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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Thursday, 7 May 2026

सऊदी अरब का अमेरिका को एयरस्पेस देने से इनकार: ट्रंप का 'प्रोजेक्ट फ्रीडम' मात्र 48 घंटे में धराशायी, हार्मुज जलडमरूमध्य पर नया भू-राजनीतिक संकट

सऊदी अरब का अमेरिका को एयरस्पेस देने से इनकार: ट्रंप का 'प्रोजेक्ट फ्रीडम' मात्र 48 घंटे में धराशायी, हार्मुज जलडमरूमध्य पर नया भू-राजनीतिक संकट-Friday World-6 May 2026

दोस्तों, विश्व राजनीति में एक बार फिर से बड़े बदलाव की बयार बह रही है। अमेरिका, जो दशकों से खाड़ी क्षेत्र का "पुलिसमैन" बनकर घूमता रहा, आज पहली बार अपने सबसे करीबी सहयोगी सऊदी अरब की दीवार से टकरा गया है। प्रोजेक्ट फ्रीडम नाम का ऑपरेशन, जो हार्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए शुरू किया गया था, सिर्फ दो दिन में रुक गया। कारण? सऊदी अरब ने अमेरिकी विमानों को अपना एयरस्पेस और एयरबेस इस्तेमाल करने की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया।

यह घटना न केवल अमेरिकी सैन्य रणनीति की सीमाओं को उजागर करती है, बल्कि खाड़ी क्षेत्र में शक्ति संतुलन के बदलते समीकरणों का भी संकेत देती है।

घटना का पूरा क्रम: क्या हुआ और कैसे?

4 मई 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर धमाकेदार घोषणा की — "प्रोजेक्ट फ्रीडम" शुरू हो गया है। इसका उद्देश्य था ईरान द्वारा प्रभावित हार्मुज स्ट्रेट में व्यावसायिक जहाजों को सुरक्षित मार्ग प्रदान करना। अमेरिकी नौसेना पहले से ही क्षेत्र में तैनात थी, लेकिन पूर्ण ऑपरेशन के लिए लड़ाकू विमानों, रिफ्यूलिंग टैंकरों और सपोर्ट एयरक्राफ्ट की जरूरत थी, जो बिना क्षेत्रीय सहयोग के संभव नहीं था।

लेकिन घोषणा के महज एक दिन बाद ही ट्रंप को पीछे हटना पड़ा। शुरू में उन्होंने पाकिस्तान के अनुरोध का हवाला दिया, लेकिन अब **NBC न्यूज** की रिपोर्ट के अनुसार असली वजह सऊदी अरब का रुख था। सऊदी नेतृत्व ने अमेरिका को स्पष्ट संदेश दिया कि प्रिंस सुल्तान एयरबेस (रियाद के दक्षिण-पूर्व में) और सऊदी एयरस्पेस का इस्तेमाल इस मिशन के लिए नहीं किया जा सकता।

ट्रंप ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) से फोन पर बात भी की, लेकिन सहमति नहीं बन सकी। नतीजा? अमेरिका सिर्फ 3 जहाजों को सुरक्षित निकाल पाया और ऑपरेशन रोकना पड़ा।

 क्यों नाराज हुआ सऊदी अरब?

सबसे बड़ा सवाल यही है। सऊदी अरब और अमेरिका के बीच दशकों पुराना सामरिक गठबंधन है। फिर अचानक यह रुख क्यों?

1. बिना समन्वय की घोषणा: ट्रंप ने ऑपरेशन की घोषणा सोशल मीडिया पर कर दी, जबकि खाड़ी देशों को पहले से सूचित नहीं किया गया। यह उनके लिए सरप्राइज और अपमान दोनों था।

2. ईरान के साथ चल रही डिप्लोमेसी: सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश ईरान के साथ तनाव कम करने की कोशिश में हैं। पाकिस्तान के माध्यम से चल रही बातचीत में वे कोई नया संघर्ष नहीं चाहते थे।

3. क्षेत्रीय संप्रभुता और गरिमा: सऊदी अब खुद को क्षेत्रीय शक्ति के रूप में देखता है। वह अमेरिका को "ब्लैंक चेक" नहीं देना चाहता।

NBC न्यूज के अनुसार, सऊदी के इस कदम से अमेरिकी अधिकारियों में हड़कंप मच गया। हार्मुज ऑपरेशन के लिए सऊदी, जॉर्डन, कुवैत और ओमान जैसे देशों की अनुमति अनिवार्य है। बिना इनके एयर सपोर्ट के नौसैनिक मिशन जोखिम भरा हो जाता है।

हार्मुज जलडमरूमध्य: विश्व अर्थव्यवस्था की धमनी

हार्मुज स्ट्रेट दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण जलमार्ग है। यहां से रोजाना लगभग 21 मिलियन बैरल तेल गुजरता है, जो वैश्विक तेल व्यापार का करीब 20-30% है। चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देशों की ऊर्जा सुरक्षा इसी पर निर्भर है।

ईरान ने अगर यहां कोई बाधा उत्पन्न की, तो तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। प्रोजेक्ट फ्रीडम इसी को रोकने के लिए था, लेकिन इसका असफल होना ईरान को मजबूती देता है और अमेरिका की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है।

 ट्रंप की डिप्लोमेसी: जीत या मजबूरी?

ट्रंप ने शुरू में पाकिस्तान का नाम लिया। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने इसे "साहसी कदम" बताया। लेकिन असलियत में कई मोर्चों पर दबाव था:

- सऊदी और अन्य खाड़ी सहयोगियों की नाराजगी
- ईरान के साथ चल रही परमाणु/शांति वार्ता
- घरेलू राजनीतिक दबाव
- सैन्य लॉजिस्टिक्स की कमी

ट्रंप प्रशासन ने ऑपरेशन रोककर सऊदी के साथ संबंध सुधारने की कोशिश की है। लेकिन यह अमेरिकी विदेश नीति की नई कमजोरी भी दिखाता है।

क्षेत्रीय प्रभाव: भारत के लिए क्या मायने?

भारत के लिए हार्मुज बेहद महत्वपूर्ण है। हमारा 80% से ज्यादा तेल आयात खाड़ी से आता है। इस घटना के प्रभाव:

- ऊर्जा सुरक्षा: अगर तेल की आपूर्ति बाधित हुई तो कीमतें बढ़ेंगी, मुद्रास्फीति बढ़ेगी।
- कूटनीतिक संतुलन: भारत सऊदी, UAE, ईरान और इजराइल सभी के साथ संतुलित संबंध रखता है। हमें सतर्क रहना होगा।
- चाबहार-ग्वादर: ईरान के साथ हमारा चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट और पाकिस्तान का ग्वादर — यह पूरा क्षेत्र रणनीतिक रूप से गरम है।

 बड़े सवाल और भविष्य की संभावनाएं

क्या यह अमेरिका-सऊदी संबंधों में स्थायी दरार है? या अस्थायी झटका?

सऊदी अरब अब "विजन 2030" के तहत विविधीकरण कर रहा है। वह चीन और रूस के साथ भी संबंध मजबूत कर रहा है। MBS का रुख ज्यादा स्वतंत्र और आक्रामक होता जा रहा है।

दूसरी ओर, अमेरिका अभी भी दुनिया की सबसे ताकतवर सेना है, लेकिन बिना सहयोगियों के उसकी क्षमता सीमित है। यह घटना "अमेरिका फर्स्ट" नीति की सीमाओं को भी रेखांकित करती है।

 बदलते विश्व व्यवस्था का संकेत

सऊदी अरब का यह इनकार एक छोटी घटना नहीं है। यह मध्य पूर्व में बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के उदय का प्रतीक है। जहां पहले अमेरिका अकेला फैसला करता था, वहां अब स्थानीय शक्तियां अपनी शर्तें थोप रही हैं।

ट्रंप चाहे जितनी बड़ी घोषणाएं करें, लेकिन बिना क्षेत्रीय सहयोग के बड़े ऑपरेशन चलाना मुश्किल है। ईरान इस स्थिति का फायदा उठा सकता है, जबकि खाड़ी देश डिप्लोमेसी के रास्ते पर आगे बढ़ सकते हैं।

भारत जैसे देशों को इस बदलाव से सीख लेनी चाहिए — अपनी ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और स्वतंत्र विदेश नीति को और मजबूत करना होगा।

यह घटना साबित करती है कि 21वीं सदी में कोई भी महाशक्ति अकेले नहीं लड़ सकती। सहयोग, समन्वय और सम्मान अब नए युद्ध के नियम हैं।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-6 May 2026