नई दिल्ली: दुनिया की एकमात्र महाशक्ति समझे जाने वाले अमेरिका को अब मध्य पूर्व में अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है। हॉर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही बहाल करने के लिए अमेरिका ने UNSC में एक नया प्रस्ताव पेश किया है, लेकिन ईरान ने तुरंत जवाबी कार्रवाई करते हुए सभी सदस्य देशों से इस प्रस्ताव को खारिज करने की अपील कर दी है।
यह घटना 'प्रोजेक्ट फ्रीडम' के असफल होने के महज कुछ दिन बाद आई है, जब सऊदी अरब ने अमेरिकी विमानों को अपना एयरस्पेस देने से इनकार कर दिया था। अब लग रहा है कि अमेरिका के लिए मध्य पूर्व में 'हवेली' (प्रभाव क्षेत्र) बनाए रखना भी मुश्किल होता जा रहा है।
UNSC में अमेरिकी प्रस्ताव: क्या है मकसद?
अमेरिकी राजनयिकों ने सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव रखा है जिसमें हॉर्मुज जलडमरूमध्य में अंतरराष्ट्रीय जहाजों की स्वतंत्र और सुरक्षित आवाजाही को सुनिश्चित करने की बात कही गई है। प्रस्ताव में ईरान द्वारा संभावित खतरे का जिक्र करते हुए अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने और नौसैनिक सुरक्षा बढ़ाने की अपील की गई है।
लेकिन ईरान ने इसे सीधा चुनौती माना है। ईरानी विदेश मंत्रालय ने सदस्य देशों से कहा है कि यह प्रस्ताव "अमेरिकी साम्राज्यवाद" का हिस्सा है और इसे नकार देना चाहिए। ईरान का तर्क है कि हॉर्मुज उसका क्षेत्रीय जल क्षेत्र है और वह खुद इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने को तैयार है।
पिछली घटनाओं का सिलसिला
यह प्रस्ताव अकेला नहीं आया है। कुछ दिन पहले ही अमेरिका ने 'प्रोजेक्ट फ्रीडम' शुरू किया था, लेकिन सऊदी अरब के एयरस्पेस इनकार और क्षेत्रीय देशों की अनिच्छा के कारण इसे मात्र 48 घंटे में रोकना पड़ा। अमेरिका सिर्फ 3 जहाज सुरक्षित निकाल पाया।
ट्रंप प्रशासन ने शुरू में पाकिस्तान का हवाला दिया, लेकिन बाद में NBC न्यूज की रिपोर्ट में साफ हुआ कि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने अमेरिकी लड़ाकू विमानों और टैंकरों को अपना बेस इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी। ट्रंप और MBS के बीच फोन पर बात हुई, लेकिन कोई समझौता नहीं हो सका।
अब UNSC का रास्ता अपनाकर अमेरिका अपनी कूटनीतिक हार को सैन्य-राजनीतिक जीत में बदलने की कोशिश कर रहा है।
हॉर्मुज स्ट्रेट: वैश्विक अर्थव्यवस्था की धमनी
हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण जलमार्ग है। यहां से रोजाना 2.1 करोड़ बैरल से अधिक तेल गुजरता है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का 20-30 प्रतिशत है।
- चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय देश इस मार्ग पर भारी निर्भर हैं।
- अगर यहां कोई बाधा आई तो तेल की कीमतें 150-200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।
- ईरान ने पहले भी धमकी दी है कि अगर अमेरिका या इजराइल ने हमला किया तो वह हॉर्मुज को बंद कर सकता है।
ईरान क्यों आक्रामक है?
ईरान लंबे समय से हॉर्मुज को अपना "रणनीतिक हथियार" मानता आया है। हाल के वर्षों में:
- ईरान ने अपने मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रम को मजबूत किया है।
- होउती विद्रोहियों (यमन) के माध्यम से लाल सागर में हमले करवाए।
- चीन और रूस के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ाई।
- सऊदी अरब और UAE के साथ भी सीधी या अप्रत्यक्ष बातचीत शुरू की।
ईरान अब अमेरिका को अकेला पड़ता देखकर और आक्रामक हो रहा है। UNSC प्रस्ताव को वह "अंतरराष्ट्रीयकरण" का प्रयास मान रहा है।
अमेरिका की मजबूरी: सहयोगी अब साथ नहीं
यह घटनाक्रम अमेरिका के लिए कई सबक लेकर आया है:
1. सऊदी अरब का बदलता रुख — MBS अब अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहते।
2. क्षेत्रीय देशों की थकान— खाड़ी देश लगातार अमेरिकी सैन्य अभियानों में शामिल होने से बच रहे हैं।
3. ट्रंप की अनएक्सपेक्टेड स्टाइल— अचानक सोशल मीडिया घोषणाएं क्षेत्रीय सहयोगियों को नाराज कर रही हैं।
4. बहुध्रुवीय दुनिया— चीन और रूस UNSC में अमेरिका का विरोध कर सकते हैं।
भारत के लिए चुनौती और अवसर
भारत के लिए हॉर्मुज की सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारा **80% से अधिक** कच्चा तेल इसी रास्ते से आता है।
प्रभाव:
- तेल कीमतें बढ़ने से मुद्रास्फीति और व्यापार संतुलन प्रभावित होगा।
- भारतीय नौसेना को अरब सागर में अपनी मौजूदगी और बढ़ानी होगी।
- चाबहार पोर्ट और INSTC गलियारे की अहमियत और बढ़ गई है।
अवसर
- भारत सऊदी, UAE, ईरान और अमेरिका सभी के साथ संतुलित संबंध रखता है।
- यह समय है कि भारत क्षेत्रीय सुरक्षा संवाद में और सक्रिय भूमिका निभाए।
भविष्य की संभावनाएं
UNSC में यह प्रस्ताव पास होता है या वीटो का शिकार?
- अगर पास हुआ तो अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनेगा, लेकिन ईरान और उसके सहयोगी इसे चुनौती देंगे।
- अगर फेल हुआ तो अमेरिका की कूटनीतिक हार और स्पष्ट हो जाएगी।
- सबसे संभावित परिणाम — लंबी कूटनीतिक जंग और हॉर्मुज में तनाव बरकरार रहना।
: अमेरिका का 'हवेली' संकट
अमेरिका अब मध्य पूर्व में पुरानी तरह हावी नहीं हो पा रहा है। सऊदी का एयरस्पेस इनकार, 'प्रोजेक्ट फ्रीडम' का फियास्को और अब UNSC में ईरान का विरोध — ये सभी घटनाएं एक नई सच्चाई की ओर इशारा कर रही हैं:
21वीं सदी में महाशक्तियां अकेले कुछ नहीं कर सकतीं।
ट्रंप प्रशासन भले ही "अमेरिका फर्स्ट" का नारा दे, लेकिन बिना क्षेत्रीय सहयोगियों के बड़े अभियान चलाना असंभव होता जा रहा है। ईरान इस स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है, जबकि सऊदी और अन्य खाड़ी देश अपनी स्वतंत्र नीति बना रहे हैं।
मध्य पूर्व में अब पुराना नियम बदल गया है। यहां" अब ताकत नहीं, बल्कि कूटनीति, सम्मान और साझा हितों की जरूरत है। वर्ना ईरान की ताकत से पूरा मध्य पूर्व ताक़त वान बन सकता हे
अमेरिका इस सबक को कितना समझ पाता है, यह आने वाले दिनों में साफ होगा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-7 May 2026