-Friday World-7 May 2026
नई दिल्ली: विश्व की सबसे ताकतवर सेना के मालिक अमेरिका को एक बार फिर अपनी सीमाएं दिखा दी गई हैं। 4 मई 2026 को शुरू किया गया अमेरिका का हाई-प्रोफाइल प्रोजेक्ट फ्रीडम' मात्र दो दिन बाद ही धराशायी हो गया। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने का ऑपरेशन रोकना पड़ा। शुरू में पाकिस्तान का हवाला दिया गया, लेकिन अब सामने आया है कि सऊदी अरब ने अमेरिकी लड़ाकू विमानों को अपना एयरस्पेस और एयरबेस इस्तेमाल करने की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया।
यह घटना न केवल अमेरिकी विदेश नीति और सैन्य क्षमता पर सवाल उठाती है, बल्कि मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन के तेजी से बदलते समीकरणों का भी आईना है।
पूरा मामला: क्या हुआ और कैसे फेल हो गया ऑपरेशन?
4 मई को ट्रंप ने सोशल मीडिया पर धमाकेदार ऐलान किया कि हॉर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की स्वतंत्र आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए प्रोजेक्ट फ्रीडम शुरू हो गया है। लेकिन अगले ही दिन उन्होंने ऑपरेशन रोकने का आदेश दे दिया।
NBC न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, असली वजह सऊदी अरब का रुख था। अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि ट्रंप की अचानक सोशल मीडिया घोषणा से खाड़ी के सहयोगी देश हैरान रह गए। सऊदी नेतृत्व इस पर बेहद नाराज हो गया। ट्रंप ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) से फोन पर बातचीत की, लेकिन कोई सहमति नहीं बन सकी।
नतीजा यह हुआ कि अमेरिका महज 2 दिनों में केवल 3 जहाजों को सुरक्षित निकाल पाया और ऑपरेशन को बीच में ही रोकना पड़ा।
सऊदी अरब का इनकार: दोस्ती में दरार या नई वास्तविकता?
सऊदी अरब और अमेरिका के बीच दशकों पुराना रणनीतिक गठबंधन रहा है। फिर अचानक यह बदलाव क्यों?
- बिना तैयारी की घोषणा: ट्रंप की अचानक घोषणा को सऊदी समेत पूरे खाड़ी क्षेत्र ने अपमानजनक माना। क्षेत्रीय सहयोगियों से पहले समन्वय नहीं किया गया।
- ईरान के साथ तनाव कम करने की कोशिश: सऊदी अरब हाल के वर्षों में ईरान के साथ संबंध सुधारने की दिशा में काम कर रहा है। वह नया संघर्ष नहीं चाहता।
- क्षेत्रीय गरिमा और स्वतंत्र नीति: MBS के नेतृत्व में सऊदी अब खुद को स्वतंत्र क्षेत्रीय शक्ति मानता है। वह अमेरिका को हर मुद्दे पर "ब्लैंक चेक" देने को तैयार नहीं है।
हार्मुज ऑपरेशन के लिए सऊदी, जॉर्डन, कुवैत और ओमान जैसे देशों का एयरस्पेस और बेस बेहद जरूरी होते हैं। बिना इनके सपोर्ट के अमेरिकी लड़ाकू विमान, रिफ्यूलिंग टैंकर और सपोर्ट एयरक्राफ्ट का मिशन असंभव हो जाता है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य: दुनिया की तेल धमनी
हॉर्मुज स्ट्रेट वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यहां से रोजाना 2.1 करोड़ बैरल से ज्यादा तेल गुजरता है — जो दुनिया के कुल तेल व्यापार का 20-30% है। चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया समेत कई देश इस मार्ग पर निर्भर हैं।
ईरान अगर इस जलडमरूमध्य को बंद कर दे तो वैश्विक तेल कीमतें आसमान छू सकती हैं और महंगाई का नया तूफान आ सकता है। प्रोजेक्ट फ्रीडम इसी खतरे से निपटने के लिए शुरू किया गया था, लेकिन इसका असफल होना ईरान को मनोबल बढ़ाता है और अमेरिका की विश्वसनीयता को कमजोर करता है।
ट्रंप की डिप्लोमेसी: विज्ञापन ज्यादा, तैयारी कम?
ट्रंप ने पहले पाकिस्तान का नाम लिया। लेकिन वास्तविकता में कई मोर्चों पर दबाव था — सऊदी की नाराजगी, ईरान के साथ चल रही वार्ताएं, लॉजिस्टिक चुनौतियां और घरेलू राजनीति।
यह घटना "अमेरिका फर्स्ट" नीति की एक और सीमा को उजागर करती है। भले ही ट्रंप बड़े-बड़े ऐलान करें, लेकिन बिना क्षेत्रीय सहयोगियों के बड़े सैन्य अभियान चलाना अब मुश्किल हो गया है।
भारत के लिए मायने
भारत के लिए यह घटना बेहद महत्वपूर्ण है:
- ऊर्जा सुरक्षा: भारत अपना **80% से ज्यादा** कच्चा तेल खाड़ी क्षेत्र से आयात करता है। हॉर्मुज में कोई भी अस्थिरता तेल कीमतों को बढ़ाएगी और भारतीय अर्थव्यवस्था पर बोझ डालेगी।
- कूटनीतिक संतुलन: भारत सऊदी अरब, UAE, ईरान, इजराइल और अमेरिका सभी के साथ अच्छे संबंध रखता है। हमें इस बदलते समीकरण में सतर्क और संतुलित रणनीति अपनानी होगी।
- समुद्री सुरक्षा: भारतीय नौसेना पहले से ही अरब सागर और हिंद महासागर में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है। चाबहार पोर्ट का विकास इस संदर्भ में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
भविष्य की संभावनाएं
क्या सऊदी-अमेरिका संबंधों में स्थायी दरार आ गई है? या यह अस्थायी झटका है?
सऊदी अरब विजन 2030 के तहत अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से मुक्त करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। वह चीन और रूस के साथ भी मजबूत संबंध बना रहा है। वहीं अमेरिका अभी भी दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना है, लेकिन सहयोगियों के बिना उसकी प्रभावशीलता सीमित है।
यह घटना 21वीं सदी की नई भू-राजनीति का प्रतीक है — जहां पुराने गठबंधन ढीले पड़ रहे हैं और देश अपनी राष्ट्रीय हितों के अनुसार स्वतंत्र फैसले ले रहे हैं।
ट्रंप द्वारा हॉर्मुज से जहाजों का रेस्क्यू रोकना एक छोटी घटना नहीं है। यह अमेरिका की घटती विश्वसनीयता, सऊदी अरब की बढ़ती स्वतंत्रता और मध्य पूर्व में उभरती नई शक्ति व्यवस्था का संकेत है।
जब तक महाशक्तियां क्षेत्रीय देशों की गरिमा और हितों का सम्मान नहीं करेंगी, तब तक ऐसे ऑपरेशन फेल होते रहेंगे।
21वीं सदी का सबसे बड़ा सबक: कोई भी देश, चाहे वह कितना भी ताकतवर हो, अकेले नहीं लड़ सकता। समन्वय, कूटनीति और पारस्परिक सम्मान ही नई दुनिया के नियम हैं।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-7 May 2026