Breaking

यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Wednesday, 13 May 2026

सोने की चमक बनाम आटे की कमी: जहां पाकिस्तान रोटी के लिए तरस रहा है, वहां भारत में प्रधानमंत्री को सोना खरीद ने से रोकना पड़ रहा है!

सोने की चमक बनाम आटे की कमी: जहां पाकिस्तान रोटी के लिए तरस रहा है, वहां भारत में प्रधानमंत्री को सोना खरीद ने से रोकना पड़ रहा है!
-Friday World-13 May 2026
दोस्तों, कल्पना कीजिए एक ऐसी दुनिया जहां एक पड़ोसी देश की जनता रात-रात भर आटे की लाइन में खड़ी होकर सोच रही है कि "कल सुबह रोटी बनेगी या नहीं?" और ठीक उसी वक्त दूसरा देश इतना समृद्ध हो चुका है कि उसका प्रधानमंत्री जनता से हाथ जोड़कर कह रहा है – "भाई, एक साल के लिए सोना मत खरीदो, देश का विदेशी मुद्रा भंडार बचाओ!" 

यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि मई 2026 की सच्ची तस्वीर है। एक तरफ पाकिस्तान में गेहूं की कमी से आटा संकट गहरा रहा है, दूसरी तरफ भारत में सोने की भारी मांग को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपील करनी पड़ रही है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है? व्यंग्य की चाशनी में डुबोकर देखें तो लगता है कि भाग्य और नीतियों का खेल कितना विचित्र है।

 पाकिस्तान: आटे का इंतजार, सपनों का अंत

पाकिस्तान में इन दिनों आटा (गेहूं का आटा) नहीं मिल रहा या मिल भी रहा है तो कीमतें आसमान छू रही हैं। खैबर पख्तूनख्वा में फ्लोर मिल्स एसोसिएशन चिंता जता रहा है कि पंजाब से गेहूं की सप्लाई पर रोक है, भंडार पर्याप्त होने के बावजूद। सिंध में 100 किलो गेहूं की बोरी 11,200 रुपये तक पहुंच गई है और आटा 135-138 रुपये प्रति किलो बिक रहा है। USDA रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस साल गेहूं उत्पादन 20-22 लाख टन कम रहने वाला है। सूखा, कम बारिश, अफगानिस्तान से तनाव और इंडस वाटर ट्रीटी जैसे मुद्दों ने मिलकर फसल को प्रभावित किया।

जनता क्या सोच रही होगी? "हमारे पास परमाणु बम है, लेकिन रोटी नहीं!" सड़कों पर अफरा-तफरी, होर्डिंग, माफिया और सरकारी नीतियों की भूल-चूक का मेल। 11 मिलियन से ज्यादा लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा (acute food insecurity) का शिकार, जिसमें लाखों इमरजेंसी स्तर पर। एक कृषि प्रधान देश जहां फसलें उगती हैं, वहां लोग भूखे सो रहे हैं। यह विडंबना है या शासन की नाकामी का प्रमाण? 

पाकिस्तानी मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म्स पर पोस्ट्स घूम रहे हैं – "आटा नहीं, तो क्या अब हवा पीकर गुजारा करें?" जबकि उनके कुछ नेता अभी भी "भारत से बदला लेंगे" की भाषा बोल रहे हैं। व्यंग्य यह कि जब खुद की थाली खाली हो रही हो, तो पड़ोसी की थाली में क्या है, यह देखने का समय कहां? 

 भारत: सोने की ललक, प्रधानमंत्री की अपील

इधर भारत में स्थिति उल्टी है। FY26 में सोने के आयात ने रिकॉर्ड 71.98 बिलियन डॉलर का आंकड़ा छू लिया – पिछले साल से 24% ज्यादा। शादियां, त्योहार, निवेश – सबमें सोना ही सोना। ग्लोबल कीमतें बढ़ीं, फिर भी मांग नहीं रुकी। ईरान-इजराइल-USA तनाव से तेल की कीमतें आसमान पर, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट अपील की: "एक साल के लिए सोना खरीदना टाल दो, विदेश यात्राएं कम करो, घर से काम करो, ईंधन बचाओ।" सरकार ने सोने-चांदी पर इंपोर्ट ड्यूटी भी 6% से बढ़ाकर 15% कर दी।

क्या यह गरीबी है? बिल्कुल नहीं। यह समृद्धि की समस्या है। जब लोग इतने सक्षम हो जाते हैं कि बुनियादी जरूरतों के बाद लग्जरी और निवेश के लिए सोना खरीद रहे हैं, तो सरकार को संतुलन बनाना पड़ता है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना उपभोक्ता है। शादियों में सोने के जेवर बिना शादी अधूरी, त्योहारों में सोना खरीदना परंपरा। लेकिन जब वैश्विक संकट हो (तेल 126 डॉलर प्रति बैरल के करीब), तो राष्ट्रीय हित में थोड़ी कुर्बानी जरूरी।

व्यंग्य यहां यह है कि पाकिस्तान में लोग सोच रहे हैं "रोटी कैसे मिले", भारत में सरकार कह रही है "सोना मत खरीदो, वरना डॉलर बच नहीं पाएगा"। एक देश बुनियादी खाद्य सुरक्षा के लिए संघर्ष, दूसरा वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच अपनी लग्जरी खपत को मॉडरेट करने की कोशिश।

तुलना का व्यंग्य: दो पड़ोसी, दो कहानियां

देखिए न, दोनों देश एक-दूसरे के पड़ोसी। एक में आटा संकट, दूसरे में सोना संकट। पाकिस्तान में गेहूं की कमी से महंगाई, भुखमरी की आशंका। भारत में सोने की भरमार से ट्रेड डेफिसिट और करेंट अकाउंट पर दबाव। 

पाकिस्तान के लिए यह सिखाता है कि सैन्य खर्च, आतंकवाद समर्थन और खराब शासन से अर्थव्यवस्था कैसे चरमरा जाती है। कृषि देश होने के बावजूद नीतिगत अस्थिरता, जल संकट और राजनीतिक अराजकता ने उन्हें इस हाल में पहुंचाया। वहीं भारत ने सुधारों, डिजिटलाइजेशन, इंफ्रास्ट्रक्चर और निर्यात बढ़ाने से स्थिति संभाली। COVID के बाद रिकवरी, आत्मनिर्भर भारत अभियान – ये सब दिखाते हैं कि सही दिशा में प्रयास से क्या हो सकता है।

लेकिन भारत को भी सबक – लग्जरी खपत को संतुलित रखना होगा। सोना उत्पादक संपत्ति नहीं, बल्कि नॉन-प्रोडक्टिव एसेट है। अगर ये डॉलर विदेश चले जाते हैं तो तेल आयात पर और दबाव। मोदी की अपील सिर्फ अपील नहीं, राष्ट्रीय कर्तव्य की याद है। 

व्यंग्यात्मक रूप से कहें तो पाकिस्तान के कुछ "विश्लेषक" भारत की इस अपील को "कमजोरी" बताएंगे। "देखो, भारत को सोना रोकना पड़ रहा है!" लेकिन सच्चाई यह कि जब आपके पास खरीदने लायक पैसा हो, तभी रोकने की नौबत आती है। जिनके पास आटा ही नहीं, वे सोना क्या रोकेंगे?

 इतिहास और भविष्य: सबक क्या?

1947 में दोनों देश आजाद हुए। एक ने लोकतंत्र, सुधार और विविधता को अपनाया, दूसरे ने सैन्य शासन, कट्टरता और षड्यंत्रों का रास्ता। नतीजा सामने है। भारत आज विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, पाकिस्तान IMF के चंगुल में बार-बार। 

भारत में मध्यम वर्ग बढ़ा है, उपभोग क्षमता बढ़ी है। यही वजह है कि सोने की मांग रिकॉर्ड स्तर पर। लेकिन वैश्विक संकट (ईरान युद्ध, तेल कीमतें) हमें याद दिलाते हैं कि आत्मनिर्भरता कितनी जरूरी है। सोने के बदले डिजिटल गोल्ड, ETF या उत्पादक निवेश की ओर मुड़ना चाहिए।

पाकिस्तान के लिए आटा संकट सिर्फ खाद्य समस्या नहीं, शासन विफलता का प्रतीक है। अगर वे सुधार करें – कृषि में निवेश, पानी प्रबंधन, राजनीतिक स्थिरता – तो बदलाव आ सकता है। लेकिन फिलहाल तो वे "आटा" की तलाश में हैं, जबकि भारत "सोना" को कंट्रोल करने में जुटा है।

 निष्कर्ष: हंसी भी आती है, सोच भी पैदा होती है

यह स्थिति हंसाती भी है और सोचने पर मजबूर भी करती है। पाकिस्तान के नागरिक अगर भारत की तरफ देखें तो शायद ईर्ष्या हो – "वहां लोग सोना खरीद रहे थे, यहां हम आटा!" भारतवासी गर्व करें – हम इतने आगे निकल आए कि प्रधानमंत्री हमें लग्जरी रोकने को कह रहे हैं। 

लेकिन दोनों को संतुलन की जरूरत। पाकिस्तान को बुनियादी जरूरतें पूरी करनी होंगी, भारत को लग्जरी को राष्ट्रीय हित के अनुरूप ढालना होगा। 

अंत में एक व्यंग्य: अगर पाकिस्तान के नेता भारत से सीख लें – सुधार, शांति और विकास – तो शायद एक दिन वे भी सोने की चिंता करने लगें, न कि आटे की। और भारत वाले, सोना थोड़ा कम, विकास ज्यादा। 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-13 May 2026