-Friday World-7 May 2026
नई दिल्ली: मध्य पूर्व की आग फिर भड़क उठी है। बातचीत की मेज पर बैठे अमेरिका और इजरायल ने एक तरफ तो ईरान से डिप्लोमेसी की बात की, दूसरी तरफ अचानक मिलिट्री अटैक कर दिया। लेकिन ईरान ने इस बार कोई ढील नहीं दी। बातचीत छोड़कर जवाबी कार्रवाई में ईरान ने मात्र 48 घंटे में मध्य पूर्व के अमेरिकी सैन्य अड्डों को भारी नुकसान पहुंचाया। रिपोर्ट्स के अनुसार, 15 से ज्यादा अमेरिकी बेस पर हमले हुए, सैकड़ों संपत्तियां क्षतिग्रस्त हुईं और अमेरिका-इजरायल को घुटने टेकने की स्थिति में ला दिया गया।
अब ईरान ने सबसे बड़ा दांव खेल दिया है — हॉर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया। दुनिया को साफ संदेश दिया गया है कि गैस और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की कमी और बढ़ते दामों का जिम्मेदार सिर्फ अमेरिका-इजरायल है। अगर उनके हमले न होते तो हॉर्मुज खुला रहता। अब जो टोल टैक्स या नई व्यवस्था लगेगी, उसकी जिम्मेदारी भी इन्हीं की है।
क्या हुआ 48 घंटे में?
ईरान ने जवाबी हमले में ड्रोन, मिसाइल और एयर स्ट्राइक से अमेरिकी बेस को निशाना बनाया।
- 228 से ज्यादा अमेरिकी संपत्तियां (रडार, हैंगर, फ्यूल डिपो, एयरक्राफ्ट) क्षतिग्रस्त या नष्ट।
- बहरैन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब, जॉर्डन, UAE सहित कई ठिकानों पर भारी असर।
- अमेरिकी सेना की कमांड नेटवर्क, सैटेलाइट कम्युनिकेशन और एयर डिफेंस सिस्टम (PATRIOT, THAAD) बुरी तरह प्रभावित।
वाशिंगटन पोस्ट और CNN जैसी मीडिया रिपोर्ट्स में सैटेलाइट इमेजेस के हवाले से पुष्टि हुई कि ईरान की स्ट्राइक्स ने अमेरिका की क्षेत्रीय मौजूदगी को भारी झटका दिया। अमेरिका को मजबूरन “प्रोजेक्ट फ्रीडम” जैसे ऑपरेशन रोकने पड़े और हॉर्मुज में जहाज निकालने की कोशिश भी फेल हो गई।
हॉर्मुज स्ट्रेट: ईरान का रणनीतिक हथियार
दुनिया के तेल व्यापार का **20-30%** इसी जलडमरूमध्य से गुजरता है। ईरान ने इसे बंद करके दुनिया को दिखा दिया:
- अगर ईरान पर हमला न होता तो सप्लाई चेन बरकरार रहती।
- अब तेल-गैस की कमी और कीमतों में उछाल सिर्फ अमेरिका-इजरायल की गलत नीतियों का नतीजा है।
- ईरान ने साफ कहा — बिना अनुमति कोई जहाज नहीं गुजरेगा। टोल टैक्स, नियम और “पर्सियन गल्फ” नाम की शर्तें अब लागू होंगी।
इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था हिल गई है। भारत, चीन, जापान, यूरोप जैसे देशों में तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, मुद्रास्फीति का खतरा मंडरा रहा है।
अमेरिका-इजरायल की दोहरी नीति उजागर
एक तरफ ट्रंप प्रशासन ईरान से बातचीत की बात करता रहा, दूसरी तरफ इजरायल के साथ मिलकर हमले किए। ईरान का कहना है कि यह “साम्राज्यवादी” रणनीति है। जब बातचीत चल रही थी, तभी अचानक सैन्य कार्रवाई हुई, जिसका जवाब ईरान ने तेजी से दिया।
अब अमेरिका को UNSC में प्रस्ताव लाना पड़ रहा है, लेकिन ईरान ने सदस्य देशों से इसे नकारने की अपील की है। सऊदी अरब जैसे पुराने सहयोगी भी अमेरिका को एयरस्पेस देने से इनकार कर चुके हैं। यह दिखाता है कि अमेरिका की “अमेरिका फर्स्ट” नीति अब मध्य पूर्व में काम नहीं कर रही।
दुनिया पर असर और भारत के लिए चुनौती
- तेल की कीमतें: वैश्विक बाजार में उछाल, भारत जैसे आयातक देशों पर बोझ।
- आपूर्ति संकट: पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स, गैस और फर्टिलाइजर की कमी।
- भू-राजनीतिक बदलाव: ईरान ने साबित कर दिया कि वह क्षेत्रीय शक्ति है और अकेले लड़ने की क्षमता रखता है।
भारत के लिए यह स्थिति दोधारी तलवार है। हम हॉर्मुज पर निर्भर हैं, लेकिन चाबहार पोर्ट और INSTC जैसे विकल्प भी विकसित कर रहे हैं। इस संकट में भारत को संतुलित कूटनीति अपनानी होगी — न तो अमेरिका-इजरायल के साथ पूरी तरह, न ही ईरान के खिलाफ।
नई वास्तविकता
ईरान ने 48 घंटे में जो कर दिखाया, उसने अमेरिका-इजरायल की सैन्य श्रेष्ठता के मिथक को तोड़ दिया। हॉर्मुज बंद करके ईरान ने दुनिया को बता दिया — “तेल की कमी और आर्थिक संकट का जिम्मेदार अमेरिका-इजरायल ही है।”
अब सवाल यह है कि अमेरिका आगे क्या करेगा? ज्यादा हमले? या समझौता? ट्रंप “डील” की बात कर रहे हैं, लेकिन ईरान साफ कह चुका है — बिना शर्तों के कोई समझौता नहीं।
यह घटनाक्रम साबित करता है कि 21वीं सदी में पुरानी महाशक्तियां अब अकेले सब कुछ तय नहीं कर सकतीं। क्षेत्रीय शक्तियां जैसे ईरान अपनी गरिमा, सुरक्षा और हितों की रक्षा के लिए कड़े कदम उठा रही हैं।
दुनिया अब देख रही है — अमेरिका-इजरायल की गलत नीतियां कितनी महंगी पड़ रही हैं। अगर वे पीछे नहीं हटे तो तेल संकट और गहरा होगा, और मध्य पूर्व की आग और भड़केगी।
शांति की राह बातचीत से है, हमले से नहीं। लेकिन जवाबी कार्रवाई का अधिकार हर देश को है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-7 May 2026