Breaking

यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Monday, 6 April 2026

युद्ध खत्म हो जाए तो भी होर्मुज स्ट्रेट पर निर्भर देशों और इजराइल के दोस्तों के लिए आफत बनी रहेगी — क्या चीन इरान के साथ मिलकर स्ट्रेट पर कब्जा जमा लेगा?

युद्ध खत्म हो जाए तो भी होर्मुज स्ट्रेट पर निर्भर देशों और इजराइल के दोस्तों के लिए आफत बनी रहेगी — क्या चीन इरान के साथ मिलकर स्ट्रेट पर कब्जा जमा लेगा?-Friday World-April 6,2026 
ईरान-अमेरिका-इजराइल युद्ध ने पूरी दुनिया को हिला दिया है। तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव है और सबसे महत्वपूर्ण — दुनिया के सबसे व्यस्त जलमार्ग **स्ट्रेट ऑफ होर्मुज** अभी भी प्रभावी रूप से बंद या नियंत्रित है। युद्ध समाप्त होने के बाद भी यह संकट खत्म होने वाला नहीं दिख रहा। विश्लेषकों का मानना है कि अगर स्थिति यूं ही रही तो चीन इरान के साथ गठबंधन कर होर्मुज पर प्रभावी कब्जा जमा सकता है, जो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर उसका अभूतपूर्व नियंत्रण स्थापित कर देगा।

यह कोई साधारण भू-राजनीतिक खेल नहीं, बल्कि तेल और गैस के भविष्य का सवाल है। होर्मुज स्ट्रेट से दुनिया का लगभग 20% तेल और महत्वपूर्ण मात्रा में LNG गुजरता है। युद्ध शुरू होने के बाद ईरान ने इसे बंद कर दिया, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति में भारी कमी आई और कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं।

 चीन की नई रणनीति: इरान के साथ हाथ मिलाकर होर्मुज पर दांव
विश्लेषक सौरभ मुखर्जी (मार्सेलस इन्वेस्टमेंट फाउंडेशन के संस्थापक) साफ चेतावनी देते हैं कि चीन वैश्विक ऊर्जा बाजार में इरान के साथ मिलकर होर्मुज स्ट्रेट पर कब्जा जमाने की तैयारी कर रहा है। उन्होंने कहा, “अगर ऐसा हुआ तो दुनिया के तेल प्रवाह के एक बड़े हिस्से पर चीन का नियंत्रण हो जाएगा — यह चीन के लिए तख्तापलट जैसी स्थिति होगी।”

चीन पहले से ही इरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है। 2021 में दोनों देशों के बीच 25 वर्षीय रणनीतिक साझेदारी समझौता हुआ था, जिसमें चीन ने इरान में 400 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया था। बदले में इरान सस्ता तेल और गैस सप्लाई करेगा। युद्ध के दौरान भी चीन ने इरान से तेल खरीदना जारी रखा और कुछ चीनी जहाजों को स्ट्रेट से गुजरने की अनुमति मिली। ईरान ने चुनिंदा देशों (चीन, रूस, भारत, पाकिस्तान आदि) को विशेष छूट दी, जबकि बाकी दुनिया के लिए रास्ता बंद रहा।

अब्दुल्लाह बाबूद (कार्नेगी फाउंडेशन) कहते हैं कि खाड़ी देशों पर तेल निर्भरता से चीन खुद मुश्किल में है, इसलिए वह अमेरिकी प्रतिबंधों को नजरअंदाज कर इरान से तेल खरीद रहा है। चीन खाड़ी में UAE, ओमान और पाकिस्तान में भी भारी निवेश कर रहा है — पाइपलाइन, रेल नेटवर्क, इंफ्रास्ट्रक्चर, टेलीकॉम और ऊर्जा क्षेत्र में। अमेरिका की गारंटी न देने के बावजूद खाड़ी में उसका घटता प्रभाव चीन के लिए सुनहरा मौका है।

 युद्ध के बाद की आफत: टोल टैक्स या स्थायी नियंत्रण?
युद्ध खत्म होने के बाद भी होर्मुज पर ईरान का नियंत्रण बना रह सकता है। ईरान ने पहले ही संकेत दिए हैं कि वह स्ट्रेट पर संप्रभुता का दावा करता है और गुजरने वाले जहाजों से टोल टैक्स वसूल सकता है (कुछ रिपोर्ट्स में 2 मिलियन डॉलर प्रति जहाज का जिक्र)। 

चीन के लिए यह फायदेमंद है क्योंकि:
- वह इरान से सस्ता तेल पा रहा है।
- उसके जहाजों को विशेष अनुमति मिल रही है।
- वह इरान के साथ गठबंधन कर वैश्विक तेल प्रवाह को प्रभावित कर सकता है।

यदि चीन-ईरान गठबंधन मजबूत हुआ तो होर्मुज पर “टोल टैक्स” या चयनात्मक पहुंच का खेल शुरू हो सकता है। इससे इजराइल के दोस्त (अमेरिका और यूरोपीय देश) और तेल पर निर्भर एशियाई अर्थव्यवस्थाएं मुश्किल में पड़ जाएंगी। खाड़ी देशों के लिए भी चीन एक नया विकल्प बन रहा है, हालांकि अमेरिका जैसी सैन्य सुरक्षा वह नहीं दे सकता।

 भारत के लिए चुनौती
भारत के लिए यह स्थिति बेहद पेचीदा है। हम तेल आयात पर निर्भर हैं और होर्मुज बंद रहने से कीमतें बढ़ रही हैं। रुपया कमजोर हो रहा है, मुद्रास्फीति बढ़ सकती है और ब्याज दरें प्रभावित हो सकती हैं। सौरभ मुखर्जी कहते हैं कि यह युद्ध भारत की अर्थव्यवस्था के लिए “पड़क़ाररूप” साबित होगा। साथ ही, कुछ देशों में राजनीतिक समीकरण और नए गठबंधन बदल सकते हैं — जैसे खाड़ी देश चीन की ओर झुक सकते हैं।

भविष्य का परिदृश्य
विश्लेषक मानते हैं कि युद्ध लंबा खिंच सकता है या समाप्त होने के बाद भी होर्मुज पर ईरान-चीन का प्रभाव बरकरार रहेगा। चीन कूटनीति और निवेश के जरिए क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। वह स्ट्रेट को पूरी तरह बंद नहीं रखना चाहता, लेकिन इरान के साथ मिलकर चयनात्मक नियंत्रण रखना चाहता है — जो उसके लिए रणनीतिक लाभ है।

दुनिया के लिए सबक साफ है: ऊर्जा सुरक्षा अब सिर्फ सैन्य शक्ति पर नहीं, बल्कि कूटनीति, निवेश और गठबंधनों पर निर्भर है। अगर चीन होर्मुज पर प्रभावी कब्जा या नियंत्रण जमा लेता है, तो वैश्विक तेल बाजार का नया केंद्र बीजिंग बन सकता है।

युद्ध समाप्त हो या न हो, होर्मुज स्ट्रेट पर निर्भर देशों और इजराइल समर्थक शक्तियों के लिए चुनौतियां बनी रहेंगी। चीन की रणनीति इरान को मजबूत बनाकर खुद को ऊर्जा का नया गेटकीपर बनाने की है। भारत और अन्य आयातक देशों को अब वैकल्पिक रास्ते, रणनीतिक भंडार और विविध स्रोतों की तलाश तेज करनी होगी। 

समय बताएगा कि यह नया “चीन-ईरान गेम” दुनिया को कितना महंगा पड़ेगा। लेकिन एक बात तय है — होर्मुज अब सिर्फ जलमार्ग नहीं, बल्कि 21वीं सदी की भू-राजनीति का सबसे बड़ा दांव बन चुका है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 6,2026