-Friday World-April 17,2026
नई दिल्ली, 17 अप्रैल 2026: लोकसभा के विशेष सत्र में आज महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन बिल को भारी मतों से पराजय का सामना करना पड़ा। बिल के पक्ष में केवल 298 वोट पड़े, जबकि विरोध में 230 वोट पड़े। संवैधानिक संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने से बिल पास नहीं हो सका। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने मतदान परिणाम घोषित करते हुए बिल की असफलता की पुष्टि की और सदन को शनिवार सुबह 11 बजे तक स्थगित कर दिया।
528 सदस्यों के मतदान में बिल मात्र 68 वोटों से दो-तिहाई बहुमत से चूक गया। यह परिणाम विपक्ष की मजबूत एकजुटता और दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताओं को साफ दिखाता है।
बिल पर विवाद क्या था?
सरकार चाहती थी कि महिला आरक्षण (33%) को जल्द लागू करने के लिए लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 850 की जाएं और 2011 की जनगणना के आधार पर नया परिसीमन किया जाए। लेकिन विपक्ष ने इसे “महिला आरक्षण का बहाना” बताते हुए कहा कि असली मकसद उत्तर भारत (खासकर यूपी-बिहार) की राजनीतिक ताकत बढ़ाना और दक्षिण के राज्यों (तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, आंध्र, तेलंगाना) की आवाज कम करना है।
विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा,
“यह मुद्दा महिला आरक्षण का नहीं, बल्कि लोकतंत्र का था। हम कभी भी परिसीमन को महिला आरक्षण से जोड़कर स्वीकार नहीं कर सकते थे। यह बिल पास होना असंभव था। यह हमारे देश में लोकतंत्र के लिए एक बड़ी जीत है। जो लोग हाथरस, उन्नाव और मणिपुर में महिलाओं पर हुए अत्याचारों में कार्रवाई नहीं कर सके, वे आज महिला विरोधी मानसिकता की बात कर रहे हैं?”
राहुल गांधी ने बयान दिया,
“हमने संविधान पर इस हमले को हराकर रख दिया है। हमने साफ कहा था कि यह महिला आरक्षण का बिल नहीं, बल्कि भारत के राजनीतिक ढांचे को बदलने का एक रास्ता है।”
भाजपा महिला सांसदों का विरोध प्रदर्शन और डबल स्टैंडर्ड का आरोप
बिल के पास न होने के बाद संसद परिसर में भाजपा की महिला सांसदों ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने नारेबाजी की और सरकार के पक्ष में आवाज उठाई। लेकिन इसी दौरान विपक्ष ने भाजपा पर डबल स्टैंडर्ड का गंभीर आरोप लगाया।
विपक्षी सदस्यों ने कहा – “जब मणिपुर में महिलाओं को नग्न अवस्था में सड़कों पर घुमाया गया, तब भाजपा की महिला सांसदें चुप रहीं। एपस्टीन फाइल्स जैसे गंभीर मुद्दों पर भी वे मौन हैं। लेकिन जब उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की बात आती है तो वे संसद परिसर में प्रदर्शन करने लगती हैं। यह स्पष्ट डबल स्टैंडर्ड है।”
विपक्ष ने मणिपुर हिंसा, हाथरस और उन्नाव जैसे मामलों का हवाला देते हुए पूछा कि “महिला सशक्तिकरण” की बात करने वाली भाजपा महिला सांसदें उन घटनाओं पर क्यों चुप रहीं? उन्होंने कहा कि असली महिला सुरक्षा और न्याय पर भाजपा का रवैया सवालों के घेरे में है।
राजनीतिक विश्लेषण
यह असफलता मोदी सरकार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। विशेष सत्र बुलाकर बिल पास कराने की पूरी तैयारी की गई थी, लेकिन दक्षिण भारतीय दलों और कांग्रेस की एकजुटता के सामने सरकार को पीछे हटना पड़ा।
दक्षिण के राज्यों का मुख्य तर्क यह था कि उन्होंने आबादी नियंत्रण में सफलता हासिल की है, लेकिन परिसीमन के जरिए उन्हें राजनीतिक सजा मिल रही है। वहीं उत्तर के राज्यों को सीटों में भारी बढ़ोतरी का फायदा मिलने वाला था।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि महिला आरक्षण का मुद्दा अब और जटिल हो गया है। जाति जनगणना, ओबीसी आरक्षण और परिसीमन जैसे मुद्दे एक-दूसरे से जुड़ गए हैं।
आगे की राह
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने सदन को शनिवार सुबह 11 बजे तक स्थगित कर दिया है। अब देखना होगा कि सरकार बिल में संशोधन करके नए सिरे से प्रयास करती है या फिर विपक्ष से बातचीत का रास्ता अपनाती है।
महिला आरक्षण एक पुराना और महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। 2023 का नारी शक्ति वंदन अधिनियम भी लागू होने के लिए परिसीमन पर निर्भर है। अब सवाल यह है कि क्या सरकार सभी दलों की चिंताओं को ध्यान में रखकर नया फॉर्मूला लाएगी या फिर राजनीतिक संघर्ष जारी रहेगा।
17 अप्रैल 2026 का दिन भारतीय संसद के इतिहास में याद रखा जाएगा। महिला आरक्षण बिल की असफलता ने एक बार फिर साबित कर दिया कि लोकतंत्र में केवल बहुमत ही नहीं, बल्कि सहमति और न्यायपूर्ण संतुलन भी जरूरी है।
विपक्ष इसे “लोकतंत्र की जीत” बता रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे “महिला सशक्तिकरण में देरी” कह सकता है। असली परीक्षा तो यह है कि क्या आने वाले दिनों में सभी दल मिलकर महिलाओं को सच्चा प्रतिनिधित्व देने का रास्ता निकाल पाएंगे या फिर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप जारी रहेगा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 17,2026