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Tuesday, 24 March 2026

"ट्रंप का “अमेरिका फर्स्ट” नारा अब “इजराइल फर्स्ट” हो गया: क्या युद्ध-उन्मादी नेतन्याहू ने ट्रंप को हैक कर लिया है?"

"ट्रंप का “अमेरिका फर्स्ट” नारा अब “इजराइल फर्स्ट” हो गया: क्या युद्ध-उन्मादी नेतन्याहू ने ट्रंप को हैक कर लिया है?"-Friday World March 24,2026 
24 मार्च 2026। जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध का चौथा सप्ताह चल रहा है, तेल की कीमतें १२५ डॉलर प्रति बैरल पार कर चुकी हैं, इराक से NATO सैनिक भाग रहे हैं और अमेरिकी सैनिकों की मौत की संख्या बढ़ रही है, तब डोनाल्ड ट्रंप का पुराना नारा “अमेरिका फर्स्ट” पूरी तरह गायब हो चुका है। अब हर बयान, हर फैसला और हर बम इजराइल की सुरक्षा और बेंजामिन नेतन्याहू की मांगों के इर्द-गिर्द घूम रहा है। सवाल अब यह नहीं है कि ट्रंप ईरान युद्ध चाहते थे या नहीं—सवाल यह है कि क्या युद्ध-उन्मादी नेतन्याहू ने अमेरिका के राष्ट्रपति को पूरी तरह “हैक” कर लिया है? 

ट्रंप ने २०१६ और २०२४ के चुनाव में “अमेरिका फर्स्ट” को अपना मुख्य स्लोगन बनाया था। उन्होंने वादा किया था कि अमेरिका अब किसी और देश की लड़ाई नहीं लड़ेगा, अफगानिस्तान से निकलेंगे, मिडिल ईस्ट में अनावश्यक युद्ध खत्म करेंगे और अमेरिकी टैक्सपेयर का पैसा अमेरिका के अंदर लगाएंगे। लेकिन फरवरी २०२६ में जब इजराइल के साथ मिलकर ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले शुरू हुए, तो “अमेरिका फर्स्ट” का नारा अचानक “इजराइल फर्स्ट” में बदल गया।

 ट्रंप खुद कई बार कह चुके हैं: “इजराइल की सुरक्षा अमेरिका की सुरक्षा है।” लेकिन अब जब युद्ध अमेरिका को भारी पड़ रहा है, तब भी ट्रंप हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में सबसे पहले इजराइल की तारीफ करते हैं। हाल ही में जब उन्होंने पेटे हेगसेथ पर ईरान युद्ध शुरू करने का दोष डाला, तब भी उन्होंने कहा, “हम इजराइल को कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे।” यह बयान कई लोगों को चौंका रहा है। क्या ट्रंप वाकई अमेरिका के हितों की रक्षा कर रहे हैं या वे नेतन्याहू के इशारों पर नाच रहे हैं? 

क्या नेतन्याहू ने ट्रंप को “हैक” कर लिया है?

 यह सवाल अब सिर्फ सोशल मीडिया पर नहीं, बल्कि वॉशिंगटन के गलियारों में भी जोर-शोर से उठ रहा है। नेतन्याहू पिछले कई दशकों से अमेरिकी राजनीति में गहरी पैठ रखते हैं। उन्होंने ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी अमेरिकी दूतावास को यरुशलम शिफ्ट करवाया, गोलान हाइट्स पर इजराइल का कब्जा मान्य करवाया और अब्राहम एक्सॉर्ड करवाया। लेकिन इस बार मामला अलग है। ईरान पर हमले की योजना इजराइल ने ही सबसे पहले ट्रंप प्रशासन के सामने रखी थी। कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि नेतन्याहू ने ट्रंप को फोन पर समझाया कि “अब समय आ गया है, ईरान को रोकना जरूरी है।” 

ट्रंप ने शुरू में हिचकिचाया भी, लेकिन कुछ दिनों बाद उन्होंने पूर्ण समर्थन दे दिया। अब जब युद्ध लंबा खिंच रहा है और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ रहा है, तब ट्रंप नेतन्याहू के साथ फोटो सेशन और जॉइंट स्टेटमेंट जारी करने में व्यस्त हैं, जबकि घरेलू स्तर पर महंगाई और बेरोजगारी बढ़ रही है। 

कई राजनीतिक विश्लेषक अब खुलकर कह रहे हैं कि ट्रंप पर नेतन्याहू का “अनहेल्दी इन्फ्लुएंस” है। कुछ तो यह तक कह रहे हैं कि क्या नेतन्याहू के पास ट्रंप की कोई “फाइल” है? क्या कोई पुरानी वीडियो, फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन या कोई ऐसा राज है जो ट्रंप को मजबूर कर रहा है कि वे इजराइल की हर मांग मान लें, भले ही उससे अमेरिका का नुकसान हो? 

हालांकि इन सवालों के कोई ठोस सबूत अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं, लेकिन ट्रंप का व्यवहार इन अफवाहों को हवा दे रहा है। जब ट्रंप ने कहा कि “मैंने युद्ध शुरू नहीं किया, पेटे ने कहा था”, तब भी उन्होंने तुरंत जोड़ा—“लेकिन इजराइल की सुरक्षा सबसे ऊपर है।” यह वाक्य उनके “अमेरिका फर्स्ट” वाले पुराने ट्रंप से बिल्कुल अलग लगता है। 

इजराइल फर्स्ट की कीमत अमेरिका चुक रहा है ईरान युद्ध शुरू होने के बाद: 

- इराक से NATO सैनिकों का पलायन हो रहा है 

- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तेल टैंकरों पर खतरा बढ़ गया है 

- अमेरिकी सैन्य बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है

 - वैश्विक तेल की कीमतें बढ़ने से भारत, यूरोप और अमेरिका की आम जनता प्रभावित हो रही है 

फिर भी ट्रंप हर भाषण में इजराइल की प्रशंसा करते नहीं थकते। उन्होंने हाल ही में कहा, “बेंजामिन मेरा बहुत अच्छा दोस्त है। हम साथ मिलकर ईरान को सबक सिखाएंगे।” जबकि अमेरिकी सैनिक इराक और सीरिया में खतरे में हैं। 

यह स्थिति २००३ के इराक युद्ध की याद दिलाती है, जब जॉर्ज बुश ने सद्दाम हुसैन को हटाने के नाम पर युद्ध शुरू किया था। उस समय भी इजराइल लॉबी सक्रिय थी। आज फिर वही कहानी दोहराई जा रही है, लेकिन इस बार ट्रंप के “अमेरिका फर्स्ट” नारे के साथ। 

क्या ट्रंप वाकई स्वतंत्र फैसले ले रहे हैं? ट्रंप के कई पूर्व सलाहकार अब खुलकर कह रहे हैं कि राष्ट्रपति इजराइल की नीतियों से पूरी तरह प्रभावित हैं। एक पूर्व अधिकारी ने कहा, “ट्रंप को लगता है कि इजराइल को सपोर्ट करने से उनके इवेंजेलिकल बेस को खुशी मिलेगी, लेकिन वे भूल रहे हैं कि अमेरिकी टैक्सपेयर का पैसा कहां जा रहा है।”

 दूसरी तरफ ईरान ने साबित कर दिया है कि वह अकेला नहीं लड़ रहा। इराक, लेबनान, यमन और सीरिया में फैले प्रतिरोध गुटों ने अमेरिकी और इजराइली ठिकानों पर हमले तेज कर दिए हैं। इराक से NATO का पलायन इसी का नतीजा है। अब सीरिया में जोलानी सरकार भी अमेरिकी समर्थन पर सवाल उठा रही है। 

ट्रंप अगर वाकई “अमेरिका फर्स्ट” मानते हैं, तो उन्हें तुरंत युद्धविराम की दिशा में कदम उठाना चाहिए। लेकिन वे अभी भी नेतन्याहू के साथ खड़े हैं और कह रहे हैं कि “ईरान को पूरी तरह नेस्तनाबूद करना है।” यह बयान उनके अपने नारे के खिलाफ है। 

 सवाल जो हर कोई पूछ रहा है 

1. क्या ट्रंप को नेतन्याहू ने इतना प्रभावित कर लिया है कि वे अमेरिका के हितों को पीछे रख रहे हैं? 

2. क्या इजराइल लॉबी (AIPAC) की फंडिंग और राजनीतिक दबाव ट्रंप को मजबूर कर रहा है? 

3. या फिर कोई पुरानी “फाइल” है जो नेतन्याहू के पास है और ट्रंप को ब्लैकमेल कर रही है? 

ये सवाल अभी जवाब की तलाश में हैं, लेकिन ट्रंप का व्यवहार इन सवालों को और मजबूत कर रहा है। जब “अमेरिका फर्स्ट” का नारा “इजराइल फर्स्ट” में बदल जाता है, तब यह सिर्फ शब्दों का खेल नहीं रह जाता—यह अमेरिकी विदेश नीति का पूरा दिशा-परिवर्तन हो जाता है।

 मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। ईरान मजबूती से खड़ा है, इराक आजादी की ओर बढ़ रहा है और अमेरिका अपनी सेनाओं को वापस बुला रहा है। ऐसे में अगर ट्रंप अभी भी नेतन्याहू के इशारों पर चल रहे हैं, तो इतिहास उन्हें “अमेरिका फर्स्ट” का नारा देने वाले राष्ट्रपति के रूप में नहीं, बल्कि “इजराइल फर्स्ट” के सबसे बड़े समर्थक के रूप में याद रखेगा।

 ट्रंप का युद्ध-उन्माद अब सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं है। यह अमेरिका की स्वतंत्र विदेश नीति को भी चुनौती दे रहा है। क्या ट्रंप खुद को इस जाल से बाहर निकाल पाएंगे या नेतन्याहू का प्रभाव और गहरा होता जाएगा? समय बताएगा। लेकिन आज की हकीकत यही है कि “अमेरिका फर्स्ट” का नारा अब सिर्फ चुनावी भाषणों तक सिमट कर रह गया है।

 Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 24,2026