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Sunday, 26 April 2026

एक पेड़ माँ के नाम, पूरा जंगल अडानी के नाम: हसदेव अरण्य में कोयला खदान की सच्चाई

एक पेड़ माँ के नाम, पूरा जंगल अडानी के नाम: हसदेव अरण्य में कोयला खदान की सच्चाई
-Friday World-April 27,2026 
छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य जंगल में एक तरफ़ सरकार ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान चला रही है – भावुक अपील, फोटो सेशन और पौधरोपण के कार्यक्रम। वहीं दूसरी तरफ़ अदानी समूह द्वारा संचालित कोयला खदानों के विस्तार के लिए हजारों-लाखों प्राचीन पेड़ काटे जा रहे हैं। यह विरोधाभास सिर्फ़ एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि पर्यावरण, आदिवासी अधिकारों और सच्चे विकास की हकीकत को उजागर करता है।

हसदेव अरण्य (Hasdeo Arand) छत्तीसगढ़ का एक घना, जैव-विविधता से भरपूर जंगल क्षेत्र है, जो लगभग १७०,००० हेक्टेयर में फैला हुआ है। यह क्षेत्र हाथियों का गलियारा, सैकड़ों दुर्लभ पौधों और जानवरों का घर और हजारों आदिवासी परिवारों की आजीविका का आधार है। लेकिन कोयला भंडार के कारण यह क्षेत्र पिछले एक दशक से खनन कंपनियों की नजर में है।

मुहिम की शुरुआत और हकीकत

‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान को भावनात्मक अपील के साथ प्रचारित किया गया। माँ के प्रति सम्मान और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया गया। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह अभियान जनता को दिखावा भर है, जबकि वास्तविकता में घने जंगलों को कॉर्पोरेट हितों के लिए बलि चढ़ाया जा रहा है।

हसदेव में अदानी समूह द्वारा संचालित पारसा ईस्ट केते बासन (PEKB) कोयला खदान और उसके विस्तार (Kete Extension, Parsa आदि) के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ काटे गए। 

- आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, २०१२-१३ से २०२२-२३ तक लगभग ८१,८६६ पेड़ काटे गए।
- पर्यावरण कार्यकर्ता और स्थानीय लोग दावा करते हैं कि वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा है – ३.५ लाख से ३.६८ लाख या उससे भी अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं।
- २०२४-२५ में विस्तार के लिए अतिरिक्त ११,००० से १५,००० पेड़ एक-एक बार में काटे गए।
- सलही, घटबर्रा, हरिहारपुर, फतेहपुर जैसे गांवों में पेड़ कटाई के विरोध में प्रदर्शन हुए, जिसमें आदिवासी महिलाओं ने पेड़ों को गले लगाकर (चिपको आंदोलन शैली) बचाने की कोशिश की।

इन पेड़ों में महुआ, आम, कटहल जैसे फलदार वृक्ष शामिल हैं, जो आदिवासियों की अर्थव्यवस्था और संस्कृति का हिस्सा हैं। कई पेड़ सदियों पुराने और आदिवासियों द्वारा पूजनीय माने जाते थे।
           आदिवासी जीवन पर असर

हसदेव के आदिवासी (मुख्यतः गोंड समुदाय) सदियों से जंगल पर निर्भर हैं। जंगल उन्हें भोजन, ईंधन, औषधि, पानी और आजीविका देता है। खदान विस्तार के कारण:

- गांवों का विस्थापन या खतरा
- जल स्रोतों (नदियों, झरनों) का प्रदूषण और सूखना
- वन्यजीवों का विस्थापन – हाथी, भालू आदि के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ा
- पारंपरिक वन अधिकार (FRA) का उल्लंघन होने के आरोप

कई गांवों में लोगों ने वन अधिकार पट्टे सौंपने से इनकार किया, लेकिन कथित दबाव और मुआवजे के लालच में कुछ मामलों में सहमति बनाई गई। कार्यकर्ताओं का कहना है कि मुआवजा अपर्याप्त है और पुनर्वास की सुविधाएं खराब हैं।

 पर्यावरणीय कीमत

हसदेव अरण्य सिर्फ़ पेड़ों का समूह नहीं है। यह कार्बन सिंक, वर्षा चक्र को बनाए रखने वाला क्षेत्र और जैव-विविधता का हॉटस्पॉट है। लाखों पेड़ काटने से:

- स्थानीय जलवायु प्रभावित – गर्मी बढ़ना, वर्षा पैटर्न बदलना
- भूजल स्तर गिरना
- मिट्टी का कटाव और बाढ़ का खतरा बढ़ना
- पूरे क्षेत्र की पारिस्थितिकी असंतुलित होना

कार्यकर्ता अलोक शुक्ला जैसे लोगों ने इस मुद्दे पर दशकों से संघर्ष किया और उन्हें गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार भी मिला। हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति ने लगातार विरोध प्रदर्शन, कानूनी लड़ाई और जागरूकता अभियान चलाए।

 क्या है सच्चाई – दिखावा बनाम हकीकत?

‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान में पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन पुराने, घने जंगल की जगह नए पौधे लगाना पर्यावरणीय रूप से समकक्ष नहीं होता। एक परिपक्व जंगल में सैकड़ों प्रजातियाँ, जटिल इकोसिस्टम और कार्बन स्टोरेज क्षमता होती है, जो नई रोपाई में दशकों बाद भी नहीं आ पाती।
                   आलोचक कहते हैं:
- एक तरफ़ माँ के नाम पर एक पेड़ लगाने का भावुक नारा
- दूसरी तरफ़ हज़ारों पेड़ “बाप” (कॉर्पोरेट हित) के नाम पर काट दिए जाते हैं

यह विरोधाभास विकास मॉडल की मूल समस्या को उजागर करता है – जहां अल्पकालिक औद्योगिक लाभ को दीर्घकालिक पर्यावरणीय और सामाजिक लागत से ऊपर रखा जाता है।

 आगे का रास्ता

हसदेव जैसे क्षेत्रों में सच्चा विकास तभी संभव है जब:
- वन क्षेत्रों को ‘नो-गो’ जोन घोषित कर संरक्षण दिया जाए
- वन अधिकार अधिनियम को सख्ती से लागू किया जाए
- खनन परियोजनाओं में पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (EIA) को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाया जाए
- आदिवासी समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाए
- सस्टेनेबल ऊर्जा स्रोतों (सौर, पवन) को प्राथमिकता दी जाए, कोयले पर निर्भरता कम की जाए

हसदेव की लड़ाई सिर्फ़ एक जंगल की नहीं है। यह सवाल है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या छोड़ रहे हैं – हरा-भरा, जीवंत पर्यावरण या धूल-धक्कड़, प्रदूषित खदानें?

‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान की भावना सराहनीय है, लेकिन जब पूरा जंगल ही खतरे में हो तो दिखावे की रोपाई पर्याप्त नहीं होती। सच्ची श्रद्धांजलि माँ प्रकृति को तभी दी जा सकती है जब हम उसके अस्तित्व को बचाने के लिए ठोस कदम उठाएं – न कि सिर्फ़ फोटो खिंचवाएं।

हसदेव के आदिवासी आज भी संघर्ष कर रहे हैं। उनका संदेश साफ़ है – जंगल हमारी माँ है, उसे बचाना हमारा कर्तव्य। क्या हम इस हकीकत को समझेंगे या सिर्फ़ नारों में उलझे रहेंगे?

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 27,2026