दुनिया के सबसे संवेदनशील जलमार्ग हॉर्मुज की खाड़ी (Strait of Hormuz) को अब सिर्फ तेल का गला नहीं, बल्कि डिजिटल युग का सबसे खतरनाक चोकपॉइंट बनाया जा रहा है। ईरान ने हाल ही में अंडरसी इंटरनेट केबल्स पर अपना नियंत्रण मजबूत करने और उनसे राजस्व वसूलने की तैयारियां तेज कर दी हैं। IRGC से जुड़े मीडिया आउटलेट्स ने इसे “डिजिटल टोल बूथ” का नाम दिया है।
यह कोई साधारण खबर नहीं है। यह वैश्विक अर्थव्यवस्था, बैंकिंग, क्लाउड कंप्यूटिंग, AI, सोशल मीडिया और रोजमर्रा की डिजिटल जिंदगी पर सीधा हमला है।
हॉर्मुज: तेल से ज्यादा डेटा का साम्राज्य
हॉर्मुज की खाड़ी दुनिया के तेल निर्यात का करीब 20-30% हिस्सा संभालती है, लेकिन अब उसका डिजिटल महत्व और भी बड़ा हो गया है। समुद्र तल पर बिछी फाइबर ऑप्टिक केबल्स के जरिए विश्व का लगभग 95-99% अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट ट्रैफिक गुजरता है। इनमें से कई महत्वपूर्ण केबल्स हॉर्मुज और फारस की खाड़ी से होकर गुजरती हैं।
AAE-1 (Asia-Africa-Europe 1), FALCON, Gulf Bridge International जैसी प्रमुख केबल्स एशिया, मध्य पूर्व और यूरोप को जोड़ती हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, इन केबल्स से रोजाना 10 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा के फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन्स गुजरते हैं। ईरान अब इन्हें “सॉवरेन्टी” का मुद्दा बनाकर लाइसेंस फीस, प्रोटेक्शन चार्ज और मेंटेनेंस कंट्रोल की मांग कर रहा है।
ईरान की नई रणनीति: डिजिटल टोल और नियंत्रण
IRGC से जुड़े तस्नीम (Tasnim) और फार्स (Fars) मीडिया ने हालिया रिपोर्ट्स में स्पष्ट रूप से कहा है कि हॉर्मुज सिर्फ एनर्जी चोकपॉइंट नहीं, बल्कि “हिडन हाईवे” ऑफ डेटा भी है। ईरान के प्रस्ताव में शामिल हैं:
- विदेशी कंपनियों से परमिट और लाइसेंसिंग फीस वसूलना।
- सालाना “प्रोटेक्शन फीस” (Meta, Amazon, Microsoft जैसी कंपनियों से)।
- केबल्स की मरम्मत और रखरखाव का पूरा अधिकार ईरानी कंपनियों को देना।
- विदेशी ऑपरेटर्स को ईरानी कानून मानने के लिए मजबूर करना।
यह मॉडल ठीक वैसा ही है जैसे जहाजों से फीस वसूली जाती है, लेकिन अब डिजिटल ट्रैफिक पर। अगर ईरान सफल होता है तो वह न सिर्फ राजस्व कमाएगा, बल्कि भू-राजनीतिक दबाव का हथियार भी हासिल कर लेगा।
वैश्विक प्रभाव: भारत समेत एशिया पर बड़ा खतरा
भारत की इंटरनेट कनेक्टिविटी, UPI पेमेंट्स, क्लाउड सर्विसेज, वीडियो कॉल्स, स्टॉक मार्केट और AI आधारित सेवाएं इन केबल्स पर काफी हद तक निर्भर हैं। अगर इनमें व्यवधान आया तो:
- बैंकिंग ट्रांजेक्शन्स रुक सकते हैं।
- क्लाउड डेटा एक्सेस प्रभावित होगा।
- सोशल मीडिया और ऑनलाइन सर्विसेज धीमी या बंद हो सकती हैं।
- AI ट्रेनिंग और सर्विसेज पर असर पड़ेगा।
एशिया-यूरोप के बीच 17-30% डेटा ट्रैफिक इन रूट्स से गुजरता है। एक साथ कई केबल्स क्षतिग्रस्त होने पर पूरे क्षेत्र में इंटरनेट ब्लैकआउट जैसी स्थिति बन सकती है।
इतिहास गवाह: केबल्स पहले भी निशाना बने
यह पहली बार नहीं है जब अंडरसी केबल्स को टारगेट किया गया। रेड सी में हूती हमलों के दौरान जहाजों के एंकर से केबल्स कट चुकी हैं। बाल्टिक सी में भी संदिग्ध घटनाएं हुई हैं। ईरान अब इन्हें जानबूझकर दबाव का साधन बना रहा है। युद्धकालीन स्थिति में ड्रोन हमले, माइन्स या अन्य तरीकों से केबल्स को नुकसान पहुंचाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
क्यों है यह तेल से भी बड़ा खतरा?
तेल तो फिर भी स्टोर किया जा सकता है, वैकल्पिक रूट ढूंढे जा सकते हैं, लेकिन इंटरनेट रीयल-टाइम है। एक छोटा सा व्यवधान भी बिलियन डॉलर का नुकसान कर सकता है।
- फाइनेंशियल मार्केट्स: हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग और ट्रांजेक्शन्स ठप।
- क्लाउड इकोनॉमी: Amazon Web Services, Microsoft Azure, Google Cloud सब प्रभावित।
- डिजिटल इकॉनॉमी: ई-कॉमर्स, रिमोट वर्क, ऑनलाइन एजुकेशन।
- जियोपॉलिटिक्स: देशों को झुकाने का नया हथियार।
दुनिया की प्रतिक्रिया और चुनौतियां
अमेरिका, यूरोप और गल्फ देश इस विकास पर चिंतित हैं। केबल कंपनियां पहले से ही रूट डाइवर्सिफिकेशन पर काम कर रही हैं, लेकिन नई केबल्स बिछाना महंगा और समय लेने वाला है। कुछ प्रोजेक्ट्स ईरान तनाव के कारण पहले ही रुक चुके हैं।
भारत जैसे देशों को अपनी डिजिटल रिजिलिएंस बढ़ानी होगी — ज्यादा सैटेलाइट लिंक्स (Starlink जैसी), टेर्रेस्ट्रियल रूट्स और डोमेस्टिक डेटा सेंटर्स पर जोर। लेकिन अल्पावधि में विकल्प सीमित हैं।
भविष्य की डिजिटल जंग
यह घटनाक्रम दिखाता है कि 21वीं सदी की जंग अब सिर्फ जमीन, समुद्र या आकाश में नहीं, बल्कि डेटा के समुद्र तल पर भी लड़ी जाएगी। ईरान ने साबित कर दिया कि भौगोलिक चोकपॉइंट्स अब एनर्जी से आगे डिजिटल पावर भी हैं।
अगर ईरान अपना “डिजिटल टोल” मॉडल लागू करने में सफल रहा तो यह नया मिसाल बनेगा। दूसरे देश भी अपने क्षेत्र में गुजरने वाली केबल्स पर इसी तरह के दावे कर सकते हैं। नतीजा? वैश्विक इंटरनेट का फ्रैगमेंटेशन और ज्यादा भू-राजनीतिक अस्थिरता।
: तैयार रहना होगा
ईरान की यह चाल दुनिया को याद दिलाती है कि हमारी डिजिटल सभ्यता कितनी नाजुक है। समुद्र तल पर बिछी पतली-सी फाइबर केबल्स आज पूरी दुनिया को जोड़े हुए हैं। इन्हें काटना या नियंत्रित करना किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को झटका दे सकता है।
भारत सहित पूरी दुनिया को अब न सिर्फ डिप्लोमेसी, बल्कि तकनीकी स्वायत्तता और रणनीतिक बैकअप प्लान्स पर भी ध्यान देना होगा। क्योंकि भविष्य की लड़ाई सिर्फ तेल की नहीं, डेटा और कनेक्टिविटी की भी होगी।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-14 May 2026