-Friday World 7 Jun 2026
दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर ताला लग गया है। ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच चल रहे संघर्ष ने इस चोकपॉइंट को लगभग बंद कर दिया है, जहां से पहले दुनिया का करीब 20% तेल गुजरता था। यूरोप और एशिया के देश चीख रहे हैं, तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, लेकिन इस संकट का सबसे बड़ा फायदा किसे हो रहा है? अमेरिकी तेल कंपनियों को। रूसी कंपनी रोसनेफ्ट के CEO इगोर सेचिन ने सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम में खुलकर कहा कि हॉर्मुज की बंदी अमेरिकी हाइड्रोकार्बन निर्यात को रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा रही है।
यह कोई संयोग नहीं, बल्कि ट्रंप प्रशासन की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा लगता है।
हॉर्मुज बंदी का आर्थिक खेल
जब हॉर्मुज में तेल का प्रवाह रुकता है, तो वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित होती है। मध्य पूर्व के तेल निर्यातक देशों का दबदबा कम होता है। अमेरिका, जो पहले से ही दुनिया का बड़ा तेल उत्पादक बन चुका है, इस गैप को भरने के लिए तैयार खड़ा है। सेचिन के अनुसार, अमेरिकी कंपनियां नॉन-कॉम्पिटिटिव एडवांटेज हासिल कर रही हैं और ऊंची कीमतों पर तेल बेच रही हैं। अनुमान है कि इस साल अमेरिकी ऊर्जा क्षेत्र को 60 बिलियन डॉलर से ज्यादा अतिरिक्त मुनाफा हो सकता है।
ट्रंप का नारा “ड्रिल बेबी ड्रिल” अब जमीनी हकीकत बन रहा है। उन्होंने सत्ता संभालते ही पर्यावरण संबंधी कई प्रतिबंध हटा दिए, अलास्का में नए ड्रिलिंग क्षेत्र खोल दिए और तेल कंपनियों को खुली छूट दे दी। नतीजा? अमेरिकी शेल ऑयल प्रोडक्शन बढ़ा, रिफाइनरियां फिर से धमधमाने लगीं और वैश्विक बाजार में अमेरिका खुद को मध्य पूर्व का विकल्प साबित कर रहा है।
वेनेजुएला का उदाहरण यहां उल्लेखनीय है। ट्रंप ने वहां के राजनीतिक हालात का फायदा उठाकर क्रूड ऑयल के स्रोत पर नियंत्रण बढ़ाया। पहले जहां अमेरिकी रिफाइनरियां बंद पड़ी थीं और क्रूड ऑयल 60 डॉलर प्रति बैरल के आसपास घूम रहा था, अब स्थिति पूरी तरह बदल गई है। हॉर्मुज बंद होने से कीमतें ऊंची हैं, मुनाफा भारी है।
ट्रंप की “असंभव शर्तें” और लंबी चाल
ट्रंप ईरान पर ऐसी शर्तें थोप रहे हैं जो जानबूझकर मुश्किल हैं — परमाणु कार्यक्रम, मिसाइलें, क्षेत्रीय प्रभाव आदि। विश्लेषकों का मानना है कि इन शर्तों को जानबूझकर ऐसे बनाया गया है ताकि संकट बरकरार रहे। जब तक अमेरिकी तेल कंपनियां “पेट भर” मुनाफा नहीं कमा लेतीं, तब तक पूर्ण युद्धविराम या हॉर्मुज को पूरी तरह खोलने की कोई जल्दी नहीं है।
अमेरिकी उपभोक्ताओं को भले ही महंगे पेट्रोल की मार झेलनी पड़े, लेकिन ट्रंप को इसकी चिंता नहीं। उनका फोकस ऊर्जा स्वतंत्रता, आर्थिक मजबूती और मध्य पूर्व की “इजारेदारी” को तोड़ने पर है। वे चाहते हैं कि वैश्विक ऊर्जा बाजार का नियंत्रण अमेरिका-रूस जैसे बड़े खिलाड़ियों के बीच रहे, न कि ओपेक और खाड़ी देशों के पास।
रणनीतिक मकसद: मध्य पूर्व को कमजोर करना
यह सिर्फ तेल का खेल नहीं है। यह भू-राजनीतिक दांव-पेंच है। अमेरिका मध्य पूर्व को वैकल्पिक सप्लायर के रूप में स्थापित कर रहा है। वेनेजुएला, घरेलू शेल प्रोडक्शन और सहयोगी देशों के जरिए वह खाड़ी देशों का मुकाबला कर रहा है। हॉर्मुज की आग सुलगती रहे, तो अरब देश एक-दूसरे से लड़ेंगे, अमेरिका हथियार बेचकर कमाएगा और तेल का व्यापार अपने कंट्रोल में रहेगा।
ट्रंप रूस-यूक्रेन युद्ध को भी इसी नजरिए से देखते हैं। वे शीघ्र समझौता चाहते हैं क्योंकि वहां भी बिजनेस दिखता है — ऊर्जा बाजार को स्थिर करना, रूस के साथ डील और यूरोप पर निर्भरता कम करना।
सेचिन की चेतावनी: दुनिया को महंगा पड़ेगा
रोसनेफ्ट के CEO इगोर सेचिन ने साफ कहा — हॉर्मुज की बंदी ईरान के खिलाफ कार्रवाई थी, लेकिन इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ा। रणनीतिक जोखिमों का आकलन गलत हुआ। अगर यह तनाव लंबा चला, तो अन्य महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग भी खतरे में पड़ सकते हैं। इससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति नए संकटों का सामना करेगी।
वर्तमान में तेल की कीमतें कई सालों के उच्चतम स्तर पर हैं। यूरोप और एशिया के आयातक देश महंगाई की मार झेल रहे हैं। भारत जैसे देश, जो तेल का बड़ा आयातक है, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव महसूस कर रहा है। वहीं अमेरिकी कंपनियां रिकॉर्ड निर्यात कर रही हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ और भविष्य की आशंका
पहले क्रूड ऑयल 60 डॉलर के आसपास था, अमेरिका में नई रिफाइनरियां नहीं बन रही थीं। तेल का कारोबार संकट में था। ट्रंप ने न सिर्फ वेनेजुएला पर फोकस किया, बल्कि घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया। अब हॉर्मुज बंदी ने उन्हें सुनहरा मौका दे दिया है।
भविष्य में मध्य पूर्व की स्थिति हमेशा तनावपूर्ण रहने की आशंका है। अमेरिका इस आग को सुलगाकर अलग हो जाएगा, जबकि क्षेत्रीय देश आपस में उलझे रहेंगे। हथियारों का व्यापार फलेगा-फूलेगा। यह “डिवाइड एंड रूल” की क्लासिक नीति है, लेकिन 21वीं सदी के ऊर्जा युद्ध के रूप में।
क्या है आगे का रोडमैप?
- अमेरिका — उत्पादन बढ़ाना, निर्यात बढ़ाना, मध्य पूर्व पर निर्भरता घटाना।
- ईरान— दबाव में, लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चोकपॉइंट पर नियंत्रण।
- दुनिया — ऊंची कीमतें, महंगाई, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की तलाश।
- रूस— अमेरिकी लाभ पर चिंता, लेकिन खुद भी तेल बाजार में सक्रिय।
ट्रंप का यह खेल लंबे समय का है। वे जानते हैं कि ऊर्जा ही आधुनिक युद्ध और अर्थव्यवस्था का असली हथियार है। हॉर्मुज बंद रहने से अमेरिकी तेल कंपनियों को “घी के चुटकी” लग रही हैं, लेकिन आम उपभोक्ता और विकासशील देश भारी कीमत चुकाने को मजबूर हैं।
यह संकट सिर्फ तेल का नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का है। क्या ट्रंप अपनी शर्तें मनवा लेंगे? क्या हॉर्मुज फिर से पूरी तरह खुल जाएगा? या यह नया सामान्य बन जाएगा जहां अमेरिका ऊर्जा बाजार का मालिक बने?
हॉर्मुज का ताला अमेरिका के लिए तिजोरी का चाबी साबित हो रहा है। ट्रंप की रणनीति साफ है — मुनाफा पहले, भू-राजनीति बाद में। लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसे खेल लंबे समय तक टिकते नहीं। दुनिया को महंगे तेल, महंगाई और अनिश्चितता की कीमत चुकानी पड़ रही है, जबकि कुछ कंपनियां रिकॉर्ड मुनाफा कमा रही हैं।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 7 Jun 2026