-Friday World-April 27,2026
अप्रैल २०२६। देश की सड़कें पिघल रही हैं, आसमान से आग बरस रही है। बिहार के भागलपुर, ओडिशा के तालचेर, पश्चिम बंगाल के आसनसोल और मेदिनीपुर में तापमान ४४-४५ डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है। दुनिया के १०० सबसे गर्म शहरों में से ९५ भारत में हैं। २० में से १९ सबसे गर्म जगहें भी यहीं।
यह कोई सामान्य गर्मी नहीं है। यह पर्यावरणीय असंतुलन का चरम रूप है – जिसकी नींव पिछले १२ सालों में विकास के नाम पर पड़ी है। आदिवासियों और किसानों से छीनी गई जल, जंगल और जमीन आज देश को ‘विश्व का हीट बॉक्स’ बना रही है।
जब विकास ने प्रकृति से छेड़छाड़ की
२०१४ से अब तक देश में बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, माइनिंग, हाईवे, स्मार्ट सिटी और औद्योगिक क्षेत्रों के नाम पर लाखों हेक्टेयर जंगल और कृषि भूमि पर कब्जा किया गया। ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच के आंकड़ों के अनुसार, २००१ से २०२४ तक भारत में २.३ मिलियन हेक्टेयर ट्री कवर गायब हो गया, जिसमें प्राकृतिक जंगलों का बड़ा हिस्सा शामिल है।
आदिवासी समुदाय, जो देश की कुल आबादी का मात्र ८.६% हैं, विकास परियोजनाओं से विस्थापित होने वालों में ४०% से ज्यादा हिस्सा रखते हैं। छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में कोयला खदान, नर्मदा घाटी के बड़े बांध, ओडिशा और झारखंड के खनिज क्षेत्र – हर जगह आदिवासियों की पारंपरिक जमीन, जल स्रोत और जंगल छीन लिए गए।
जंगल सिर्फ पेड़ नहीं होते। वे वर्षा चक्र को नियंत्रित करते हैं, भूजल रिचार्ज करते हैं, मिट्टी को बांधे रखते हैं और तापमान को संतुलित रखते हैं। जब लाखों-करोड़ों पेड़ कटते हैं तो:
- कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बढ़ता है
- स्थानीय वर्षा घटती है
- भूजल स्तर गिरता है
- हीट आइलैंड इफेक्ट तेज होता है
नतीजा? शहरों में कंक्रीट और एस्फाल्ट की दीवारें गर्मी को सोख लेती हैं और रात में वापस छोड़ती हैं, जिससे रात का तापमान भी नहीं गिरता।
२०२६ की भीषण गर्मी: आंकड़े जो चेतावनी दे रहे हैं
इस साल अप्रैल में ही भारत ने रिकॉर्ड तोड़ दिए। AQI.in के रीयल-टाइम डेटा के अनुसार, दुनिया के सबसे गर्म शहरों की लिस्ट पर लगभग पूरी तरह भारतीय शहरों का कब्जा है। भागलपुर, तालचेर, आसनसोल, मेदिनीपुर जैसे इलाकों में ४४-४५°C तापमान दर्ज किया गया। उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कई शहर ४०-४३°C की चपेट में हैं।
मौसम विभाग (IMD) ने पहले ही कई राज्यों में हीटवेव की चेतावनी जारी की है। गर्मी सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि जानलेवा बन गई है। खेतों में फसलें जल रही हैं, मजदूर दोपहर में काम नहीं कर पा रहे, अस्पतालों में हीट स्ट्रोक के मरीज बढ़ रहे हैं। पशुधन भी प्रभावित हो रहा है।
यह गर्मी अकेले प्राकृतिक नहीं है। इसमें मानवीय हस्तक्षेप की बड़ी भूमिका है। जंगलों की कटाई, नदियों पर बांध, पहाड़ों की खुदाई और शहरीकरण ने भूमि की नमी और हरियाली दोनों छीन ली है।
‘विकास’ का मॉडल: किसके लिए और किसकी कीमत पर?
पिछले १२ सालों में सरकार ने तेज गति से इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पर जोर दिया। हाईवे, एयरपोर्ट, रेलवे कॉरिडोर, औद्योगिक गलियारे – सब जरूरी थे। लेकिन सवाल यह है कि यह विकास कितना समावेशी और पर्यावरण-अनुकूल था?
- आदिवासी इलाकों में बिना पर्याप्त पुनर्वास के भूमि अधिग्रहण
- पर्यावरण मंजूरी में तेजी के नाम पर ढील
- वन क्षेत्रों में माइनिंग को बढ़ावा
- कृषि भूमि को नॉन-एग्रीकल्चरल यूज में बदलना
नतीजा यह हुआ कि जो समुदाय सदियों से जंगल और जमीन के संरक्षक थे, उन्हें ही विस्थापित कर दिया गया। वे न तो पुरानी आजीविका पा सके और न नई। वहीं, शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में गर्मी बढ़ती गई क्योंकि आसपास की हरियाली खत्म हो गई।
आज देशवासी इस ‘विकास मॉडल’ की कीमत भुगत रहे हैं। किसान फसल नुकसान से परेशान, आदिवासी अपनी संस्कृति और आजीविका से वंचित, आम नागरिक भीषण गर्मी और स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा है।
क्या यह ‘सरेंडर’ है?
जब विकास पर्यावरण और लोगों की कीमत पर हो तो उसे सच्चा विकास नहीं कहा जा सकता। प्रकृति से छेड़छाड़ का नतीजा आज सामने है – बढ़ती गर्मी, घटते जल स्रोत, बिगड़ता मौसम पैटर्न और असंतुलित पारिस्थितिकी।
वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि भारत अभी जलवायु संकट के सबसे बुरे प्रभावों को नहीं देखा है। अगर जंगलों की रक्षा, जल संरक्षण और सस्टेनेबल डेवलपमेंट को प्राथमिकता नहीं दी गई तो आने वाले सालों में स्थिति और बिगड़ सकती है।
अब क्या किया जाए?
1. वन संरक्षण को प्राथमिकता: मौजूदा जंगलों को सख्ती से बचाएं, बड़े पैमाने पर वास्तविक वनीकरण करें (केवल कागजी आंकड़े नहीं)।
2. आदिवासी अधिकारों का सम्मान: वन अधिकार अधिनियम (FRA) को प्रभावी ढंग से लागू करें, विस्थापितों को उचित पुनर्वास दें।
3. सस्टेनेबल इंफ्रास्ट्रक्चर: हर बड़े प्रोजेक्ट में पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन को गंभीरता से लें, ग्रीन टेक्नोलॉजी अपनाएं।
4. शहरी नियोजन: शहरों में ग्रीन स्पेस बढ़ाएं, हीट आइलैंड प्रभाव कम करने के लिए पेड़ लगाएं और जल निकायों को बचाएं।
5. जलवायु अनुकूलन: किसानों के लिए रेजिलिएंट फसलें, पानी की बचत वाली तकनीकें और स्थानीय स्तर पर जल संरक्षण।
विकास जरूरी है, लेकिन वह प्रकृति और लोगों के साथ हो, उनके खिलाफ नहीं। ‘जल, जंगल, जमीन’ हमारी विरासत हैं। इन्हें बचाना सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा का सवाल है।
अगर हम अभी नहीं जागे तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ गर्मी ही नहीं, बल्कि विकास के नाम पर हुए विनाश की भारी कीमत चुकाएंगी।
समय है सोचने का – क्या हम वाकई विकास कर रहे हैं या सिर्फ विनाश को नया नाम दे रहे हैं?
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 27,2026