Breaking

यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Monday, 6 April 2026

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भूकंप: फ्रांस ने 23 साल बाद अमेरिका-इजरायल को पीछे छोड़ रूस-चीन के साथ कदम मिलाया!

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भूकंप: फ्रांस ने 23 साल बाद अमेरिका-इजरायल को पीछे छोड़ रूस-चीन के साथ कदम मिलाया!
-Friday World-April 7,2026
न्यूयॉर्क/नई दिल्ली, 7 अप्रैल 2026 – विश्व कूटनीति के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने के लिए सैन्य बल के उपयोग को अधिकृत करने वाले प्रस्ताव पर फ्रांस ने अमेरिका और उसके सहयोगियों को चौंकाते हुए रूस और चीन के साथ खड़ा हो गया। यह घटना न केवल मध्य पूर्व की अस्थिरता को बढ़ा रही है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़े बदलाव का संकेत भी दे रही है।

फ्रांस, जो दशकों से ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन का मजबूत स्तंभ रहा है, ने अब अपनी स्वतंत्र आवाज बुलंद की है। विश्लेषक इसे 2003 के इराक युद्ध के बाद अमेरिकी नीति से फ्रांस के सबसे बड़े अलगाव के रूप में देख रहे हैं – ठीक 23 साल बाद।

 घटना का पूरा विवरण: क्या हुआ UNSC में?

फरवरी 2026 के अंत में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर हमलों के बाद स्थिति तनावपूर्ण हो गई। ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण जलमार्ग – स्ट्रेट ऑफ होर्मुज – को प्रभावी रूप से बंद कर दिया। यह जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा संभालता है। बंदी से तेल की कीमतें आसमान छू गईं, मुद्रास्फीति बढ़ी और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ा।

खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों, खासकर बहरीन के नेतृत्व में, UNSC में एक ड्राफ्ट रेजोल्यूशन पेश किया गया। इसमें "all necessary means" (सभी आवश्यक साधन) की भाषा शामिल थी, जो स्पष्ट रूप से सैन्य हस्तक्षेप की अनुमति देती। प्रस्ताव का मकसद व्यावसायिक जहाजरानी की सुरक्षा और जलमार्ग को फिर से खोलना था।

लेकिन 2 अप्रैल 2026 को जब "साइलेंस प्रोसीजर" (मौन प्रक्रिया) के तहत प्रस्ताव को आगे बढ़ाया जाना था, तो फ्रांस, रूस और चीन ने इसका पुरजोर विरोध किया। तीनों स्थायी सदस्यों (P5) ने किसी भी ऐसी भाषा का विरोध किया जो बल प्रयोग की अनुमति दे। परिणामस्वरूप वोट टाल दिया गया और प्रस्ताव पर आगे चर्चा जारी रही।

न्यूयॉर्क टाइम्स समेत कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इस घटना को प्रमुखता दी। फ्रांस के राजदूत जेरोम बोनाफोंट ने कहा कि परिषद को "रक्षात्मक" उपायों पर ध्यान देना चाहिए, न कि आक्रामक सैन्य कार्रवाई पर। चीन के राजदूत फू कोंग ने चेतावनी दी कि बल के उपयोग से "अनियंत्रित उग्रता" बढ़ेगी और गंभीर परिणाम होंगे। रूस ने इसे "एकतरफा" और "असंतुलित" करार दिया।

यह पहली बार नहीं है जब P5 में विभाजन दिखा, लेकिन फ्रांस का रूस-चीन के साथ जाना वाकई चौंकाने वाला है। अमेरिका और ब्रिटेन प्रस्ताव के समर्थन में रहे, जबकि गैर-स्थायी सदस्यों में भी मतभेद थे।

 फ्रांस का यह रणनीतिक मोड़: कारण क्या हैं?

फ्रांस और अमेरिका के संबंध द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से गहरे रहे हैं। NATO में दोनों सहयोगी हैं, लेकिन फ्रांस ने हमेशा "स्वतंत्र विदेश नीति" (Gaullist tradition) पर जोर दिया है। 2003 में इराक युद्ध का विरोध फ्रांस की इसी परंपरा का हिस्सा था। उसके बाद के वर्षों में फ्रांस अक्सर अमेरिकी लाइन पर चला, खासकर मध्य पूर्व में।

लेकिन 2025-26 के ईरान संकट में स्थिति बदली। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने सैन्य अभियान को "अव्यावहारिक" और "अवास्तविक" बताया। फ्रांस के इस कदम के पीछे कई कारण हो सकते हैं:

1. यूरोपीय हितों की रक्षा: यूरोप ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। होर्मुज बंद रहने से तेल महंगा हुआ, लेकिन पूर्ण युद्ध से स्थिति और बिगड़ सकती थी। फ्रांस ने कूटनीति, युद्धविराम और संतुलित समाधान पर जोर दिया।

2. मल्टीपोलर दुनिया का प्रभाव: चीन और रूस के साथ फ्रांस के आर्थिक संबंध मजबूत हो रहे हैं। ब्रिक्स की बढ़ती ताकत और वैश्विक दक्षिण की आवाज को फ्रांस नजरअंदाज नहीं कर सकता।

3. अमेरिकी-इजरायली नीति से असहमति: हाल के वर्षों में फ्रांस ने इजरायल की कुछ कार्रवाइयों (जैसे लेबनान में UN शांति सैनिकों पर हमले) की आलोचना की है। इजरायल ने फ्रांस से रक्षा सौदे समाप्त कर दिए हैं, जो संबंधों में तनाव दर्शाता है।

4. ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) की विरासत: फ्रांस इस समझौते में सक्रिय रहा था। पूर्ण युद्ध से क्षेत्रीय अस्थिरता और शरणार्थी संकट बढ़ने का खतरा है।

विश्लेषकों का कहना है कि यह "23 साल बाद" का बड़ा बदलाव यूरोप की स्वतंत्र कूटनीति को मजबूत करता है। फ्रांस अब "वेस्टर्न ब्लॉक" का अटूट हिस्सा नहीं रहना चाहता।

 स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: वैश्विक अर्थव्यवस्था का धमनी

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है। यहां से रोजाना करीब 21 मिलियन बैरल तेल गुजरता है – यानी विश्व तेल व्यापार का पांचवां हिस्सा। ईरान के पास इस जलमार्ग को बंद करने की क्षमता है, जिससे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं।

इस बंदी से सबसे ज्यादा प्रभाव भारत, चीन, जापान और यूरोपीय देशों पर पड़ा। भारत, जो ईरान से तेल आयात करता रहा है और चाबहार बंदरगाह पर निवेश कर रहा है, क्षेत्रीय स्थिरता चाहता है।

फ्रांस-रूस-चीन के विरोध से:
- सैन्य हस्तक्षेप की UN मंजूरी नहीं मिली।
- अमेरिका या उसके सहयोगी अब बिना UNSC के कार्रवाई कर सकते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय वैधता पर सवाल उठेंगे।
- कूटनीतिक वार्ता को मौका मिला। चीन और रूस ने तत्काल युद्धविराम की मांग की।
- तेल बाजार में अनिश्चितता बनी रही, लेकिन बड़े पैमाने का युद्ध टल गया।

 विशेषज्ञों की राय और वैश्विक प्रतिक्रियाएं

अंतरराष्ट्रीय संकट समूह के विशेषज्ञों का मानना है कि बल प्रयोग की भाषा से स्थिति बिगड़ सकती थी, क्योंकि ईरान के पास मिसाइलें और समुद्री खदानें हैं जो किसी भी अभियान को महंगा बना सकती हैं।

चीन ने संकट के लिए अमेरिका-इजरायल की कार्रवाइयों को जिम्मेदार ठहराया। रूस ने "पश्चिमी एकतरफा" नीति की आलोचना की। फ्रांस ने "संतुलित" और "रक्षात्मक" दृष्टिकोण अपनाया।

अमेरिकी और इजरायली पक्ष इसे फ्रांस की "रणनीतिक गलती" बता रहे हैं, जो ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में दरार डाल सकता है। वहीं, वैश्विक दक्षिण के देशों में यह संदेश गया कि UNSC में पुरानी शक्तियां अब एकजुट नहीं हैं।

भारत के लिए यह घटना महत्वपूर्ण है। भारत ने हमेशा संतुलित रुख अपनाया – न अमेरिका के पूर्ण समर्थन में, न रूस-चीन के। ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और बहुपक्षीय कूटनीति भारत की प्राथमिकता बनी हुई है।

 आगे का रास्ता: क्या होगा UNSC में?

वोट अभी टला हुआ है। प्रस्ताव को "रक्षात्मक" बनाकर दोबारा पेश किया जा सकता है, लेकिन अगर बल की भाषा बनी रही तो फ्रांस-रूस-चीन का वीटो जारी रह सकता है।

यह घटना याद दिलाती है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति गतिशील है। पुराने गठबंधन टूट रहे हैं, नए बन रहे हैं। मल्टीपोलर दुनिया में कोई देश पूरी तरह एक पक्ष नहीं चुन सकता। फ्रांस का यह कदम यूरोप को स्वतंत्र खिलाड़ी के रूप में स्थापित करता है।

क्या यह अस्थायी रणनीतिक मोड़ है या स्थायी बदलाव? समय बताएगा। लेकिन फिलहाल, UNSC में "बड़ा फेरबदल" साफ दिख रहा है – जहां फ्रांस ने अमेरिका-इजरायल को पीछे छोड़ रूस और चीन की कंपनी चुनी।

यह न केवल मध्य पूर्व की स्थिति को प्रभावित करेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, कूटनीति और शक्ति संतुलन को भी नई दिशा देगा। भारत जैसे देशों को अब और सतर्क और स्वतंत्र रणनीति अपनानी होगी, जहां राष्ट्रीय हित हमेशा सर्वोपरि रहें।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 7,2026