भारत में आज सबसे बड़ी समस्या किसी एक पार्टी की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की है। हर घर में बेरोजगारी है—कांग्रेसी हो या भाजपाई, मध्यम वर्ग का लड़का-लड़की दोनों जगह बेरोजगार बैठा है। कोई बीसीसीआई का अध्यक्ष नहीं बना, कोई मल्टीनेशनल का CEO नहीं बना। सपने बिक रहे हैं, पेपर लीक हो रहे हैं और युवा भविष्य के नाम पर मृगजाल में फंस रहे हैं।
पिछले दस सालों में मोदी सरकार ने कई आर्थिक मोर्चों पर संघर्ष किया है। अर्थव्यवस्था की रिकवरी, नौकरियों का सृजन, निवेश और मैन्युफैक्चरिंग—कई क्षेत्रों में अपेक्षित गति नहीं दिखी। लेकिन सच यह भी है कि समस्या केवल एक सरकार की नहीं है। यह दशकों पुरानी संरचनात्मक बीमारी है जिसे नेहरू काल से लेकर आज तक कोई भी पूरी तरह ठीक नहीं कर सका।
पेपर लीक और शिक्षा का दिवाला
हर साल NEET, JEE, SSC, रेलवे और राज्य स्तर की परीक्षाओं में पेपर लीक के मामले सामने आते हैं। परीक्षा रद्द होती है, छात्र साल बर्बाद करते हैं, फिर नई तारीख आती है। रिजल्ट कब आएगा और नौकरियां कहां से आएंगी? जब परीक्षा प्रणाली ही भरोसेमंद नहीं रही तो रोजगार सृजन का सवाल ही कहां उठता है?
12वीं पास लाखों छात्र हर साल मैदान में उतरते हैं। माता-पिता कहते हैं — “बेटा अब अपनी किस्मत आजमा”। प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज में बीटेक के नाम पर 8-15 लाख रुपये खर्च। सरकारी सीटें इतनी कम कि प्रतियोगिता 100 गुना से ज्यादा। स्किल डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट ना के बराबर। नतीजा? डिग्रीधारी बेरोजगारों की फौज।
कोचिंग इंडस्ट्री इस पूरे खेल की सबसे बड़ी लाभार्थी है। लाखों रुपये फीस लेकर सपने बेचे जाते हैं — “तुम डॉक्टर-इंजीनियर बनोगे”। लेकिन अंदर खाते सब जानते हैं कि इतनी बड़ी आबादी को इतनी कम नौकरियों में समाना असंभव है। पढ़ाने में कमाई है, पढ़ने में नहीं। यही वजह है कि कोचिंग सेंटर हर गली में खुल रहे हैं।
सरकारी नौकरियां, आरक्षण और हकीकत
सरकारी भर्तियां पहले भी बेहद कम थीं और आज भी हैं। आरक्षण बढ़ाते गए, वीपी सिंह से लेकर आज तक, लेकिन भर्तियां ही नहीं हो रही तो आरक्षण किस काम का? भैंस पानी में चली गई।
कॉरपोरेट सेक्टर इनोवेशन और R&D पर कम खर्च करता है। टैक्स छूट और सरकारी सुविधाएं मांगता है, लेकिन बड़े पैमाने पर रोजगार नहीं देता। स्टार्टअप्स अच्छे हैं, लेकिन वे भी पूरे देश की युवा आबादी को नौकरी नहीं दे सकते।
बढ़ती आबादी और सीमित संसाधन
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है, लेकिन वही सबसे बड़ा खतरा भी बन सकती है। आबादी नियंत्रण पर कोई ठोस नीति काम नहीं कर रही। युवा शक्ति अगर बेरोजगार रही तो वह बारूद के ढेर पर बैठे लोगों की तरह है।
हर परिवार में एक-दो बेरोजगार युवा हैं। पेट की आग सबसे बड़ी आग है। बच्चा जब पैदा होता है तो न राम पुकारता है, न अल्लाह। वह दूध मांगता है। भूख ही उसकी पहली भगवान है। जब लाखों युवा पेट भरने के लिए संघर्ष करेंगे तो राजनीतिक नारों से काम नहीं चलेगा।
चीन से मुकाबला करने की बात करते हैं। लेकिन स्किल्ड वर्कफोर्स, मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम और तकनीकी शिक्षा के बिना सिर्फ दीवाली की चाइनीज लाइट्स का बहिष्कार करके चीन को टाइट नहीं किया जा सकता। हमें उनके जैसा स्किल एजुकेशन सिस्टम चाहिए, न कि सिर्फ नारे।
ब्रेन ड्रेन और टूटते सपने
हर साल लाखों युवा विदेश भाग रहे हैं — कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी। जो पढ़-लिखकर अच्छा कर सकता था, वह देश छोड़ रहा है। जो रह जाते हैं, वे या तो कोचिंग पढ़ाते हैं या फ्रस्ट्रेशन में छोटे-मोटे काम करते हैं।
मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा चीख रहा है। न तो ऊंची सरकारी नौकरी मिल रही, न कॉरपोरेट में अच्छा पैकेज। महंगाई, EMI, शिक्षा खर्च और स्वास्थ्य व्यय — सब कुछ बढ़ रहा है, आय नहीं।
पुरानी पार्टियां और नई हकीकत
कांग्रेस जैसी पुरानी राष्ट्रीय पार्टियां आज लगभग निकम्मी साबित हो चुकी हैं। परिवारवाद, भ्रष्टाचार और पुरानी सोच के कारण वे युवाओं का विश्वास जीत नहीं पा रही। दूसरी तरफ सत्ताधारी दल भी बेरोजगारी जैसे मुद्दे पर ठोस समाधान देने में असफल दिख रहे हैं।
सभी दल के समर्थक आज बारूद के ढेर पर बैठे हैं। जब घर-घर में आग लगेगी तो कोई बच नहीं पाएगा। राजनीतिक पार्टी बाजी हकीकत नहीं बदल सकती। बेरोजगारी राष्ट्रीय समस्या है, इसे पार्टी समस्या बनाकर छिपाया नहीं जा सकता।
समाधान की राह — कठिन लेकिन जरूरी
1. शिक्षा सुधार: NTA जैसी एजेंसियों को पूरी तरह पारदर्शी और जवाबदेह बनाएं। डिजिटल पेपर, AI प्रोctorिंग, CCTV, मल्टी-लेयर सुरक्षा अनिवार्य।
2. स्किल यूनिवर्सिटी: हर जिले में बड़े स्किल डेवलपमेंट सेंटर खोलें जो जर्मनी या सिंगापुर की तर्ज पर काम करें।
3. सरकारी कॉलेज विस्तार: IIT, NIT, AIIMS जैसी संस्थाओं की संख्या बढ़ाएं। प्राइवेट कॉलेजों पर फीस रेगुलेशन।
4. मैन्युफैक्चरिंग बूम: चीन+1 नीति को वास्तविकता में बदलें। छोटे उद्योगों को बढ़ावा, लेबर लॉ में सुधार लेकिन सुरक्षा भी।
5. आबादी प्रबंधन: शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण के जरिए प्रजनन दर को स्वाभाविक रूप से कम करें।
6. कोचिंग इंडस्ट्री पर लगाम: फीस कैप, रिजल्ट आधारित रेगुलेशन और छात्रों को सच्ची काउंसलिंग।
अंतिम सच
बेरोजगारी कोई चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि अस्तित्व का संकट है। पेट की आग राजनीति से ऊपर है। जब युवा को रोजगार नहीं मिलेगा तो न नारे काम आएंगे, न वादे। सपना कितना भी सुहावना हो, मृगजाल टूटना तय है।
भारत को अब सपनों की नहीं, हकीकत की राजनीति चाहिए। रोजगार सृजन, शिक्षा सुधार और स्किलिंग को राष्ट्रीय मिशन बनाना होगा। वरना यह आग धीरे-धीरे फैलेगी और एक दिन सब कुछ जला देगी।
पेट ही भगवान है। और जब पेट भरा नहीं होगा तो कोई भी भगवान काम नहीं आएगा — न राम, न रहीम।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 7 Jun 2026