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Saturday, 25 April 2026

पंजतन का नुर (ज्योति): हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह की खिलजी मस्जिद में छिपा आध्यात्मिक रहस्य

पंजतन का नुर (ज्योति): हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह की खिलजी मस्जिद में छिपा आध्यात्मिक रहस्य
-Friday World-April 25,2026 
दिल्ली की हलचल भरी सड़कों से थोड़ा हटकर, जहां समय ठहरा सा लगता है, वहां बसी है हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की पावन दरगाह। इस दरगाह के ठीक सामने खड़ी है एक प्राचीन मस्जिद, जिसे लोग जामा'त खाना मस्जिद या खिलजी मस्जिद के नाम से जानते हैं। यह मस्जिद न सिर्फ दिल्ली की सबसे पुरानी जीवित मस्जिदों में से एक है, बल्कि उसके मुख्य दरवाज़े पर लगी एक साधारण सी गोल धातु की प्लेट भी दिल को छू लेती है।

इस प्लेट पर अरबी लिपि में सुंदर ढंग से नाम अंकित हैं। बीच में चमकता है “अल्लाह” का पवित्र नाम, और उसके चारों ओर व्यवस्थित रूप से लिखे हैं: 
👉 मुहम्मद, अली, फ़ातिमा, हसन और हुसैन। ये नाम कोई साधारण नाम नहीं — ये हैं इस्लाम की रूह, पैगंबर मुहम्मद ﷺ की आध्यात्मिक विरासत और अहल-ए-बैत (परिवार) के पांच पवित्र चेहरे, जिन्हें शिया परंपरा में पंजतन पाक कहा जाता है।

खिलजी मस्जिद का ऐतिहासिक सफर

यह मस्जिद 14वीं शताब्दी की शुरुआत में बनी। अलाउद्दीन खिलजी के बड़े बेटे खिज्र खान ने इसे 1315-1325 ईस्वी के बीच बनवाया था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार, मुख्य भाग 1312-1313 में पूरा हुआ, जबकि बाद में मुगल काल या तुगलक काल में विस्तार हुआ। लाल बलुआ पत्थर से निर्मित यह मस्जिद तीन भागों वाली है — बीच में बड़ा गुंबददार हॉल और दोनों तरफ दो छोटे हॉल।

इसकी वास्तुकला इंडो-इस्लामिक शैली की मिसाल है। दीवारों पर कुरान की आयतें उकेरी गई हैं, मेहराबों पर कमल की कली जैसे नक्काशीदार डिजाइन हैं, और गुंबद पर सुंदर मेडलियन बने हैं। मस्जिद के अंदर लटकता सुनहरा कटोरा (golden bowl) और लकड़ी के दरवाजे इसकी खासियत हैं। दक्षिणी हिस्सा महिलाओं के लिए आरक्षित है।

यह मस्जिद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (1238-1325 ई.) की दरगाह से सीधे जुड़ी हुई है। खिज्र खान स्वयं सूफी संत के अनुयायी थे। निज़ामुद्दीन औलिया चिश्ती सिलसिले के महान सूफी थे, जिनकी करामात और प्रेमपूर्ण शिक्षाएं आज भी लाखों लोगों को आकर्षित करती हैं। “गरीब नवाज़” की तरह उनका दरबार हर धर्म और वर्ग के लोगों के लिए खुला रहा।

मस्जिद का नाम जामा'त खाना इसलिए पड़ा क्योंकि यहां बड़ी संख्या में नमाज़ी जमा होते थे। यह दिल्ली की सबसे पुरानी मस्जिद है जो आज भी नियमित नमाज़ और इबादत के लिए इस्तेमाल होती है।

 दरवाज़े की वह गोल प्लेट: पंचतन पाक का प्रतीक

अब आते हैं उस गोल धातु की प्लेट पर, जो मस्जिद के मुख्य दरवाज़े पर लगी हुई है। बीच में “अल्लाह” — सृष्टि का मालिक, रहमान और रहीम। चारों तरफ पांच नाम:

- मुहम्मद ﷺ— अंतिम नबी, रहमतुल्लिल आलमीन
- अली — शेर-ए-खुदा, ज्ञान का द्वार
- फ़ातिमा — पैगंबर की लाडली बेटी, जन्नत की महिलाओं की सरदार
- हसन — सुल्ह और शांति के प्रतीक
- हुसैन— करबला के शहीद, सत्य और न्याय की मिसाल

ये पांच नाम इस्लाम की एकता और प्रेम की मिसाल हैं। सूफी परंपरा में इन्हें अहल-ए-बैत के रूप में अत्यंत सम्मान दिया जाता है। शिया मुसलमानों में इन्हें “पंचतन पाक” या “पांच पवित्र” कहा जाता है, जबकि सुन्नी और सूफी परंपरा में भी इनके प्रति गहरा आदर है।

यह प्लेट सिर्फ सजावट नहीं है। यह एक याद दिलाती है कि इबादत की जगह पर अल्लाह के साथ उनके रसूल और परिवार का नाम लेना, तौहीद (एकेश्वरवाद) को और मजबूत बनाता है। हर बार जब कोई नमाज़ी इस दरवाज़े से गुजरता है, वह इन नामों को देखकर दिल में एक विशेष आध्यात्मिक कंपन महसूस करता है।

सूफीवाद और अहल-ए-बैत का गहरा संबंध

हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया चिश्ती सिलसिले के थे, जो सूफीवाद की सबसे लोकप्रिय शाखा है। सूफी संत अहल-ए-बैत से गहरा लगाव रखते थे। उन्होंने हमेशा प्रेम, सेवा और भाईचारे पर जोर दिया। निज़ामुद्दीन का मशहूर कलाम “दुनिया में रहो पर दुनिया से अलग रहो” इसी प्रेमपूर्ण दर्शन को दर्शाता है।

पंचतन पाक के नाम इस्लाम की दो प्रमुख धाराओं — सुन्नी और शिया — के बीच एक पुल का काम करते हैं। पैगंबर ﷺ ने फरमाया था कि “मैं तुम्हारे बीच दो भारी चीजें छोड़कर जा रहा हूं — कुरान और अहल-ए-बैत।” यह हदीस दोनों सम्प्रदायों में मान्य है।

खिलजी मस्जिद की यह प्लेट इसी एकता का प्रतीक बनकर खड़ी है। दिल्ली जैसे शहर में, जहां विविधता है, यह प्लेट याद दिलाती है कि असली इबादत नामों में नहीं, बल्कि दिल की सफाई और प्रेम में है।

 आज भी जीवित विरासत

आज भी हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह और खिलजी मस्जिद पर रोज़ हजारों श्रद्धालु आते हैं। कव्वाली की मधुर धुनें, फूलों की चादरें, और रात की रौशनी में यह जगह एक अनोखा माहौल बनाती है। मस्जिद में नमाज़ पढ़ने वाले मुसल्लियों के साथ-साथ विभिन्न धर्मों के लोग यहां शांति पाने आते हैं।

यह गोल प्लेट सदियों से चुपचाप गवाही दे रही है — अल्लाह की रहमत, पैगंबर की सुन्नत और अहल-ए-बैत के प्रेम की। यह हमें सिखाती है कि इबादत की इमारतें सिर्फ पत्थर की नहीं होतीं, बल्कि उनमें बसी भावनाएं और यादें उन्हें अमर बनाती हैं।

जब भी आप दिल्ली आएं, तो निज़ामुद्दीन दरगाह जरूर जाएं। खिलजी मस्जिद के दरवाज़े पर रुकें, उस गोल प्लेट को देखें और पांच पवित्र नामों को पढ़ें। शायद उस पल आपके दिल में भी वही आध्यात्मिक ज्योति जग उठे, जो सदियों से यहां जल रही है।

“अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मद व आले मुहम्मद…

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 25,2026