नई दिल्ली, 4 अप्रैल 2026। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2 अप्रैल 2026 को एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर कर आयातित पेटेंटेड (ब्रांडेड) दवाओं और उनके सक्रिय फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की है। यह फैसला ट्रेड एक्सपैंशन एक्ट की धारा 232 के तहत लिया गया है, जिसका उद्देश्य अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा और दवा आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना बताया गया है।
ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि अमेरिका में जीवनरक्षक दवाओं और उनके कच्चे माल के लिए विदेशी देशों पर अत्यधिक निर्भरता देश की सुरक्षा को खतरा पैदा कर रही है। वर्तमान में अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली कई ब्रांडेड दवाएं विदेशों (खासकर यूरोप और एशिया) में बनाई जाती हैं, जबकि API का बड़ा हिस्सा चीन और भारत जैसे देशों से आता है। किसी भी वैश्विक संकट, युद्ध या महामारी में यह निर्भरता अमेरिका को कमजोर बना सकती है।
टैरिफ की मुख्य शर्तें और छूटें यह 100% टैरिफ मुख्य रूप से पेटेंटेड दवाओं और उनके API पर लागू होगा। हालांकि, कई महत्वपूर्ण छूटें दी गई हैं ताकि आम अमेरिकी नागरिकों पर तत्काल बोझ न पड़े:
- जेनरिक दवाएं और बायोसिमिलर्स: फिलहाल पूरी तरह टैरिफ से मुक्त। ये अमेरिका में 90% से ज्यादा प्रिस्क्रिप्शन भरती हैं।
- Most Favored Nation (MFN) प्राइसिंग डील करने वाली कंपनियां: जो दवा कंपनियां अमेरिकी सरकार के साथ कीमत कम करने का समझौता करती हैं और अमेरिका में उत्पादन यूनिट लगाने की प्रतिबद्धता दिखाती हैं, उन्हें 0% टैरिफ मिल सकता है।
- ऑनशोरिंग (अमेरिका में उत्पादन) करने वाली कंपनियां: जो कंपनियां अमेरिका में फैक्ट्री लगाने की मंजूरशुदा योजना पेश करेंगी, उन्हें शुरुआत में 20% टैरिफ लगेगा, जो 2030 तक बढ़कर 100% हो जाएगा।
- मैत्रीपूर्ण देशों को राहत: यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया और स्विट्जरलैंड से आने वाली दवाओं पर 15% टैरिफ। ब्रिटेन को शुरू में 10% (बाद में शून्य) मिल सकता है।
- विशेष श्रेणियां: ऑर्फन ड्रग्स (दुर्लभ रोगों की दवाएं), सेल-जीन थेरेपी, एंटीबॉडी-ड्रग कंजुगेट्स, एनिमल हेल्थ ड्रग्स आदि को कई मामलों में छूट दी गई है।
टैरिफ की प्रभावी तारीख बड़ी कंपनियों के लिए 31 जुलाई 2026 और छोटी कंपनियों के लिए 29 सितंबर 2026 से है।
भारत के फार्मा उद्योग पर असर भारत दुनिया का सबसे बड़ा जेनरिक दवाओं का निर्यातक है। 2025 में भारत ने अमेरिका को करीब 9.7 बिलियन डॉलर की दवाएं निर्यात कीं, जो उसके कुल फार्मा निर्यात का लगभग 38% है। चूंकि जेनरिक दवाओं को फिलहाल छूट है, इसलिए भारतीय उद्योग पर तत्काल बड़ा झटका नहीं लगेगा।
हालांकि, लंबे समय में चुनौतियां हो सकती हैं:
- भारत कुछ API और स्पेशलिटी/पेटेंटेड दवाओं का भी निर्यात करता है।
- अगर भविष्य में जेनरिक दवाओं पर भी टैरिफ का दायरा बढ़ाया गया तो भारतीय कंपनियों (जैसे सन फार्मा, डॉ. रेड्डीज, सिप्ला आदि) को नुकसान हो सकता है।
- कई भारतीय कंपनियां पहले से ही अमेरिका में अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा रही हैं (जैसे सिप्ला का मासाचुसेट्स और न्यूयॉर्क में विस्तार)। यह फैसला उन्हें अमेरिका में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है।
चीन भी API का बड़ा उत्पादक है, लेकिन वहां से आयात पहले से विभिन्न प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। इस फैसले से सबसे ज्यादा असर यूरोपीय देशों (आयरलैंड, जर्मनी, स्विट्जरलैंड) और कुछ बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों (Pfizer, Eli Lilly, Novo Nordisk आदि) पर पड़ने की संभावना है।
‘मेक इन अमेरिका’ और दवा कीमतों पर फोकस ट्रंप का यह कदम ‘मेक इन अमेरिका’ और ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का हिस्सा है। व्हाइट हाउस का कहना है कि टैरिफ का मकसद केवल राजस्व जुटाना नहीं, बल्कि दवा कंपनियों को अमेरिका में उत्पादन शिफ्ट करने और दवा कीमतें घटाने के लिए दबाव डालना है।
जो कंपनियां MFN डील और ऑनशोरिंग दोनों करती हैं, उन्हें पूरी छूट मिल सकती है। प्रशासन पहले ही 17 बड़ी कंपनियों के साथ कुछ प्राइसिंग डील्स कर चुका है।
वैश्विक प्रभाव और विशेषज्ञों की राय यह फैसला वैश्विक फार्मास्युटिकल सप्लाई चेन को बदल सकता है:
- अमेरिका में ब्रांडेड दवाओं की कीमतें शुरू में बढ़ सकती हैं, लेकिन MFN डील्स से कुछ दवाएं सस्ती भी हो सकती हैं। - कंपनियां उत्पादन को अमेरिका या मैत्रीपूर्ण देशों में शिफ्ट करने की कोशिश करेंगी।
- भारत के लिए यह चुनौती के साथ अवसर भी है – जेनरिक की ताकत बनाए रखते हुए API और कॉम्प्लेक्स फॉर्मुलेशंस में निवेश बढ़ाना होगा। अन्य बाजारों (यूरोप, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका) में निर्यात बढ़ाना भी जरूरी होगा।
भारतीय विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को कूटनीतिक स्तर पर जेनरिक दवाओं की छूट को स्थायी बनाने का प्रयास करना चाहिए। साथ ही, अमेरिका में संयुक्त उद्यम या प्लांट लगाने की दिशा में तेजी लानी चाहिए।
ट्रंप ने कहा है कि अमेरिकी नागरिकों को महंगी दवाओं से राहत मिलनी चाहिए और देश की दवा उत्पादन क्षमता आत्मनिर्भर होनी चाहिए। यह फैसला स्वास्थ्य सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा है।
अगले कुछ महीनों में कंपनियों की प्रतिक्रिया और नई डील्स साफ करेंगी कि यह नीति कितनी प्रभावी साबित होती है। क्या बड़ी फार्मा कंपनियां अमेरिका में निवेश बढ़ाएंगी? क्या भारत इस स्थिति को अपनी फार्मा इंडस्ट्री को और मजबूत बनाने का मौका बना पाएगा?
यह घटना वैश्विक व्यापार में नए संरक्षणवाद की ओर इशारा करती है, जहां दवाएं अब केवल स्वास्थ्य उत्पाद नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई हैं।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 4,2026