-Friday World-17 May 2026
भारत में लोकतंत्र की सबसे बड़ी मिसाल पेश करते हुए कुछ हजार राजनीतिक उम्मीदवारों के लिए चुनाव भव्य रूप से संपन्न हो जाते हैं। सुरक्षा के कड़े इंतजाम, करोड़ों मतदाताओं की भागीदारी, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें और निगरानी – सब कुछ बिना किसी बड़ी गड़बड़ी के चल जाता है। लेकिन वही भारत, जहां लाखों छात्र चिकित्सा की पढ़ाई का सपना देखते हैं, उनकी NEET परीक्षा बार-बार विवादों, पेपर लीक और अनियमितताओं की भेंट चढ़ जाती है। यही है हमारी व्यवस्था की कड़वी सच्चाई। क्या सरकार इस युवा संकट पर गंभीरता से कुछ करेगी, या फिर बयानबाजी और आश्वासनों तक ही सीमित रह जाएगा मामला?
NEET 2026: एक और झटका, लाखों सपनों का टूटना
मई 2026 में NEET-UG परीक्षा 3 मई को देशभर में आयोजित हुई। लगभग 22.8 लाख छात्र-छात्राएं इस परीक्षा में शामिल हुए। लेकिन कुछ दिनों बाद ही पेपर लीक की खबरें सामने आईं। राजस्थान पुलिस की विशेष अभियान समूह (SOG) की जांच में पता चला कि एक "गेस पेपर" व्हाट्सएप और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर घूम रहा था, जिसमें सैकड़ों सवाल असली पेपर से मैच कर रहे थे। नतीजा? NTA ने 12 मई को परीक्षा रद्द कर दी और CBI जांच का आदेश दिया। री-एग्जाम 21 जून को प्रस्तावित है, और अगले साल से CBT (कंप्यूटर आधारित) मोड में शिफ्ट करने की घोषणा हुई है।
यह पहली बार नहीं है। 2024 में भी पेपर लीक, ग्रेस मार्क्स विवाद और टॉपर्स की संख्या को लेकर हंगामा हुआ था। छात्रों ने आत्महत्या तक के कदम उठाए, परिवार टूट गए। NEET की सफलता दर औसतन 4-5% के आसपास रहती है। यानी 20-23 लाख उम्मीदवारों में से महज 1-1.2 लाख को सरकारी MBBS सीट मिल पाती है। बाकी लाखों छात्र निराशा, कोचिंग संस्थानों के चंगुल और महंगे प्राइवेट कॉलेजों की मार झेलते हैं।
चुनाव vs NEET: स्केल और प्रबंधन की तुलना
2024 लोकसभा चुनावों में कुल 8,360 उम्मीदवार मैदान में थे – 543 सीटों के लिए। औसतन 15 उम्मीदवार प्रति सीट। पूरे देश में सात चरणों में मतदान हुआ, करोड़ों मतदाताओं ने भाग लिया, और परिणाम सुचारू रूप से घोषित हुए। EVM की सुरक्षा, VVPAT, CCTV, केंद्रीय बलों की तैनाती – सब कुछ इतना मजबूत कि बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की खबरें कम ही आईं।
दूसरी ओर NEET में 23 लाख छात्र एक ही दिन, एक ही पेपर में परीक्षा देते हैं। 5,400+ केंद्रों पर यह आयोजन होता है। प्रिंटिंग, ट्रांसपोर्ट, सुरक्षा – सब कुछ संवेदनशील है। फिर भी लीक हो जाता है। सवाल उठता है: क्या चुनाव आयोग जितनी गंभीरता NTA या शिक्षा मंत्रालय दिखा पाता है? चुनावों में राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखती है क्योंकि सत्ता उससे जुड़ी है। छात्रों के भविष्य से जुड़े मुद्दे पर उतनी तत्परता क्यों नहीं?
NEET की तैयारी करने वाले छात्र सालों तक 12-14 घंटे रोज पढ़ते हैं। कोचिंग फीस लाखों में, किताबें, टेस्ट सीरीज – परिवार की पूरी पूंजी लग जाती है। असफलता पर डिप्रेशन, आत्महत्या की खबरें आम हो गई हैं। सिकार, कोटा, पटना जैसे कोचिंग हब छात्रों की कब्रगाह बनते जा रहे हैं। एक ओर नेता पांच साल के लिए सांसद बन जाते हैं, दूसरी ओर छात्र एक परीक्षा के लिए साल-दो साल बर्बाद कर देते हैं।
समस्या की जड़ें: कोचिंग माफिया, NTA की कमियां और सिस्टमिक फेलियर
NTA 2018 में बनाया गया था – परीक्षाओं को पारदर्शी बनाने के लिए। लेकिन बार-बार विवादों ने इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए। प्रिंटिंग प्रेस (नासिक जैसे इलाकों) से लीक, गैंग्स द्वारा पेपर बेचना (5-50 लाख रुपये तक), इम्पर्सनेशन, और सोशल मीडिया पर गेस पेपर – यह सब चल रहा है
मुख्य समस्याएं:
- बड़ी संख्या और पेन-पेपर मोड: 23 लाख पेपर प्रिंट करना, वितरित करना – सुरक्षा का बड़ा चैलेंज।
- कोचिंग इंडस्ट्री का कार्टेल: कुछ संस्थान "सक्सेस रेट" का दावा करते हैं, लेकिन जांच में अनियमितताएं सामने आती हैं।
- NTA का संरचनात्मक कमजोरी: स्टाफ की कमी, तकनीकी विशेषज्ञों की अनुपलब्धता, और जवाबदेही का अभाव।
- राजनीतिक हस्तक्षेप और देरी: 2024 विवाद के बाद भी पूर्ण सुधार नहीं हुए।
सरकार ने Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Act, 2024 लाया, जो पेपर लीक को अपराध बनाता है। Radhakrishna समिति की सिफारिशें हैं, लेकिन क्रियान्वयन धीमा है। शिक्षा मंत्री ने CBT मोड और सुधारों की घोषणा की है, लेकिन छात्र पूछ रहे हैं – कब तक?
युवा भारत का गुस्सा: क्यों बिगड़ रहा है भरोसा?
भारत की जनसांख्यिकीय लाभांश युवा हैं। 65% आबादी 35 साल से कम उम्र की है। अगर इनका भविष्य परीक्षा घोटालों से प्रभावित होता रहेगा, तो देश का विकास प्रभावित होगा। NEET सिर्फ मेडिकल एंट्रेंस नहीं, बल्कि सपनों का द्वार है। असफलता या अनियमितता से पूरा परिवार प्रभावित होता है – आर्थिक, मानसिक और सामाजिक रूप से।
विपक्ष इसे राजनीतिक मुद्दा बना रहा है। राहुल गांधी समेत कई नेताओं ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग की। छात्र संगठन (NSUI, ABVP आदि) प्रदर्शन कर रहे हैं। डॉक्टर्स एसोसिएशन NTA और NMC के विघटन की मांग कर रहे हैं।
लेकिन दोषारोपण से आगे बढ़कर समाधान की जरूरत है।
समाधान के रास्ते: क्या कर सकती है सरकार?
1. तकनीकी आधुनिकीकरण: 2027 से पूर्ण CBT मोड। प्रश्न बैंक रैंडमाइजेशन, AI प्रोक्रेटरिंग, बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन।
2. NTA का पुनर्गठन: स्वायत्तता बढ़ाएं, लेकिन मजबूत निगरानी। विशेषज्ञों की भर्ती, साइबर सुरक्षा यूनिट।
3. सीटें बढ़ाएं: MBBS सीटों को 2-3 लाख तक ले जाएं। नए AIIMS, मेडिकल कॉलेज खोलें।
4. कोचिंग रेगुलेशन: फीस कैप, सफलता दावों की जांच, और वैकल्पिक करियर गाइडेंस।
5. मानसिक स्वास्थ्य सपोर्ट: स्कूल-कॉलेज स्तर पर काउंसलिंग, हेल्पलाइन।
6. मल्टी-एंट्री सिस्टम: NEET के अलावा अन्य रास्ते – स्किल बेस्ड कोर्स, विदेशी विश्वविद्यालयों से टाई-अप।
7. पारदर्शिता: हर चरण की ऑडिट, RTI के तहत ज्यादा जानकारी।
चुनाव आयोग की तरह NTA को भी पूर्ण स्वायत्त और जवाबदेह बनाएं। पेपर लीक में शामिल माफिया पर सख्त कार्रवाई – गिरफ्तारी, संपत्ति जब्ती।
: इच्छाशक्ति का परीक्षण
भारत चुनाव कराने में सक्षम है, तो NEET जैसी परीक्षा को निष्पक्ष बनाने में क्यों असमर्थ? यह सिर्फ शिक्षा मंत्रालय का नहीं, पूरे शासन का मुद्दा है। युवाओं का भरोसा टूटने से लोकतंत्र कमजोर होता है। सरकार अगर सच्चे सुधार लाती है – CBT, बेहतर सुरक्षा, ज्यादा सीटें, और NTA ओवरहॉल – तो लाखों छात्रों की उम्मीदें फिर से जग सकती हैं।
अन्यथा, हर साल यही कहानी दोहराई जाएगी: कुछ हजार उम्मीदवारों के लिए चुनाव सफल, लेकिन लाखों छात्रों की NEET असफल। समय है सोचने का – क्या हम अपने युवाओं को सिर्फ वोटर बनाना चाहते हैं, या सक्षम डॉक्टर, इंजीनियर और नागरिक?
यह संकट सिर्फ NEET का नहीं, बल्कि भारतीय परीक्षा व्यवस्था और युवा नीति का है। सरकार की गंभीरता अब परीक्षा में है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-17 May 2026