-Friday World-April 25,2026
ईरान युद्ध की तपिश अब आपके रसोड़े और रोजमर्रा की जिंदगी तक पहुंच रही है। पेट्रोल-डीजल की महंगाई तो अलग बात है, लेकिन असली खतरा पाम ऑयल (Palm Oil) का है – जो भारत में खाने-पीने से लेकर साबुन, शैंपू, बिस्किट और चिप्स तक हर चीज में इस्तेमाल होता है। दुनिया का सबसे बड़ा पाम ऑयल उत्पादक देश इंडोनेशिया अब अपना तेल निर्यात करने की बजाय खुद के डीजल बनाने में लगाने जा रहा है।
जुलाई 2026 से इंडोनेशिया B50 प्रोग्राम शुरू कर रहा है – यानी डीजल में 50% पाम ऑयल मिलाकर बायो-डीजल बनाना। इसका मतलब है कि लाखों टन पाम ऑयल विदेश जाने की बजाय घरेलू उपयोग में लग जाएगा। मलेशिया भी B20-B30 की तरफ बढ़ रहा है। ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं (100-120 डॉलर प्रति बैरल तक), जिससे ये मुस्लिम देश ऊर्जा आत्मनिर्भरता की राह चुन रहे हैं। नतीजा? भारत में पाम ऑयल की भारी कमी और महंगाई का तूफान।
भारत पर पाम ऑयल का कितना निर्भरता?
भारत दुनिया का सबसे बड़ा पाम ऑयल आयातक देश है। हर साल हम लगभग 95 लाख टन पाम ऑयल का इस्तेमाल करते हैं, जबकि घरेलू उत्पादन सिर्फ 4 लाख टन से भी कम है। यानी 90-95% तेल बाहर से आता है, मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से। कुल खाद्य तेलों में पाम ऑयल का हिस्सा करीब 40% है।
यह सस्ता होने के कारण लोकप्रिय है – ज्यादातर परिवारों में रसोई का तेल पाम ऑयल या उसका मिश्रण ही होता है। यह लंबे समय तक खराब नहीं होता और फ्राई करने पर स्थिर रहता है, इसलिए स्ट्रीट फूड, ढाबे और होटलों में इसका भारी इस्तेमाल होता है।
पाम ऑयल से क्या-क्या बनता है?
- खाने-पीने की चीजें: समोसा, भजिया, चिप्स, नमकीन, फ्रेंच फ्राई, डोनट्स जैसी डीप फ्राई वस्तुएं। बिस्किट, कुकीज, केक, पेस्ट्री, इंस्टेंट नूडल्स, चॉकलेट, आइसक्रीम, रेडी-टू-ईट फूड, सॉस, ग्रेवी, ब्रेड और पिज्जा में भी इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है। फूड इंडस्ट्री में 70% से ज्यादा पाम ऑयल जाता है।
- त्योहारों का असर: दिवाली, होली या किसी भी त्योहार में मिठाइयों और तली हुई चीजों की मांग बढ़ती है, तो पाम ऑयल का उपभोग कई गुना बढ़ जाता है।
- दैनिक जीवन की चीजें: साबुन, शैंपू, बॉडी वॉश (फोम बनाने के लिए), क्रीम, लोशन, मॉइश्चराइजर, लिपस्टिक, टूथपेस्ट, कपड़े धोने का साबुन और यहां तक कि पेंट में भी पाम ऑयल मिलाया जाता है।
संक्षेप में – सुबह की पूड़ी से लेकर रात के साबुन-शैंपू तक, पाम ऑयल हमारी जिंदगी में गहराई से घुला हुआ है।
क्यों इतना इस्तेमाल? मुख्य कारण – कीमत!
पाम ऑयल थोक में करीब 125 रुपये प्रति लीटर मिलता है, जबकि दूसरे तेल 150-175 रुपये या उससे ज्यादा। सस्ता और बड़े पैमाने पर उपलब्ध होने से भारत जैसे विकासशील देशों को यह आकर्षक लगता है। लेकिन अब यह फायदे की बजाय मुसीबत बनने वाला है।
ईरान युद्ध और B50 नीति का सीधा कनेक्शन
ईरान युद्ध से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज प्रभावित हो रहा है, जहां दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से पेट्रोल-डीजल महंगा हो रहा है। इंडोनेशिया और मलेशिया अब सोच रहे हैं – क्यों न पाम ऑयल से ही बायो-डीजल बनाकर आयात कम करें?
- इंडोनेशिया का B50 प्रोग्राम: जुलाई 2026 से शुरू। इससे वे डीजल आयात बंद कर देंगे और सालाना लाखों टन पाम ऑयल घरेलू बायो-डीजल में इस्तेमाल करेंगे (करीब 35 लाख टन CPO B50 के लिए तैयार)। पहले निर्यात पर फोकस था, अब ऊर्जा आत्मनिर्भरता।
- मलेशिया: B10 से B20-B30 की ओर बढ़ रहा है, चरणबद्ध तरीके से।
- नतीजा: निर्यात कम होगा, सप्लाई टाइट, कीमतें बढ़ेंगी। शिपिंग लागत भी बढ़ गई है।
भारत में कुल खाद्य तेलों का 55-60% आयात होता है, जिसमें 84% हिस्सा इंडोनेशिया-मलेशिया के पाम ऑयल का है। अगर 3-6 महीने तक यह स्थिति बनी रही, तो तेल, बिस्किट, नमकीन, समोसा और साबुन-शैंपू – सब महंगे हो जाएंगे। आम आदमी का "तेल" निकल जाएगा।
क्या होगा असर?
- रसोई पर: खाना पकाने का तेल महंगा → किराना बिल बढ़ेगा।
- स्ट्रीट फूड और बाहर का खाना: समोसा, चिप्स, भजिया, फास्ट फूड की कीमतें आसमान छूएंगी।
- दैनिक जरूरतें: साबुन, शैंपू, क्रीम आदि में 10-20% या उससे ज्यादा बढ़ोतरी संभव।
- मुद्रास्फीति: खाद्य महंगाई बढ़ेगी, जो गरीब और मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा प्रभावित करेगी।
समाधान की राह?
भारत सरकार नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स – ऑयल पाम (NMEO-OP) चला रही है। लक्ष्य है घरेलू उत्पादन बढ़ाना – 2025-26 तक 11 लाख टन CPO और 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल। लेकिन पाम वृक्षों को ज्यादा पानी चाहिए, इसलिए दक्षिण-पूर्व एशिया में ज्यादा उत्पादन होता है। भारत में आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक आदि राज्यों में प्रयास चल रहे हैं, लेकिन आत्मनिर्भरता अभी दूर है।
: ईरान युद्ध सिर्फ भू-राजनीति नहीं, बल्कि आपकी थाली और बाथरूम तक पहुंच गया है। पाम ऑयल की इस कमी से बचने के लिए सरकार को तेजी से घरेलू उत्पादन बढ़ाना होगा, वैकल्पिक तेलों (सूरजमुखी, सोयाबीन) को बढ़ावा देना होगा और आयात स्रोतों को विविधता प्रदान करनी होगी। वरना, सबसे बुरे दिन सचमुच आ रहे हैं – जहां समोसा भी लक्जरी बन जाएगा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 25,2026