-Friday World-April 3,2026
अप्रैल 3, 2026 को गुजरात के भावनगर शहर में एक ऐसी ऐतिहासिक और भावुक मजलिस-ए-ताजियत का आयोजन हुआ, जिसने शिया मुस्लिम समुदाय के दिलों को गहरी तकलीफ और इज्जत के साथ जोड़ दिया। ईरान के रहबरे इंक़िलाब, शहीद आयतुल्लाह सैय्यद अली हुसैनी खामेनेई की शहादत पर आयोजित इस ताजियती मजलिस में ईरान के सर्वोच्च नेता के विशेष दूत आयतुल्लाह डॉक्टर अब्दुल मजीद हकीम इलाही साहब की शानदार उपस्थिति रही।
ईरानी दूतावास से तशरीफ लाए इस महान शख्सियत ने अपनी तकरीर में भारत की धरती को ‘निष्ठा और इंसानियत की भूमि’ करार दिया।
मजलिस का आगाज़ के पहले मग़रिब की नमाज़ हुई, जिसकी इमामत खुद आयतुल्लाह डॉक्टर अब्दुल मजीद हकीम इलाही साहब ने की। नमाज़ के बाद हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम के होल (जनाब का मकान) में खुसूसी ताजियती मजलिस शुरू हुई। इस दौरान वातावरण पूरी तरह से करबला की यादों से भर गया। शहीद खामेनेई की याद में आँखें नम हो गईं और सीनों से सिसकियाँ निकलीं।
ताजियती नज्म ने माहौल को रोशन किया
मजलिस में सबसे पहले प्रसिद्ध शायर और नज्म पढ़ने वाले मुहम्मद रजा गोपाल पुरी साहब ने अपनी दिलकश ताजियती नज्म पेश की। उनकी नज्म में शहीद रहबरे इंक़िलाब की सादगी, इंसाफ की लड़ाई और शहादत की कहानी इतनी मार्मिक तरीके से बयान हुई कि हर श्रोता का दिल पिघल गया। नज्म के हर शेर पर “या हुसैन” के नारे गूंजे। गोपाल पुरी साहब की आवाज़ में करबला की गूंज और खामेनेई की शहादत की पीड़ा एक साथ महसूस की जा रही थी।
नज्म के बाद आयतुल्लाह डॉक्टर अब्दुल मजीद हकीम इलाही साहब ने खास तकरीर फरमाई। अपनी तकरीर में उन्होंने शहीद आयतुल्लाह खामेनेई की शख्सियत, उनके सादा जीवन, मज़लूमों की आवाज़ बनने वाले उनके रोल और अमेरिका-इज़राइल के हमलों के बावजूद अपनी धरती पर डटे रहने की कहानी को बड़े ही प्रभावशाली अंदाज़ में बयान किया। उन्होंने कहा कि खामेनेई साहब ने हमेशा आम लोगों की तरह जीवन जिया। सुरक्षा अधिकारियों के बंकर में जाने के सुझाव को उन्होंने ठुकरा दिया और कहा कि जब तक पूरे ईरान के लोग सुरक्षित नहीं, मैं अकेला कैसे सुरक्षित हो सकता हूँ।
डॉक्टर हकीम इलाही साहब ने भारत की तारीफ करते हुए कहा, “भारत निष्ठा, मानवता और नैतिक मूल्यों की धरती है। यहां लोग दिल से शोक मना रहे हैं। कोई मजबूरी नहीं, सिर्फ प्यार और सम्मान है।” उन्होंने ईरान-भारत के दोस्ताना रिस्ते सालो पुराने सांस्कृतिक और सभ्यतागत रिश्तों का भी जिक्र किया और कहा कि शहीद खामेनेई की शहादत पूरे दुनिया के मुसलमानों और मज़लूमों के लिए एक सबक है। उनकी तकरीर में दर्द, इज्जत और उम्मीद का अनोखा मिश्रण था, जिसने पूरे हॉल को भावुक कर दिया।
मौलाना वसी हसन खान साहब का खिताब
तकरीर के बाद मजलिस-ए-ताजियत को आगे बढ़ाते हुए भारत के जाने-माने विद्वान जनाब मौलाना वसी हसन खान साहब ने खिताबात फरमाया। मौलाना साहब ने अपनी मर्मस्पर्शी तकरीर में शहीद खामेनेई की विरासत, इंक़िलाब-ए-इस्लामी के मकसद और आज की दुनिया में मज़लूमों की लड़ाई पर रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि खामेनेई साहब की शहादत किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि इंसाफ और मुस्तजाफीन की आवाज़ की शहादत है। उनकी बातों में गहराई और जज्बा था, जिसने श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया।
इस खुसूसी प्रोग्राम में भावनगर के मौलाना तहकीक हुसैन साहब और आस-पास के इलाकों से तशरीफ लाए कई अन्य मौलाना और ज़ाकिरीन की खास हाजिरी रही। सभी ने इस मजलिस को यादगार बनाने में अपना योगदान दिया। हॉल में मौजूद हर शख्स की आँखों में आंसू थे और दिलों में शहीद रहबरे इंक़िलाब के प्रति असीम मोहब्बत और सम्मान था।
भारत-ईरान के गहरे रिश्तों का प्रतीक यह मजलिस सिर्फ एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि भारत और ईरान के बीच सदियों पुरानी दोस्ती, साझा सभ्यता और आपसी सम्मान का जीवंत प्रमाण भी थी। आयतुल्लाह डॉक्टर अब्दुल मजीद हकीम इलाही साहब की उपस्थिति ने इस आयोजन को अंतरराष्ट्रीय महत्व प्रदान किया। उन्होंने बार-बार भारत की इंसानियत की तारीफ की और कहा कि भारतीय मुसलमान और आम नागरिक शहीद खामेनेई की याद में जो शोक व्यक्त कर रहे हैं, वह दिल से है।
भावनगर जैसा छोटा शहर भी इस शोक में शामिल होकर साबित कर रहा है कि मज़लूमों की शहादत की खबर चाहे कितनी दूर हो, दिलों को छू जाती है। हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम के होल में हुई यह मजलिस करबला की यादों को ताज़ा करने वाली और शहीद खामेनेई की विरासत को आगे बढ़ाने वाली साबित हुई।
शहीद आयतुल्लाह सैय्यद अली हुसैनी खामेनेई की शहादत पर भावनगर की इस ताजियती मजलिस ने एक बार फिर साबित किया कि सच्ची इंसानियत सीमाओं से परे होती है। ईरान के दूत की तकरीर और स्थानीय उलेमा की खिताबात ने पूरे कार्यक्रम को यादगार बना दिया।
अल्लाह तआला शहीद रहबरे इंक़िलाब की मग़फिरत फरमाए और उनकी शहादत को कबूल फरमाए। उनकी विरासत को दुनिया भर में इंसाफ की लड़ाई जारी रखने की तौफीक अता फरमाए।
भावनगर के शिया भाई-बहनों और ईरानी प्रतिनिधि की उपस्थिति ने इस आयोजन को विशेष बना दिया। इंसानियत की इस मिसाल को सलाम!
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 3,2026