नई दिल्ली/कोलकाता। पश्चिम बंगाल की 2026 विधानसभा चुनावी नतीजों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भारतीय राजनीति में अपराध, धन और सत्ता का गठजोड़ कितना गहरा होता जा रहा है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की नवीनतम रिपोर्ट चौंकाने वाले आंकड़े पेश करती है। कुल 292 निर्वाचित विधायकों में से 190 यानी 65 प्रतिशत ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। यह 2021 के 49 प्रतिशत से काफी ज्यादा है। गंभीर आपराधिक मामलों की संख्या भी बढ़कर 58 प्रतिशत हो गई है।
यह रिपोर्ट सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सेहत का आईना है। जहां एक ओर राजनीतिक दल “जनसेवा” और “सुशासन” का नारा देते हैं, वहीं दूसरी ओर अपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों की जीत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा।
भयावह आंकड़े: अपराध और राजनीति का गहराता गठबंधन
ADR ने सभी 292 विजेता उम्मीदवारों के चुनावी हलफनामों का विस्तृत विश्लेषण किया है। नतीजे हैरान कर देने वाले हैं:
- 190 विधायक (65%) पर आपराधिक मामले दर्ज।
- 170 विधायक (58%) पर गंभीर आपराधिक मामले (IPC की गंभीर धाराओं के तहत)।
- 14 विधायकों पर हत्या के मामले।
- 54 विधायकों पर हत्या के प्रयास के मामले।
- 63 विधायकों पर महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले, जिनमें 2 पर बलात्कार के आरोप।
2021 में गंभीर मामलों वाले विधायकों की संख्या 39 प्रतिशत थी, जो अब 58 प्रतिशत हो गई है। यह 19 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी है। मतलब साफ है – पश्चिम बंगाल की विधानसभा अधिक “अपराधी-प्रधान” होती जा रही है।
पार्टी-वार स्थिति और भी चौंकाती है:
- भाजपा: 206 सीटें जीतीं। इनमें से 152 विधायक (74%) पर आपराधिक मामले। यानी तीन में से दो भाजपा विधायक आपराधिक पृष्ठभूमि वाले हैं।
- तृणमूल कांग्रेस: 80 सीटें जीतीं। इनमें से **34 विधायक** (43%) पर आपराधिक मामले।
भाजपा में आपराधिक मामलों का प्रतिशत तृणमूल से कहीं ज्यादा है, जबकि कुल संख्या में भाजपा आगे है। यह दर्शाता है कि बड़े पैमाने पर टिकट बंटवारे में दोनों प्रमुख दलों ने आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों को तरजीह दी।
करोड़पतियों की विधानसभा: अमीरी का बोलबाला
आर्थिक पारदर्शिता के लिहाज से भी तस्वीर चिंताजनक है। 292 विधायकों में से 178 (61%) करोड़पति हैं। 2021 में यह आंकड़ा 54 प्रतिशत था। कुल घोषित संपत्ति 1091 करोड़ रुपये है। एक विधायक की औसत संपत्ति 3.73 करोड़ रुपये पहुंच गई है, जो 2021 के 2.53 करोड़ से काफी ज्यादा है।
पार्टी-वार औसत संपत्ति:
- तृणमूल कांग्रेस: 5.36 करोड़ रुपये प्रति विधायक
- भाजपा: 2.97 करोड़ रुपये प्रति विधायक
तृणमूल के विधायक औसतन ज्यादा अमीर साबित हुए हैं। कुछ विधायकों की संपत्ति तो दसियों करोड़ में है। यह सवाल उठाता है कि इतनी बड़ी संपत्ति का स्रोत क्या है? राजनीति में प्रवेश से पहले ये लोग क्या करते थे और सत्ता में आने के बाद उनकी संपत्ति में कितनी वृद्धि हुई?
शिक्षा का स्तर: डिग्री वाले, लेकिन नैतिकता का अभाव?
शिक्षा के मामले में स्थिति थोड़ी बेहतर दिखती है। 63 प्रतिशत विधायक स्नातक या उससे ऊपर की शिक्षा वाले हैं। जबकि **32 प्रतिशत** मात्र 5वीं से 12वीं तक पढ़े हैं।
डिग्री का होना अच्छी बात है, लेकिन जब ये डिग्रीधारी विधायक हत्या, बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर मामलों में फंसे होते हैं, तो शिक्षा का मूल्य संदिग्ध हो जाता है। शिक्षा तो सिर्फ डिग्री नहीं, चरित्र और नैतिकता भी होनी चाहिए।
2021 बनाम 2026: गिरावट या सुधार?
2021 की तुलना में 2026 में आपराधिक मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
- आपराधिक मामले: 49% → 65%
- गंभीर मामले: 39% → 58%
यह वृद्धि दर्शाती है कि राजनीतिक दलों ने पिछले पांच वर्षों में भी आपराधिक तत्वों को टिकट देने का सिलसिला नहीं रोका, बल्कि बढ़ाया है। पश्चिम बंगाल में हिंसा, पोस्टल बालेट विवाद और सत्ता के लिए सड़क पर उतरने वाली राजनीति के बीच ऐसे आंकड़े आश्चर्यजनक नहीं, लेकिन चिंताजनक जरूर हैं।
लोकतंत्र पर सवाल
ADR जैसी निष्पक्ष संस्था के आंकड़े बार-बार यही चीख-चीखकर कहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र में “वोट की ताकत” अपराधियों और धनबल वाले लोगों के हाथ में केंद्रित होती जा रही है।
जब विधानसभा में बैठने वाले लोग खुद कानून के शिकंजे में फंसे होते हैं, तो वे कानून बनाने और लागू करने की नैतिकता कैसे रख सकते हैं? महिलाओं के खिलाफ अपराध वाले 63 विधायकों की मौजूदगी में “नारी सशक्तिकरण” के नारे कितने खोखले लगते हैं? हत्या के 14 और हत्या के प्रयास के 54 मामलों वाले लोगों से राज्य की कानून व्यवस्था की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
राष्ट्रीय संदर्भ
पश्चिम बंगाल अकेला नहीं है। कई अन्य राज्यों में भी इसी तरह के ट्रेंड देखे गए हैं। सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग समय-समय पर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों पर रोक लगाने की बात कहते रहे हैं, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण कोई ठोस कदम नहीं उठ पाया।
कुछ सुझाव जो विशेषज्ञ देते हैं:
1. चुनावी हलफनामों में झूठे बयान पर कड़ी सजा।
2. गंभीर आपराधिक मामलों में फंसे लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने वाला कानून।
3. राजनीतिक दलों की फंडिंग पर सख्त निगरानी।
4. संपत्ति स्रोत की जांच।
निष्कर्ष: बदलाव की जरूरत
पश्चिम बंगाल की 2026 विधानसभा चुनावी रिपोर्ट एक चेतावनी है। 65 प्रतिशत आपराधिक पृष्ठभूमि वाले विधायकों वाली सदन में सच्चा सुशासन और विकास की उम्मीद करना कठिन है। करोड़पतियों की भरमार और अपराधियों का दबदबा आम जनता के हितों को पीछे धकेल रहा है।
लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब उसकी संसद और विधानसभाएं ईमानदार, सक्षम और नैतिक लोगों से भरी होती हैं। फिलहाल पश्चिम बंगाल की तस्वीर अलग है। अब देखना यह है कि जनता और सिविल सोसायटी इस चुनौती का मुकाबला कैसे करती है।
क्या राजनीतिक दल स्वेच्छा से सुधार करेंगे? या जनता को ही बड़े बदलाव के लिए सड़क पर उतरना पड़ेगा? समय जवाब देगा। लेकिन ADR की यह रिपोर्ट भविष्य के इतिहासकारों के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बनकर रहेगी – यह दस्तावेज कि 21वीं सदी के दूसरे दशक में भारतीय लोकतंत्र कितना “स्वस्थ” था।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World- 7 May 2026