कोलकाता, 23 मई 2026। अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो शनिवार की सुबह कोलकाता पहुंचे। यह उनकी पहली आधिकारिक भारत यात्रा है। इस यात्रा को दोनों देशों के बीच पिछले एक साल से चली आ रही कड़वाहट को दूर करने और संबंधों को चॉकलेट मेलोडी जितना मधुर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, “विदेश मंत्री मार्को रुबियो कोलकाता पहुंच गए हैं। यह उनकी पहली भारत यात्रा है। आज हम नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करेंगे। आने वाले कुछ दिनों में व्यापार, प्रौद्योगिकी, रक्षा, क्वाड और कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होगी।”
यह यात्रा मात्र औपचारिक नहीं है। यह भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देने का प्रयास है, खासकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती चुनौतियों के बीच।
पिछले संबंधों में आई खटास: एक नजर
पिछले कुछ वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच संबंधों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। भले ही दोनों देश लोकतंत्र, बाजार अर्थव्यवस्था और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने जैसे कई साझा मूल्यों पर खड़े हैं, फिर भी कुछ घटनाओं ने कड़वाहट पैदा की।
जो बाइडेन के कार्यकाल में शुरू हुई तनाव की लहर ट्रंप प्रशासन में भी पूरी तरह थमी नहीं। प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका के निमंत्रण पर गए, फरवरी 2025 में यात्रा भी की, जहां संबंध सुधरने की उम्मीद जगी। लेकिन उसके बाद कई घटनाओं ने स्थिति को जटिल बना दिया।
सबसे विवादास्पद रहा **ऑपरेशन सिंदूर** के दौरान ट्रंप द्वारा युद्ध रोकने का श्रेय लेना। भारत में इसे आंतरिक राजनीति के लिए नुकसानदायक माना गया। इसके अलावा, पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर को दिए गए अनावश्यक महत्व और भारत पर लगाए गए 50% टैरिफ ने संबंधों में और ठंडक पैदा कर दी।
व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्वाड की भविष्यवाणी जैसे मुद्दों पर असहमति बढ़ती गई। कई रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका ने भारत को दबाव में रखने की नीति अपनाई, जो लंबे समय में दोनों देशों के हितों के खिलाफ साबित हो सकती है।
रुबियो की यात्रा क्यों महत्वपूर्ण?
मार्को रुबियो ट्रंप प्रशासन में विदेश नीति के प्रमुख चेहरे हैं। उनकी भारत यात्रा को “रीसेट” की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। चार दिनों की इस यात्रा में कोलकाता, आगरा, जयपुर और नई दिल्ली शामिल हैं।
मुख्य एजेंडा:
- व्यापार और टैरिफ:* 50% टैरिफ की समस्या का समाधान।
- ऊर्जा सुरक्षा: रूस से तेल आयात कम करने के लिए अमेरिकी ऊर्जा निर्यात बढ़ाना।
- रक्षा और प्रौद्योगिकी: संयुक्त उत्पादन, हथियारों का सह-विकास और तकनीकी सहयोग।
- क्वाड: क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक में समूह के भविष्य पर चर्चा। हिंद-प्रशांत में स्थिरता बनाए रखना।
- आतंकवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा: पाकिस्तान से जुड़े मुद्दों पर भारत की चिंताओं को समझना।
कोलकाता पहुंचकर रुबियो मिशनरीज ऑफ चैरिटी (मदर टेरेसा के संगठन) का भी दौरा करेंगे, जो साझा मूल्यों और मानवीय सेवा की भावना को रेखांकित करेगा।
रणनीतिक महत्व: हिंद-प्रशांत और क्वाड
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों के बीच क्वाड एक महत्वपूर्ण मंच है। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का यह समूह मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत की रक्षा करने का वादा करता है। पिछले कुछ समय से क्वाड की गति पर सवाल उठ रहे थे। रुबियो की यात्रा और क्वाड बैठक इन अटकलों को समाप्त कर सकती है।
भारत की “एक्ट ईस्ट” नीति और अमेरिका की इंडो-पैसिफिक स्ट्रेटजी में काफी समानता है। दोनों देश आपसी विश्वास बढ़ाकर क्षेत्रीय सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला मजबूती और उभरती प्रौद्योगिकियों (AI, सेमीकंडक्टर, क्लीन एनर्जी) पर सहयोग बढ़ा सकते हैं।
आर्थिक आयाम
भारत अमेरिका की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। दोनों देशों के बीच व्यापार का आंकड़ा पहले ही रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है। लेकिन टैरिफ, डेटा लोकलाइजेशन, कृषि सब्सिडी और बौद्धिक संपदा जैसे मुद्दे बाधा बन रहे हैं।
रुबियो की यात्रा में इन मुद्दों पर ठोस प्रगति होने की उम्मीद है। यदि टैरिफ कम होते हैं तो भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत मिलेगी। वहीं, अमेरिका भारत को रणनीतिक निवेश के रूप में देख रहा है, खासकर चीन+1 रणनीति के तहत।
चुनौतियां और उम्मीदें
संबंध सुधारना आसान नहीं होगा। भारत “स्वायत्त विदेश नीति” पर जोर देता है। वह रूस से सस्ता तेल खरीदना जारी रखना चाहता है। वहीं, अमेरिका पाकिस्तान के साथ कुछ हद तक जुड़ाव बनाए रखना चाहता है।
फिर भी, दोनों देशों के पास एक-दूसरे की जरूरत है। भारत को उन्नत प्रौद्योगिकी, पूंजी और बाजार चाहिए। अमेरिका को विश्वसनीय साझेदार, विशाल बाजार और चीन को संतुलित करने वाली शक्ति चाहिए।
मधुर संबंधों की ओर
मार्को रुबियो की यह यात्रा प्रतीकात्मक और व्यावहारिक दोनों रूप से महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री मोदी की हालिया पांच देशों की यात्रा के बाद यह कदम दोनों पक्षों की इच्छा को दर्शाता है कि संबंधों को सामान्य और मजबूत बनाया जाए।
यदि इस यात्रा में ठोस समझौते होते हैं तो भारत-अमेरिका संबंध न सिर्फ सुधरेंगे, बल्कि 21वीं सदी की सबसे मजबूत रणनीतिक साझेदारियों में से एक बन सकते हैं। चॉकलेट मेलोडी की मीठास लौटेगी तो दोनों देशों के लोग, उद्योग और सुरक्षा हितों को फायदा होगा।
भारत जैसे प्राचीन सभ्यता वाले देश और अमेरिका जैसे नवोदित शक्तिशाली राष्ट्र का गठबंधन न सिर्फ एशिया बल्कि पूरे विश्व की स्थिरता के लिए बेहद जरूरी है।
रुबियो की यात्रा सफल हो और दोनों देशों के बीच विश्वास का नया अध्याय शुरू हो – यही कामना हर भारतीय और समझदार वैश्विक पर्यवेक्षक की है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-23 May 2026