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Saturday, 4 July 2026

"दिल्ली दंगों की 'बड़ी साजिश' केस: कड़कड़डूमा कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज की, कहा- आरोप गंभीर हैं"

"दिल्ली दंगों की 'बड़ी साजिश' केस: कड़कड़डूमा कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज की, कहा- आरोप गंभीर हैं"
- Friday World 4 Jul 2026
दिल्ली के उत्तर-पूर्वी हिस्से में फरवरी 2020 में हुए दंगों से जुड़े "बड़ी साजिश" वाले मामले में शनिवार को एक बड़ा फैसला आया। कड़कड़डूमा कोर्ट ने जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद और जामिया के छात्र शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। 

दोनों पर यूएपीए यानी गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम के तहत केस दर्ज है। अदालत ने कहा कि इस स्तर पर आरोपों की गंभीरता को देखते हुए दोनों को जमानत नहीं दी जा सकती।

1. कोर्ट ने क्या कहा और फैसला क्यों आया

शनिवार को कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बाजपेयी की अदालत में दोनों की जमानत पर सुनवाई हुई। करीब 2 घंटे तक दोनों पक्षों की दलीलें सुनी गईं। 

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से पता चलता है कि दंगों की साजिश पहले से रची गई थी। इसमें यूएपीए की धारा 15, 17 और 18 के तहत लगे आरोप बेहद गंभीर हैं। ऐसे में ट्रायल के दौरान ही गवाहों की गवाही और सबूतों की परख जरूरी है।

ज ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में दिए आदेश में साफ किया था कि इस केस में जमानत का आधार बहुत मजबूत होना चाहिए। इसलिए फिलहाल दोनों की याचिका खारिज की जाती है।

2. उमर खालिद के वकील ने क्या दलील दी

उमर खालिद की तरफ से वरिष्ठ वकील त्रिदीप पेस पेश हुए। उन्होंने अदालत के सामने पिछले 5 साल की पूरी घटनाक्रम को रखा। 

पेस ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने जब 2022 में जमानत देने से इनकार किया था, तब यह कहा था कि एक साल तक नई याचिका न दें, लेकिन इस बीच संवेदनशील गवाहों के बयान हो जाने चाहिए। अब 3 साल बीत गए हैं, लेकिन ट्रायल अभी भी शुरुआती दौर में है।" 

उन्होंने तर्क दिया कि उमर पिछले 5 साल से जेल में हैं। उनके खिलाफ कोई प्रत्यक्ष हिंसा का सबूत नहीं है। भाषण और व्हाट्सएप चैट के आधार पर यूएपीए लगाना गलत है। उन्होंने कहा, "जमानत नियम है और जेल अपवाद।"

3. शरजील इमाम के वकील की दलील

शरजील इमाम की पैरवी वकील तालिब मुस्तफा ने की। उन्होंने कहा कि शरजील भी 5 साल से ज्यादा समय से हिरासत में हैं। इस मामले में 700 से ज्यादा गवाह हैं। ऐसे में ट्रायल खत्म होने में अभी 5-7 साल लग सकते हैं।

मुस्तफा ने कोर्ट से कहा, "इस केस में कई अन्य अभियुक्तों को सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट से जमानत मिल चुकी है। 5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दे दी थी। जब सह-अभियुक्तों को राहत मिली है तो समानता के आधार पर शरजील को भी राहत मिलनी चाहिए।"

उन्होंने आगे कहा कि शरजील के खिलाफ मुख्य आरोप भड़काऊ भाषण का है। वह खुद दंगों वाली जगह पर मौजूद नहीं थे।

4. दिल्ली पुलिस और सरकारी वकील का पक्ष

दिल्ली पुलिस की तरफ से स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ने जमानत का विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह मामला सिर्फ दंगा नहीं है। यह देश की राजधानी में शांति भंग करने की "पूर्व नियोजित साजिश" है। 

सरकारी वकील ने कोर्ट में 17,000 पन्नों की चार्जशीट का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि व्हाट्सएप ग्रुप, फंडिंग, सीए विरोध के नाम पर लोगों को इकट्ठा करना और फिर हिंसा करवाना - ये सबूत फाइल में हैं। 

प्रॉसिक्यूटर ने दलील दी, "यूएपीए में जमानत के लिए दो शर्तें हैं। पहली - आरोप प्रथम दृष्टया गलत नहीं लगना चाहिए। दूसरी - आरोपी दोबारा अपराध न करे। दोनों शर्तें यहां पूरी नहीं होतीं।" 

5. पूरा मामला क्या है? 2020 के दिल्ली दंगों की टाइमलाइन

इसे समझने के लिए 5 साल पीछे जाना होगा।

दिसंबर 2019 - फरवरी 2020: CAA विरोध
संसद में नागरिकता संशोधन कानून पास होने के बाद दिल्ली में जामिया, शाहीन बाग और उत्तर-पूर्वी दिल्ली में बड़े विरोध प्रदर्शन हुए।

24-26 फरवरी 2020: उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगे 
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद, मौजपुर, चांद बाग इलाकों में हिंसा भड़क उठी। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 53 लोगों की मौत हुई और 700 से ज्यादा लोग घायल हुए।

मार्च 2020: "बड़ी साजिश" केस दर्ज
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने एक अलग FIR 59/2020 दर्ज की। इसमें कहा गया कि दंगे अचानक नहीं हुए थे। CAA विरोध की आड़ में एक साजिश रची गई थी जिसका मकसद भारत सरकार को अस्थिर करना था। इसी केस में यूएपीए लगाया गया।

इस केस में उमर खालिद, शरजील इमाम के अलावा ताहिर हुसैन, खालिद सैफी, नताशा नरवाल, देवांगना कलिता जैसे 18 लोग आरोपी बनाए गए।

5 जनवरी 2026 का सुप्रीम कोर्ट आदेश

इस केस में सबसे अहम मोड़ 5 जनवरी 2026 को आया। सुप्रीम कोर्ट ने 5 अभियुक्तों को जमानत दे दी थी। कोर्ट ने कहा था कि वे 4-5 साल से जेल में हैं और ट्रायल में देरी हो रही है।

लेकिन उसी आदेश में कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा था कि इन दोनों के खिलाफ रिकॉर्ड पर सामग्री ज्यादा है। हालांकि कोर्ट ने निचली अदालत को निर्देश दिया था कि वह गवाहों के बयान जल्दी कराए।

6. यूएपीए क्या है और यह इतना सख्त क्यों है

गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम 1967 में बना था। 2019 में इसमें संशोधन हुआ। 

इस कानून की दो खास बातें हैं:
1. जमानत मुश्किल: धारा 43D(5) कहती है कि अगर कोर्ट को लगता है कि आरोप प्रथम दृष्टया सही हैं, तो जमानत नहीं दी जाएगी।
2. लंबी हिरासत: चार्जशीट दाखिल करने के लिए 180 दिन तक का समय मिल जाता है।

इसी वजह से यूएपीए के मामलों में आरोपी सालों तक जेल में रहते हैं। मानवाधिकार संगठन अक्सर कहते हैं कि इसका इस्तेमाल असहमति की आवाज दबाने के लिए होता है। वहीं सरकार का कहना है कि यह आतंकवाद और देश विरोधी गतिविधियों से निपटने के लिए जरूरी है।

7. जेल में 5 साल: दोनों की अभी तक की जिंदगी

उमर खालिद: JNU से पीएचडी। 2020 में गिरफ्तारी के बाद से तिहाड़ जेल में हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने दंगों से पहले कई मीटिंग कीं और फंड जुटाया।

शरजील इमाम: JNU और IIT बॉम्बे के छात्र। उन पर अलीगढ़ और जामिया में दिए गए भाषणों को लेकर देशद्रोह और यूएपीए के केस हैं। दिल्ली दंगा केस के अलावा उन पर असम और बिहार में भी केस चल रहे हैं।

दोनों के परिवार का कहना है कि 5 साल में ट्रायल शुरू भी नहीं हो पाया। वहीं पीड़ित पक्ष का कहना है कि सबूत मजबूत हैं और दोषियों को सजा मिलनी चाहिए।

8. कानूनी विशेषज्ञ क्या कहते हैं

दिल्ली हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े का कहना है, "यूएपीए में जमानत का पैमाना बहुत ऊंचा है। सुप्रीम कोर्ट ने वरुण गांधी केस में कहा था कि सिर्फ भाषण से यूएपीए नहीं लगता। लेकिन निचली अदालतें अक्सर पुलिस की चार्जशीट को ही आधार मान लेती हैं।"

वहीं दूसरे वकील का मत है, "जब 5 लोगों को जमानत मिल गई तो बाकी को भी मिलनी चाहिए। 5 साल की हिरासत अपने आप में सजा बन गई है।"

9. आगे क्या होगा

अब दोनों के पास दो रास्ते हैं:
1. हाईकोर्ट में अपील: कड़कड़डूमा कोर्ट के आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
2. ट्रायल का इंतजार: कोर्ट ने कहा है कि गवाहों के बयान जल्दी हों। अगर 6 महीने में ट्रायल आगे नहीं बढ़ता तो फिर से जमानत मांगी जा सकती है।

दिल्ली पुलिस ने कहा है कि वह 20 गवाहों की लिस्ट लेकर आई है और जुलाई से उनकी गवाही शुरू कराना चाहती है।

10. निष्कर्ष: कानून, समय और इंसाफ का सवाल

यह फैसला सिर्फ दो लोगों की जमानत का नहीं है। यह 2020 के दंगों के घाव, CAA विरोध और अभिव्यक्ति की आजादी के बीच की लकीर का भी सवाल है।

एक तरफ पीड़ित परिवार हैं जो 5 साल से इंसाफ का इंतजार कर रहे हैं। दूसरी तरफ आरोपी हैं जो कह रहे हैं कि बिना ट्रायल के जेल काटना गलत है।

कोर्ट ने अभी सिर्फ इतना कहा है कि "इस स्टेज पर जमानत नहीं"। इसका मतलब यह नहीं कि वे दोषी हैं। दोषी या निर्दोष का फैसला ट्रायल के बाद ही होगा।

लेकिन सवाल वही है - क्या 5 साल की हिरासत बिना सजा के हो सकती है? और क्या इतने बड़े मामले में ट्रायल इतना लंबा चलना चाहिए?

दिल्ली दंगों का यह केस आने वाले सालों तक देश की अदालतों और बहसों में जगह लेता रहेगा।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 4 Jul 2026