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Tuesday, 24 March 2026

युद्ध उन्माद का महँगा खेल: इजराइल-अमेरिका की जंग फिलिस्तीन और लेबनान की लाशों पर, दुनिया का अर्थतंत्र तबाह

युद्ध उन्माद का महँगा खेल: इजराइल-अमेरिका की जंग फिलिस्तीन और लेबनान की लाशों पर, दुनिया का अर्थतंत्र तबाह-Friday World March 24,2026

दुनिया भर के बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता अब खुलकर कह रहे हैं — यह कोई आत्मरक्षा की जंग नहीं, बल्कि युद्ध उन्मादी इजराइल और उसके अमेरिकी समर्थक का आतंकवाद है, जिसकी कीमत फिलिस्तीनियों और लेबनानियों की जानों के रूप में चुकाई जा रही है। मार्च 2026 तक गाजा में 75,000 से अधिक फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं, जिनमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे हैं। लेबनान में इस साल मार्च के शुरू से ही 1,000 से ज्यादा लोग इजराइली हमलों में शहीद हो चुके हैं। अगर नेतन्याहू-ट्रंप का यह युद्ध उन्माद न होता, तो वैश्विक अर्थतंत्र आज भी संतुलित चल रहा होता — तेल की कीमतें सामान्य, मुद्रास्फीति नियंत्रित और विकास दर स्थिर। लेकिन अब इजराइल-ट्रंप गठजोड़ झूठा प्रोपेगैंडा फैलाकर दुनिया से समर्थन मांग रहा है। 

यह कोई अतिशयोक्ति नहीं। स्वतंत्र अध्ययनों और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट्स के अनुसार, गाजा युद्ध में मौतों की संख्या आधिकारिक आंकड़ों से भी ज्यादा है। द लैंसेट जर्नल और अन्य पीयर-रिव्यूड रिसर्च बताते हैं कि अक्टूबर 2023 से अब तक 75,200 से ज्यादा हिंसक मौतें हुई हैं, साथ ही 16,000 से अधिक गैर-हिंसक मौतें भुखमरी, बीमारी और मलबे में दबने से हुई हैं। इनमें 248 पत्रकार, 120 से ज्यादा शिक्षाविद् और 224 से अधिक मानवीय कार्यकर्ता शामिल हैं। इजराइल खुद भी गुप्त रूप से गाजा स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों को 70,000 से अधिक मौतों के रूप में स्वीकार कर चुका है। 

लेबनान की स्थिति और भयावह है। मार्च 2026 में इजराइली हमलों से 1,001 से 1,204 तक लोग मारे गए, जिनमें 79 महिलाएं, 118 बच्चे और 40 स्वास्थ्यकर्मी शामिल हैं। घायलों की संख्या 2,740 से ऊपर पहुंच चुकी है। एक मिलियन से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं — यानी लेबनान की कुल आबादी का 20%। यह सब “आत्मरक्षा” के नाम पर हो रहा है, जबकि हकीकत में इजराइल क्षेत्रीय विस्तार और प्रतिरोध को कुचलने की कोशिश कर रहा है। 

नेतन्याहू-ट्रंप का युद्ध उन्माद: “इजराइल फर्स्ट” की कीमत पूरी दुनिया चुक रही है ट्रंप का चुनावी नारा “अमेरिका फर्स्ट” अब पूरी तरह “इजराइल फर्स्ट” में बदल चुका है। फरवरी 2026 के अंत में इजराइल के साथ मिलकर अमेरिका ने ईरान पर हमले शुरू किए। नेतन्याहू ने ट्रंप को फोन पर समझाया कि “खामेनेई और उसके परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने का यही समय है”। ट्रंप ने मंजूरी दे दी। अब जब ईरान की मिसाइलें जवाब दे रही हैं, इराक से NATO सैनिक भाग रहे हैं और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव चरम पर है, तब ट्रंप कह रहे हैं — “मैंने युद्ध शुरू नहीं किया, पेटे हेगसेथ ने कहा था”। लेकिन हर फैसले के पीछे नेतन्याहू की छाया साफ दिख रही है।

 यह युद्ध उन्माद वैश्विक अर्थव्यवस्था को बुरी तरह हिला रहा है। ईरान युद्ध शुरू होने के बाद ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 50% तक बढ़ गई हैं। कई रिपोर्ट्स के अनुसार तेल अब 100-125 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच चुका है। इससे मुद्रास्फीति बढ़ रही है, परिवहन लागत बढ़ रही है और विकासशील देशों में खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ गई है। भारत जैसे देशों को सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है, क्योंकि हमारा ऊर्जा आयात मुख्य रूप से खाड़ी क्षेत्र से होता है। अगर यह युद्ध न होता, तो 2026 की वैश्विक अर्थव्यवस्था स्थिर विकास दर के साथ आगे बढ़ रही होती — लेकिन अब मंदी की आशंका गहरा रही है।

 विश्व के बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक ठंडे दिमाग से इस हत्याकांड को देख रहे हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता, मानवाधिकार संगठन और स्वतंत्र पत्रकार बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि इजराइल की कार्रवाई “युद्ध अपराध” और “नरसंहार” की श्रेणी में आ सकती है। हजारों बच्चे अनाथ हो चुके हैं, स्कूल और अस्पताल मलबे में तब्दील हो गए हैं, और पूरा क्षेत्र मानवीय संकट से जूझ रहा है। फिर भी नेतन्याहू और ट्रंप मीडिया के जरिए “हम आतंकवाद के खिलाफ लड़ रहे हैं” का झूठा प्रोपेगैंडा फैला रहे हैं। 

 हकीकत बनाम प्रोपेगैंडा

 इजराइल-अमेरिका गठजोड़ दावा करता है कि वे “आतंकवाद” के खिलाफ लड़ रहे हैं। लेकिन आंकड़े कुछ और कहते हैं — गाजा में मारे गए 75,000 से ज्यादा लोगों में ज्यादातर आम नागरिक हैं। लेबनान में भी बच्चों और महिलाओं की मौत हो रही है। ईरान पर हमले में भी सैकड़ों निर्दोष मारे जा चुके हैं। अगर यह आत्मरक्षा होती, तो क्यों इराक से NATO भाग रहा है? क्यों सीरिया में अमेरिकी ठिकाने दबाव में हैं? क्यों तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं?

 यह युद्ध उन्माद न सिर्फ जान-माल का नुकसान कर रहा है, बल्कि वैश्विक शांति और स्थिरता को भी खतरे में डाल रहा है। दुनिया के वैज्ञानिक चेतावना दे रहे हैं कि अगर तुरंत युद्धविराम नहीं हुआ, तो पर्यावरणीय क्षति, भुखमरी और प्रवासन का संकट और गहरा होगा। बुद्धिजीवी पूछ रहे हैं — क्या इजराइल की सुरक्षा के नाम पर पूरी दुनिया की कीमत चुकानी पड़ेगी? 

नेतन्याहू-ट्रंप का यह गठबंधन अब दुनिया के सामने नंगा हो चुका है। एक तरफ वे “शांति” और “रेजीम चेंज” की बात करते हैं, दूसरी तरफ लाशों का ढेर बढ़ाते जा रहे हैं। इराक आजाद होने की राह पर है, ईरान मजबूती से खड़ा है, लेकिन फिलिस्तीन और लेबनान अभी भी खून से लथपथ हैं। 

अब क्या? दुनिया भर के देशों को अब जागना होगा। संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और वैश्विक बुद्धिजीवी वर्ग को ठंडे दिमाग से फैसला करना होगा — क्या वे युद्ध उन्मादियों के प्रोपेगैंडा का साथ देंगे या मानवता की आवाज बनेंगे? भारत जैसे देशों को भी अपनी ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय हितों को ध्यान में रखकर स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए। 

नेतन्याहू और ट्रंप का युद्ध उन्माद न सिर्फ मध्य पूर्व को तबाह कर रहा है, बल्कि पूरी दुनिया के अर्थतंत्र को हिला रहा है। फिलिस्तीन में 75,000 से ज्यादा शहीद, लेबनान में 1,000 से ज्यादा मौतें — यह आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि इंसानियत पर सवाल हैं। अगर यह उन्माद जारी रहा, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।

 समय आ गया है कि दुनिया झूठे प्रोपेगैंडे को नकारे और सच्चाई को स्वीकार करे — यह जंग फिलिस्तीन और लेबनान के निर्दोष लोगों की हत्या की जंग है, जिसे इजराइल-अमेरिका “आत्मरक्षा” का नाम दे रहे हैं। 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 24,2026