-Friday World-April 13,2026
28 फरवरी 2026 का वो भयानक दिन, जब ईरान के दक्षिणी शहर मिनाब में शजरह तय्यिबा गर्ल्स प्राइमरी स्कूल पर मिसाइल हमला हुआ। सुबह की क्लास चल रही थीं। सात से बारह साल की मासूम लड़कियां अपनी किताबों में खोई हुई थीं। अचानक आसमान से मौत टपकी। एक टॉमहॉक मिसाइल ने स्कूल की इमारत को चकनाचूर कर दिया। 156 से ज्यादा निर्दोष बच्चियां और शिक्षिकाएं शहीद हो गईं। 95 से ज्यादा घायल हुए। यह हमला न सिर्फ एक स्कूल पर था, बल्कि मासूमियत पर, बचपन पर और आने वाले कल पर था।
लेकिन फारस की धरती ने हमेशा से ही तूफानों का सामना किया है। वो झुकती नहीं, झुकाती है। और आज उसी फारस का एक नया रूप जेनेवा की अंतरराष्ट्रीय मंच पर खड़ा है – मिनाब 168 का प्रतिनिधिमंडल। उनके हाथ में उन बच्चियों की तस्वीरें, उनके स्कूल बैग, उनके छोटे-छोटे जूते और वो मासूम मुस्कानें जो अब सिर्फ यादों में बची हैं।
जेनेवा में फारस का संदेश: हम भूलेंगे नहीं, भुलाने भी नहीं देंगे
जेनेवा में जब ईरानी प्रतिनिधि खड़े हुए, तो उनकी आंखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक अटूट संकल्प था। उन्होंने दुनिया को याद दिलाया – “तुम जहां भी जाओगे, हम तुम्हें याद दिलाएंगे कि तुम बाल शैतान की औलाद हो। मासूम बचपन के दुश्मन हो। तुम बच्चियों को मार तो सकते हो, लेकिन उनकी मासूम यादों को हमसे नहीं छीन सकते।”
यह कोई साधारण भाषण नहीं था। यह उन 168 मासूमों की आवाज थी जो क्लासरूम में बैठे-बैठे शहीद हो गईं। यह उन मांओं की चीख थी जिनके घर आज भी खाली पड़े हैं। यह उन पिता की आंखों में छलकते आंसुओं की कहानी थी जो अपनी बेटियों के स्कूल बैग को सीने से लगाए रोते हैं।
फारस का इतिहास हमेशा से प्रतिरोध का रहा है। सिकंदर से लेकर आधुनिक साम्राज्यवाद तक, ईरान ने हर आक्रमण का जवाब दिया है – कभी तलवार से, कभी इरादों से, कभी अपनी सभ्यता की रोशनी से। आज फिर वही फारस खड़ा है, लेकिन इस बार उसके हाथ में हथियार नहीं, बल्कि उन मासूमों की यादें हैं जो दुनिया को शर्मिंदा कर रही हैं।
मिनाब का जुल्म: जब दुनिया तमाशाई बनी रही
जब मिनाब स्कूल पर हमला हुआ, तो दुनिया क्या कर रही थी? कुछ ताकतवर देश इस हमले को “सटीक सर्जिकल स्ट्राइक” बता रहे थे। कुछ मीडिया इसे “कोलैटरल डैमेज” कहकर नजरअंदाज कर रहा था। यूनेस्को ने इसे “मानवीय कानून का गंभीर उल्लंघन” बताया, लेकिन बड़े-बड़े राष्ट्रसंघ के मंचों पर भी सिर्फ बयानबाजी हुई। कोई ठोस कार्रवाई नहीं। कोई सजा नहीं।
ईरान का कहना है कि यह हमला अमेरिका और इजराइल की मिलीभगत से हुआ। टॉमहॉक मिसाइल के टुकड़े और सैटेलाइट इमेजेस इस बात की गवाही दे रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि मिसाइल ने सिर्फ स्कूल नहीं, बल्कि पूरी मानवता को निशाना बनाया। सात साल की बच्ची जो अभी-अभी वर्णमाला सीख रही थी, बारह साल की लड़की जो डॉक्टर बनने का सपना देख रही थी – सब एक पल में खत्म।
यह हमला सिर्फ ईरान पर नहीं, बल्कि उन सभी मांओं पर था जो अपनी बेटियों को स्कूल भेजती हैं। यह उन सभी शिक्षकों पर था जो बच्चों को ज्ञान का दीपक जलाते हैं। और सबसे बड़ा अपराध यह कि दुनिया ने इसे देखा और चुप रही।
फारस की नई ताकत: यादों का हथियार
आज मिनाब 168 का प्रतिनिधिमंडल दुनिया के हर कोने में यह संदेश ले जा रहा है – हम भूलेंगे नहीं। हम अपने बच्चों की शहादत को राजनीतिक सौदेबाजी का हिस्सा नहीं बनने देंगे। उनके जूते, उनके बैग, उनकी तस्वीरें अब सिर्फ यादें नहीं, बल्कि एक जिंदा सवाल हैं:
“क्या तुम्हारी सभ्यता इतनी कमजोर है कि मासूम बच्चों को भी निशाना बनाना पड़ता है?”
ईरान के प्रतिनिधि जेनेवा में खड़े होकर मानो कह रहे थे – तुम बच्चियों को मार सकते हो, लेकिन उनकी मासूमियत को नहीं। उनकी हंसी को नहीं। उनकी उम्मीदों को नहीं। क्योंकि हम फारस हैं। हम हजारों साल से यहां हैं। हमने साम्राज्यों को उखाड़ फेंका है। हम इस जुल्म को भी भुलाने नहीं देंगे।
जब दुनिया खामोश तमाशाई बनी
मिनाब हमले के बाद सोशल मीडिया पर कुछ क्लिप्स वायरल हुईं – खून से सने स्कूल बैग, टूटे डेस्क, और मांओं की चीखें। लेकिन बड़े मीडिया हाउस ने इसे “ईरान-इजराइल टेंशन” का हिस्सा बताकर खारिज कर दिया। कुछ ने तो यह तक कह दिया कि स्कूल के पास IRGC का कंपाउंड था, इसलिए यह “जायज टारगेट” था।
क्या मासूम बच्चियां भी जायज टारगेट हो सकती हैं? क्या सात साल की लड़की को मारना “आत्मरक्षा” है? क्या बचपन अब युद्ध का मैदान बन गया है?
फारस का जवाब साफ है – नहीं। हम इसे स्वीकार नहीं करेंगे। हम दुनिया को बार-बार याद दिलाएंगे कि जब मिनाब की बच्चियां मारी जा रही थीं, तब दुनिया इस जुल्म पर खामोश तमाशाई बनी रही।
प्रतिरोध की नई मिसाल: मिनाब 168
“मिनाब 168” अब सिर्फ एक संख्या नहीं है। यह एक प्रतीक बन गया है। यह उन 168 मासूमों का नाम है जिन्होंने अपनी जान देकर दुनिया को आईना दिखाया। ईरान के प्रतिनिधि जब इन तस्वीरों के साथ जेनेवा पहुंचे, तो पूरा हॉल सन्नाटे में डूब गया। क्योंकि कोई भी इन मासूम चेहरों को देखकर यह नहीं कह सकता कि यह “कोलैटरल डैमेज” था।
यह हमला मानवता के खिलाफ अपराध था। और फारस अब इसे भुलाने नहीं देगा। वह दुनिया के हर मंच पर, हर बैठक में, हर बातचीत में मिनाब की बच्चियों की याद दिलाएगा।
अंत में...
फारस झुकता नहीं, झुकाता है।
दुश्मन कितना भी ताकतवर हो, फारस उससे डरता नहीं, डराता है।
आज मिनाब की बच्चियों की शहादत ने फारस को नया जोश दिया है।
उनकी यादें अब हथियार बन गई हैं – ज्यादा ताकतवर, ज्यादा प्रभावी।
हम मिनाब की मासूमों को सलाम करते हैं।
हम उन मांओं को सलाम करते हैं जो अब भी अपने बच्चों के बैग संभाले बैठी हैं।
और हम दुनिया से पूछते हैं – कब तक चुप रहोगी?
मिनाब 168 अमर है।
फारस अमर है।
और प्रतिरोध की यह लौ कभी नहीं बुझेगी।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 13,2026