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Friday, 22 May 2026

दिल्ली हाई कोर्ट की मानवीय संवेदना: उमर खालिद को मिली 3 दिन की अंतरिम जमानत, बीमार मां की सर्जरी के लिए तिहाड़ से बाहर आएंगे छात्र नेता

दिल्ली हाई कोर्ट की मानवीय संवेदना: उमर खालिद को मिली 3 दिन की अंतरिम जमानत, बीमार मां की सर्जरी के लिए तिहाड़ से बाहर आएंगे छात्र नेता
-Friday World-22 May 2026
नई दिल्ली। एक लंबे इंतजार और कानूनी लड़ाई के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने छात्र नेता और सामाजिक कार्यकर्ता उमर खालिद को एक महत्वपूर्ण राहत दी है। अदालत ने उन्हें 1 जून 2026 सुबह 7 बजे से 3 जून 2026 शाम 5 बजे तक की तीन दिन की अंतरिम जमानत मंजूर कर दी है। यह फैसला मुख्य रूप से उनकी 62 वर्षीय मां की आगामी सर्जरी को ध्यान में रखते हुए लिया गया है, जिसमें अदालत ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाया।

यह जमानत 1 लाख रुपये के व्यक्तिगत मुचलके पर दी गई है। उमर खालिद को इस दौरान दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में ही रहना होगा, केवल अस्पताल जाना अनुमत है और एक ही मोबाइल नंबर का उपयोग करने की शर्त लगाई गई है।

पृष्ठभूमि: 2020 दिल्ली दंगों का मामला
उमर खालिद, जिन्हें जेएनयू के पूर्व छात्र नेता के रूप में जाना जाता है, 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े "बड़ी साजिश" मामले में सितंबर 2020 से तिहाड़ जेल में बंद हैं। इस मामले में यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) के तहत आरोप लगाए गए हैं। दंगों में 53 लोगों की जान गई थी और सैकड़ों घायल हुए थे।

खालिद पर आरोप है कि उन्होंने CAA-NRC विरोधी आंदोलन के दौरान भाषणों और गतिविधियों के जरिए दंगों की साजिश रची। हालांकि, खालिद लगातार इन आरोपों से इनकार करते रहे हैं और इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में उनकी नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद उन्होंने अंतरिम जमानत के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।

 ट्रायल कोर्ट से हाई कोर्ट तक की यात्रा
कुछ दिन पहले अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बाजपेयी की अदालत ने खालिद की 15 दिन की अंतरिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी। याचिका में उन्होंने चाचा के चहलुम (40वें दिन की रस्म) और मां की सर्जरी दोनों का हवाला दिया था। ट्रायल कोर्ट ने इसे पर्याप्त आधार नहीं माना और कहा कि परिवार के अन्य सदस्य मां की देखभाल कर सकते हैं।

इस फैसले के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में अपील दायर की गई। जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन की खंडपीठ ने 22 मई 2026 को सुनवाई की। दिल्ली पुलिस की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने याचिका का विरोध किया और कहा कि सर्जरी गंभीर नहीं है, पुलिस एस्कॉर्ट में मुलाकात की जा सकती है।

लेकिन हाई कोर्ट ने "एम्पैथेटिक व्यू" (संवेदनशील दृष्टिकोण) अपनाते हुए कहा, "यह अदालत मानवीय आधार पर उमर खालिद को तीन दिन की अंतरिम जमानत देने के लिए इच्छुक है, ताकि वे अपनी मां के साथ समय बिता सकें।" अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि खालिद पहले भी कई मौकों पर अंतरिम जमानत पर रिहा हुए थे और शर्तों का पालन किया था।

मां की सर्जरी और परिवार की चिंता
उमर खालिद की मां की उम्र 62 वर्ष है और उन्हें 2 जून को प्राइवेट अस्पताल में लंप एक्साइजन (गांठ निकालने) की सर्जरी करवानी है। परिवार का कहना है कि इस उम्र में सर्जरी के दौरान बेटे का साथ होना बेहद जरूरी है। खालिद ने याचिका में भावुक अपील की थी कि वे अपनी मां की देखभाल करना चाहते हैं।

चाचा के चहलुम का मुद्दा भी उठाया गया था, लेकिन अदालत ने मुख्य रूप से मां की सर्जरी पर फोकस करते हुए सीमित राहत दी।

 कानूनी शर्तें और पालन की जिम्मेदारी
-समयावधि: 1 जून सुबह 7 बजे से 3 जून शाम 5 बजे तक।

- जमानत राशि: 1 लाख रुपये का व्यक्तिगत मुचलका।

- प्रतिबंध: दिल्ली-एनसीआर से बाहर नहीं जाना, केवल अस्पताल जाना, एक मोबाइल नंबर का उपयोग।

- रिहाई: तिहाड़ जेल से शर्तों के साथ रिहा किया जाएगा।

उमर खालिद: एक विवादास्पद लेकिन प्रभावशाली व्यक्तित्व
उमर खालिद जेएनयू छात्र राजनीति के चेहरे रहे हैं। 2016 के जेएनयू विवाद के बाद वे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए। CAA-NRC विरोध प्रदर्शनों में उनके भाषण वायरल हुए, जिन्हें कुछ लोग शांतिपूर्ण आंदोलन का हिस्सा मानते हैं तो कुछ लोग उकसावे भरा बताते हैं।

उनके समर्थक उन्हें विचारधारा के कैदी कहते हैं, जबकि विरोधी उन्हें दंगों का सूत्रधार मानते हैं। इस मामले में कई अन्य छात्र नेता और कार्यकर्ता भी आरोपी हैं, लेकिन जमानत मिलने-न मिलने को लेकर बहस जारी है।

मानवीय आधार पर जमानत: अदालतों का संतुलित रवैया
भारतीय न्याय व्यवस्था में यूएपीए जैसे सख्त कानूनों के तहत जमानत मिलना मुश्किल होता है। लेकिन अदालतें समय-समय पर मानवीय आधार (मेडिकल इमरजेंसी, परिवार की जरूरत) पर अंतरिम राहत देती रही हैं। इस फैसले को कई कानूनी विशेषज्ञों ने संवेदनशील और संतुलित बताया है।

यह फैसला याद दिलाता है कि कानून की कठोरता के बीच भी इंसानियत की जगह बनी रहनी चाहिए। पूर्व में भी खालिद को शादी और अन्य पारिवारिक मौकों पर अंतरिम जमानत मिल चुकी है, और उन्होंने हर बार शर्तों का पालन किया।

 समाज पर प्रभाव और बहस
यह घटना भारतीय लोकतंत्र में जेल में बंद लोगों के अधिकारों, परिवार की जिम्मेदारियों और न्यायिक संवेदनशीलता पर नई बहस छेड़ सकती है। एक ओर जहां सुरक्षा एजेंसियां गंभीर आरोपों में सख्ती बरतने की वकालत करती हैं, वहीं मानवाधिकार कार्यकर्ता लंबे समय तक ट्रायल न होने को चिंता का विषय बताते हैं।

उमर खालिद का मामला पिछले छह वर्षों से सुर्खियों में है। ट्रायल अभी चल रहा है और इसमें कई गवाह, दस्तावेजी सबूत और डिजिटल evidence शामिल हैं। अंतिम फैसला आने में समय लग सकता है।

आगे क्या?
3 जून को जमानत अवधि समाप्त होने पर उमर खालिद को वापस जेल लौटना होगा। इस बीच वे अपनी मां की सर्जरी के बाद उनका हालचाल देख सकेंगे। परिवार के लिए यह छोटा सा वक्त बहुमूल्य होगा।

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला दिखाता है कि न्यायपालिका न सिर्फ कानून की रक्षा करती है बल्कि इंसानी संवेदनाओं को भी महत्व देती है।


उमर खालिद को मिली यह अंतरिम जमानत सिर्फ एक कानूनी राहत नहीं, बल्कि एक बेटे की अपनी बीमार मां के प्रति जिम्मेदारी का सम्मान है। कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी, लेकिन इस छोटे से अंतराल में परिवार को साथ होने का मौका मिलेगा। आशा है कि सर्जरी सफल रहेगी और खालिद शर्तों का पूर्ण पालन करेंगे।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-22 May 2026