ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची का हालिया बयान न सिर्फ एक कूटनीतिक तंज है, बल्कि वैश्विक राजनीति की गहरी सच्चाई को उजागर करता है। जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को “पाषाण युग” में वापस भेजने की धमकी दी, तो अरागची ने शांत लेकिन तीखे शब्दों में जवाब दिया—
“आज का दौर और पाषाण युग एक जैसे नहीं हैं… उस समय मध्य-पूर्व में न तेल निकाला जाता था, न गैस।”
यह एक साधारण टिप्पणी नहीं थी। यह उस सोच पर सवाल था जो शक्ति के नशे में इतिहास को पीछे घुमाने का सपना देखती है। क्या वाकई अमेरिका और उसके समर्थक यह मानते हैं कि बमों से सभ्यताओं को मिटाकर दुनिया को नियंत्रित किया जा सकता है? या फिर यह ताकत और संसाधनों की पुरानी राजनीति का नया रूप है?
### तनाव की पृष्ठभूमि
हाल के दिनों में अमेरिका-ईरान संबंधों में फिर से तनाव चरम पर पहुंच गया है। ट्रंप ने सार्वजनिक भाषण में साफ कहा कि यदि ईरान अपना रवैया नहीं बदलेगा, तो उसे “पाषाण युग” में धकेल दिया जाएगा। यह बयान इजराइल-ईरान संघर्ष और क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच आया, जहां अमेरिका इजराइल का मजबूत समर्थक बना हुआ है।
अरागची का जवाब तुरंत वायरल हो गया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि पाषाण युग और वर्तमान काल में एक बड़ा अंतर है—उस समय मध्य पूर्व से तेल और गैस नहीं निकल रही थी। अर्थ साफ था: आज की दुनिया ऊर्जा संसाधनों पर टिकी है। अगर मध्य पूर्व को अस्थिर किया गया, तो इसका असर सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था हिल जाएगी।
यह तंज इसलिए भी मजबूत है क्योंकि अमेरिका स्वयं दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक और उपभोक्ता रहा है। उसके अर्थतंत्र, उद्योग और यहां तक कि सैन्य मशीनरी भी पेट्रोलियम पर निर्भर है। अगर मध्य पूर्व का तेल-गैस उत्पादन ठप हो जाए, तो सबसे पहले अमेरिकी पंप पर कीमतें आसमान छूएंगी, फिर वैश्विक बाजार बिगड़ेंगे।
### क्या है असली मुद्दा—सोच या रणनीति?
अरागची का बयान सिर्फ तेल-गैस तक सीमित नहीं है। यह गहरे सवाल उठाता है: क्या अमेरिकी नीति-निर्माता वाकई इतिहास को उलटने की कोशिश कर रहे हैं? क्या वे मानते हैं कि बमबारी और सैन्य दबाव से कोई देश पीछे चला जाएगा और बाकी दुनिया आगे बढ़ती रहेगी?
वास्तविकता इससे उलट है। आधुनिक युग में युद्धों का असर सीमाओं में नहीं रुकता। एक क्षेत्र की अस्थिरता पूरी दुनिया को प्रभावित करती है—चाहे वह ऊर्जा संकट हो, शरणार्थी संकट हो, या आतंकवाद का फैलाव। पाषाण युग लौटाना किसी एक देश के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए खतरा है।
ईरान का तर्क यह है कि आज की दुनिया आपस में जुड़ी हुई है। मध्य पूर्व दुनिया का ऊर्जा हब है। यहां तेल और गैस के बिना न तो यूरोप की सर्दियां कटेंगी, न एशिया की फैक्टरियां चलेंगी, और न ही अमेरिका की अर्थव्यवस्था स्थिर रहेगी। अगर कोई सोचता है कि ईरान को नष्ट करके बाकी दुनिया सुरक्षित रहेगी, तो वह भ्रम में है।
### अमेरिका का पहला शिकार खुद बन सकता है
जैसा कि कई विश्लेषक कह रहे हैं—अगर इतिहास को पीछे घुमाने की कोशिश हुई, तो पाषाण युग अकेले ईरान का नहीं होगा। सबसे पहले इसका असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और उसके नागरिकों पर पड़ेगा।
कल्पना कीजिए: मध्य पूर्व में बड़े पैमाने पर संघर्ष छिड़ता है। तेल की आपूर्ति बाधित होती है। वैश्विक कीमतें 200-300 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती हैं। अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें आसमान छूती हैं। मुद्रास्फीति बढ़ती है। उद्योग ठप पड़ते हैं। रोजगार घटते हैं। और सबसे महत्वपूर्ण—अमेरिकी मतदाता, जिन्होंने ट्रंप को सत्ता सौंपी, खुद महंगाई और संकट की मार झेलते हैं।
यह कोई काल्पनिक परिदृश्य नहीं है। 1970 के दशक के तेल संकट या 2022 के यूक्रेन युद्ध के बाद के प्रभाव हमें याद दिलाते हैं कि ऊर्जा की कीमत कितनी तेजी से पूरी दुनिया को हिला सकती है। ईरान जैसा देश, जो क्षेत्रीय शक्ति है और जिसके पास सामरिक गहराई है, को पूरी तरह “पाषाण युग” में भेजना आसान नहीं। बल्कि इससे पहले कि ईरान प्रभावित हो, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला टूट सकती है।
अरागची का तंज इसी सच्चाई की ओर इशारा करता है—अमेरिकी नेता और उनके समर्थक सोचें कि क्या वे वाकई “क्लॉक को पीछे” घुमाना चाहते हैं? क्योंकि उस घड़ी में सबसे पहले उनका अपना समय बिगड़ सकता है।
### भविष्य को पीछे ले जाना संभव नहीं
इतिहास हमें सिखाता है कि सभ्यताओं को बमों से नहीं रोका जा सकता। प्रगति तकनीक, ज्ञान और आपसी निर्भरता से होती है, न कि विनाश से। आज की दुनिया में कोई भी देश अलग-थलग नहीं रह सकता। ईरान की सभ्यता हजारों साल पुरानी है। उसने कई साम्राज्यों को आते-जाते देखा है। लेकिन तेल और गैस की खोज के बाद मध्य पूर्व वैश्विक राजनीति का केंद्र बन गया।
अगर कोई शक्ति इसे नष्ट करने की कोशिश करेगी, तो परिणाम केवल क्षेत्रीय नहीं, वैश्विक होंगे। पर्यावरणीय आपदा, आर्थिक मंदी, और राजनीतिक अस्थिरता का सिलसिला शुरू हो सकता है। भविष्य खुद-ब-खुद आगे नहीं बढ़ पाएगा अगर हम अतीत की तरफ लौटने की कोशिश करेंगे।
ईरान का संदेश साफ है—संवाद और कूटनीति का रास्ता अपनाएं, न कि विनाश का। ताकत का प्रदर्शन कभी-कभी कमजोरी का प्रतीक बन जाता है। जबकि समझदारी और संतुलन ही स्थायी शांति ला सकता है।
### अंत में: सोचने का वक्त
अब्बास अरागची का तंज सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। यह हमें याद दिलाता है कि 21वीं सदी में युद्ध कोई खेल नहीं, बल्कि सामूहिक आत्मघाती कदम हो सकता है। अगर अमेरिका और उसके सहयोगी वाकई “पाषाण युग” लाना चाहते हैं, तो याद रखें—उस युग में न सिर्फ ईरान, बल्कि पूरी दुनिया प्रभावित होगी। और सबसे पहले उसकी मार अमेरिकी सपनों और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगी।
दुनिया को आगे ले जाना है तो पीछे की तरफ नहीं, बल्कि संवाद, सहयोग और साझा भविष्य की ओर बढ़ना होगा। क्योंकि इतिहास घुमाने की कोशिश में अक्सर घुमाने वाला खुद घूम जाता है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 6,2026