में इससे जुड़े उद्योग, कृषि, होटल, सिरेमिक, डायमंड जैसे क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश से लेकर गुजरात, कर्नाटक और अन्य राज्यों तक आर्थिक तबाही फैल रही है। घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत में 60 रुपये की बढ़ोतरी से आम आदमी की जेब पर बोझ बढ़ा है, जबकि कमर्शियल गैस की सप्लाई रुकने से उद्योग ठप पड़ रहे हैं। यह लेख इसी संकट की गहराई को समझाता है।
ऊर्जा संकट का केंद्र: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का खतरा** स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का सबसे संकरी और महत्वपूर्ण ऊर्जा गलियारा है। ईरान ने युद्ध के दौरान इस पर हमले और ब्लॉकेज की धमकी दी, जिससे टैंकर ट्रैफिक लगभग ठप हो गया। भारत का लगभग 40-50% कच्चा तेल और एलएनजी इसी मार्ग से आता है। युद्ध के कारण जहाजों को केप ऑफ गुड होप के रास्ते लंबा चक्कर लगाना पड़ रहा है, जिससे फ्रेट कॉस्ट बढ़ गई है और सप्लाई में देरी हो रही है।
परिणामस्वरूप, क्रूड ऑयल की कीमतें तेजी से बढ़ीं। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, कीमतें 100 डॉलर के करीब पहुंच सकती हैं अगर संकट लंबा खिंचा। भारत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से इम्पोर्ट बिल में 13-14 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ता है, जो ट्रेड डेफिसिट बढ़ाता है और रुपए को कमजोर करता है।
घरेलू स्तर पर असर: एलपीजी सिलेंडर और कमर्शियल गैस** युद्ध के तुरंत बाद भारत में घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत में 60 रुपये की बढ़ोतरी हुई, जो दिल्ली में 913 रुपये तक पहुंच गई। कमर्शियल सिलेंडर में 114-115 रुपये की छलांग लगी। यह पहली बार है जब इतने लंबे समय बाद कीमतें बढ़ी हैं।
बुकिंग में जबरदस्त बदलाव आया है—पहले जहां आसानी से बुक हो जाता था, अब देरी और कमी की शिकायतें बढ़ गई हैं। लाखों परिवारों के लिए खाना बनाना महंगा हो गया है। कमर्शियल गैस की सप्लाई रुकने से होटल और रेस्तरां उद्योग ठप पड़ रहे हैं। बेंगलुरु जैसे शहरों में होटल उद्योग बुरी तरह प्रभावित है, जहां कमर्शियल गैस की कमी से किचन बंद हो गए हैं।
उत्तर प्रदेश: कृषि और सब्जी-मीट सप्लाई चेन पर हमला** उत्तर प्रदेश, जो भारत का सबसे बड़ा कृषि राज्य है, इस संकट से बुरी तरह प्रभावित हुआ है। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट बढ़ गया, जिससे सब्जी, मीट और अन्य उत्पादों की सप्लाई रुक गई। राज्य को करीब 1000 करोड़ रुपये का नुकसान अनुमानित है।
ट्रक ड्राइवरों की परेशानी, ईंधन की महंगाई और सप्लाई चेन ब्रेकडाउन से बाजारों में सब्जियां सड़ रही हैं या महंगी हो गई हैं। किसानों को अपनी उपज बेचने में दिक्कत हो रही है, जबकि उपभोक्ताओं को महंगाई का सामना करना पड़ रहा है। यह सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक संकट भी है।
गुजरात का सिरेमिक उद्योग: मोरबी में तबाही** गुजरात का मोरबी सिरेमिक टाइल्स का हब है, जहां 600 से अधिक फैक्टरियां हैं और 4 लाख से ज्यादा मजदूर काम करते हैं। युद्ध के कारण प्रोपेन और नेचुरल गैस की सप्लाई रुक गई। गुजरात गैस और इंडियन ऑयल ने सप्लाई रोक दी।
परिणाम: 50-100 से अधिक फैक्टरियां बंद हो गईं। एक फैक्टरी में औसतन 100 मजदूर काम करते हैं, तो 10,000 से ज्यादा मजदूर बेरोजगार हो गए। इन मजदूरों की सैलरी से उनके परिवार चलते थे—अब वे बुरी तरह प्रभावित हैं। सिरेमिक उद्योग भारत का बड़ा एक्सपोर्टर है, लेकिन अब उत्पादन ठप होने से निर्यात प्रभावित हो रहा है।
सूरत का डायमंड उद्योग: पुरानी यादें ताजा** एक साल पहले सूरत के डायमंड उद्योग में मंदी आई थी, जिससे लाखों कारीगर प्रभावित हुए। बच्चे की स्कूल फीस न भर पाने के कारण हजारों छात्र स्कूल छोड़कर सौराष्ट्र लौट गए थे। अब युद्ध से रफ डायमंड की सप्लाई प्रभावित हो सकती है, क्योंकि मध्य पूर्व से काफी आयात होता है। अगर संकट बढ़ा तो पुरानी तबाही दोहराई जा सकती है।
रूस का तेल: डिस्काउंट खत्म, प्रीमियम पर मिल रहा** रूस भारत को डिस्काउंट पर तेल देता था, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। युद्ध के कारण रूस अब प्रीमियम पर तेल बेच रहा है। ईरान पहले रुपये में तेल बेचता था, लेकिन अब न रुपये में, न डॉलर में—सोने या गोल्ड से ट्रेड करने को उत्सुक है। अमेरिका ने भारत को 30 दिनों के लिए रूसी तेल खरीदने की छूट दी है, लेकिन डिस्काउंट अब नहीं मिल रहा।
आगे क्या? व्यापक आर्थिक तबाही की आशंका यह युद्ध अगर लंबा चला तो मुद्रास्फीति बढ़ेगी, फिस्कल डेफिसिट बढ़ेगा, रुपया कमजोर होगा। सरकार सब्सिडी बढ़ा सकती है, लेकिन बजट पर बोझ पड़ेगा। रेमिटेंस (मध्य पूर्व से आने वाली) प्रभावित हो सकती है।
भारत को ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की जरूरत है—रिन्यूएबल एनर्जी, स्टॉकपाइल बढ़ाना और विविध स्रोतों से आयात। लेकिन फिलहाल, आम आदमी से लेकर उद्योग तक सब पर असर पड़ रहा है।
यह युद्ध सिर्फ मध्य पूर्व का नहीं, भारत की अर्थव्यवस्था का भी है। लाखों परिवारों की जिंदगी दांव पर लगी है।
(Sajjadali Nayani ✍
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