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Monday, 15 June 2026

"ईरान समझौते पर इज़राइल की गरज: स्मोट्रिच का युद्धघोष – “हम खुद गिराएंगे तानाशाही, परमाणु सपना कभी पूरा नहीं होगा!”

"ईरान समझौते पर इज़राइल की गरज: स्मोट्रिच का युद्धघोष – “हम खुद गिराएंगे तानाशाही, परमाणु सपना कभी पूरा नहीं होगा!”
- Friday World 15 Jun 2026
मध्य पूर्व में नया तूफान, इज़राइल की अटूट दृढ़ता और वैश्विक शक्ति संतुलन का संकट**

इज़राइल के विवादास्पद वित्त मंत्री बेजलेल स्मोट्रिच ने अमेरिका-ईरान के बीच हुए हालिया समझौते को “इज़राइल और पूरे स्वतंत्र विश्व के लिए हानिकारक” करार देते हुए साफ़ शब्दों में चेतावनी दी है। उन्होंने कहा, “हमें खुद ही और रचनात्मक तरीकों से शासन को उखाड़ फेंकने के अभियान को जारी रखना होगा, और यह सुनिश्चित करना होगा कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार हासिल न कर सके।” साथ ही उन्होंने लेबनान में हिज़्बुल्लाह के खिलाफ इज़राइली रक्षा बलों (IDF) को पूरी छूट देने की मांग की।

यह बयान मात्र एक मंत्री का व्यक्तिगत विचार नहीं है, बल्कि इज़राइल की सुरक्षा नीति की गहराई और क्षेत्रीय जटिलताओं को उजागर करता है। 15 जून 2026 को दिए गए इन बयानों ने वैश्विक मीडिया में तहलका मचा दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता से हुआ यह समझौता, जो स्ट्रेट ऑफ़ हरमुज खोलने और अस्थायी युद्धविराम का प्रावधान करता है, इज़राइल के लिए “खतरे की घंटी” साबित हो रहा है।

 समझौते की पृष्ठभूमि: शांति या रणनीतिक चाल?

हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच एक प्रारंभिक समझौता हुआ है, जिसमें युद्ध समाप्त करने, स्ट्रेट ऑफ़ हरमुज से खानों को हटाने और 60 दिनों के अंदर परमाणु वार्ता शुरू करने का उल्लेख है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसकी सराहना की, जबकि इज़राइल ने इसे सीधे तौर पर खारिज कर दिया। स्मोट्रिच का कहना है कि संयुक्त अभियान ने ईरान को काफी कमजोर किया है, लेकिन इन उपलब्धियों को बर्बाद नहीं होने देना चाहिए।

विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता ईरान की अर्थव्यवस्था को राहत दे सकता है, तेल निर्यात बढ़ा सकता है और क्षेत्र में अस्थायी स्थिरता ला सकता है। लेकिन इज़राइल के लिए यह “मृत्यु का फंदा” है। ईरान लंबे समय से परमाणु कार्यक्रम चला रहा है, जिसे इज़राइल अपना अस्तित्व का संकट मानता है। स्मोट्रिच की दलील है कि कोई भी समझौता ईरान की क्रांतिकारी गार्ड और प्रॉक्सी मिलिशिया (हिज़्बुल्लाह, हमास आदि) की क्षमता को कम नहीं कर सकता।

 स्मोट्रिच का राजनीतिक चरित्र: दक्षिणपंथी आग

बेजलेल स्मोट्रिच इज़राइल की दक्षिणपंथी राजनीति के चेहरे हैं। वेस्ट बैंक में बस्तियों के विस्तार, गाजा में यहूदी बस्तियों की बहाली और लेबनान की सीमा को फिर से परिभाषित करने जैसे मुद्दों पर उनकी मुखरता प्रसिद्ध है। वे अक्सर “पूर्ण इज़राइली नियंत्रण” और “शत्रु को पूरी तरह कुचलने” की बात करते हैं।

उनके हालिया बयान में लेबनान पर विशेष जोर है: “लेबनान में हमारी परीक्षा होगी। यह हमारा युद्ध है, हमारे सैनिक हैं और उत्तरी निवासियों की सुरक्षा दांव पर है। मैं IDF को हिज़्बुल्लाह को पीछे धकेलने की पूरी छूट दिलाने के लिए प्रयासरत रहूंगा।”

यह बयान इज़राइल की आंतरिक राजनीति को भी दर्शाता है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू की सरकार में स्मोट्रिच जैसे कट्टरपंथी मंत्री सुरक्षा नीति पर दबाव बनाते हैं। ट्रंप प्रशासन के साथ संबंधों के बावजूद, इज़राइल स्वतंत्र कार्रवाई की छूट चाहता है।

 ऐतिहासिक संदर्भ: ईरान-इज़राइल दुश्मनी की जड़ें

ईरान और इज़राइल के बीच तनाव 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद शुरू हुआ। पहले सहयोगी देश अब घोर विरोधी बन चुके हैं। ईरान इज़राइल को “ज़ायोनिस्ट शैतान” कहता है, जबकि इज़राइल ईरान को क्षेत्रीय अस्थिरता का मुख्य स्रोत मानता है।

- परमाणु मुद्दा: ईरान का परमाणु कार्यक्रम दशकों पुराना है। JCPOA (2015) जैसे समझौते विफल रहे। इज़राइल ने हमेशा कहा कि कोई भी समझौता ईरान को परमाणु हथियार बनाने से नहीं रोक सकता।

- प्रॉक्सी युद्ध: हिज़्बुल्लाह, हमास, हूती विद्रोही – ईरान की समर्थित ये ताकतें इज़राइल की सीमाओं पर हमले करती रही हैं।

- हालिया घटनाक्रम: 2024-2026 के बीच प्रत्यक्ष हमले, साइबर ऑपरेशन और छाया युद्ध चले। IDF की कार्रवाई ने ईरान की क्षमता को क्षति पहुंचाई, जिसका जिक्र स्मोट्रिच ने किया।

वैश्विक प्रभाव: तेल, सुरक्षा और अर्थव्यवस्था

स्ट्रेट ऑफ़ हरमुज दुनिया का 20% तेल ले जाने वाला रास्ता है। समझौते से तेल की कीमतें स्थिर हो सकती हैं, लेकिन इज़राइल की चिंता है कि ईरान को मिली राहत उसकी सैन्य क्षमता बढ़ाएगी।

भारत के लिए भी यह मायने रखता है। ईरान से तेल आयात, चाबहार बंदरगाह और अफगानिस्तान-मध्य एशिया पहुंच भारत की रणनीति का हिस्सा है। इज़राइल के साथ भारत के मजबूत संबंध (रक्षा, इंटेलिजेंस, टेक्नोलॉजी) इस क्षेत्रीय तनाव से प्रभावित हो सकते हैं।

 इज़राइल की रणनीति: स्वतंत्र कार्रवाई और रचनात्मक अभियान

स्मोट्रिच “रचनात्मक तरीकों” की बात कर रहे हैं – इसमें साइबर हमले, गुप्त अभियान, आर्थिक दबाव और संभवतः लक्षित हमले शामिल हो सकते हैं। इज़राइल का इतिहास दिखाता है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए अकेले खड़ा हो सकता है। ऑपरेशन ऑपेरा (1981, इराकी रिएक्टर), स्टक्सनेट वायरस (ईरानी सेंट्रीफ्यूज) जैसे उदाहरण मौजूद हैं।

हिज़्बुल्लाह के खिलाफ अभियान जारी रखने की मांग इज़राइल की उत्तरी सीमा की सुरक्षा से जुड़ी है। हजारों रॉकेट हमलों का सामना करने के बाद IDF ने बड़े पैमाने पर कार्रवाई की। स्मोट्रिच कहते हैं कि शांति समझौते के बावजूद यह लड़ाई जारी रहेगी।

 आलोचना और समर्थन: विभाजित इज़राइल

इज़राइल की जनता और राजनीति में यह बयान विवादास्पद है। कुछ इसे जरूरी सुरक्षा कदम मानते हैं, जबकि अन्य इसे युद्धवादी नीति कहकर आलोचना करते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूरोपीय देश और कुछ अरब राष्ट्र समझौते का स्वागत कर रहे हैं, लेकिन सऊदी अरब, UAE जैसे अब्राहम समझौते वाले देश चुपचाप इज़राइल की चिंताओं को समझते हैं।

 भविष्य की संभावनाएं

1. परमाणु खतरा: क्या ईरान समझौते का फायदा उठाकर गुप्त रूप से हथियार बनाएगा?

2. क्षेत्रीय युद्ध: हिज़्बुल्लाह के साथ पूर्ण संघर्ष की आशंका।

3. कूटनीति vs सैन्य शक्ति: ट्रंप प्रशासन मध्यस्थता करेगा या इज़राइल को स्वतंत्रता देगा?

4. भारत की भूमिका: नई दिल्ली दोनों पक्षों के साथ संतुलन कैसे बनाएगी?

स्मोट्रिच का बयान इज़राइल की अटूट भावना को दर्शाता है – “हम अपनी ज़मीन पर दृढ़ खड़े रहेंगे।” चाहे समझौता हो या न हो, इज़राइल अपनी सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा।

यह घटनाक्रम मध्य पूर्व की राजनीति को नया मोड़ दे सकता है। शांति की उम्मीद के साथ-साथ युद्ध की आशंका भी बनी हुई है। विश्व समुदाय अब देख रहा है कि क्या यह समझौता स्थायी शांति लाएगा या नया संघर्ष का बीज बोएगा।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 15 Jun 2026