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Tuesday, 7 July 2026

दहल उठा दमिश्क: फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों के होटल के पास एक के बाद एक धमाके, सीरिया की सुरक्षा पर फिर उठे सवाल

दहल उठा दमिश्क: फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों के होटल के पास एक के बाद एक धमाके, सीरिया की सुरक्षा पर फिर उठे सवाल
-Friday World 7 Jul 2026
असद के पतन के बाद सीरिया दौरे पर पहुंचे पहले EU नेता थे मैक्रों। ब्लास्ट के समय वह होटल छोड़ चुके थे, पूरी तरह सुरक्षित

मंगलवार, 7 जुलाई 2026 की सुबह सीरिया की राजधानी दमिश्क एक बार फिर धमाकों से गूंज उठी। इस बार निशाना कोई आम जगह नहीं, बल्कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के ठहरने वाली होटल के बेहद करीब का इलाका था। 

एक के बाद एक हुए सीरियल ब्लास्ट ने पूरे शहर में अफरा-तफरी मचा दी। सड़कों पर सायरन, सुरक्षाबलों की दौड़-भाग और लोगों के बीच दहशत का माहौल बन गया। इस हमले ने 13 साल के गृहयुद्ध के बाद "नए सीरिया" की सबसे बड़ी कमजोरी को दुनिया के सामने फिर से उजागर कर दिया - सुरक्षा।

 क्या हुआ दमिश्क में?

जानकारी के अनुसार यह एक आत्मघाती हमला था। हमलावरों ने मैक्रों के होटल के पास सुनियोजित तरीके से कई जगहों पर विस्फोट किए। धमाके इतने तेज थे कि आसपास की इमारतों की खिड़कियां तक टूट गईं। 

घटना के तुरंत बाद सीरियाई सुरक्षा बलों ने होटल की ओर जाने वाले सभी रास्ते सील कर दिए। पूरे इलाके में कर्फ्यू जैसे हालात बना दिए गए। ड्रोन और सैन्य गाड़ियों की गश्त बढ़ा दी गई।

लेकिन राहत की सबसे बड़ी खबर यह रही कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों इस हमले में पूरी तरह सुरक्षित हैं। फ्रांसी राष्ट्रपति भवन 'एलीसी पैलेस' ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि की कि मैक्रों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है और उनका सीरिया दौरा तय कार्यक्रम के अनुसार ही आगे बढ़ेगा।

फ्रेंच प्रेसीडेंसी के अनुसार, जब ये धमाके हुए तब मैक्रों होटल में नहीं थे। वह उस समय सीरिया के नए राष्ट्रपति अहमद अल-शरा से मुलाकात के लिए प्रेसिडेंशियल पैलेस में मौजूद थे।

ऐतिहासिक दौरे पर आया था खतरा

इमैनुएल मैक्रों की यह सीरिया यात्रा सिर्फ एक राजनयिक मुलाकात नहीं थी। यह ऐतिहासिक थी। 

दरअसल 2024 में सीरिया के पूर्व तानाशाह बशर अल-असद के शासन का तख्तापलट हुआ था। विद्रोही ताकतों ने अहमद अल-शरा के नेतृत्व में 50 साल से ज्यादा समय से चल रहे असद परिवार के राज को खत्म कर दिया। इस बदलाव के बाद सीरिया का लंबा गृहयुद्ध भी थम गया था।

असद के पतन के बाद सीरिया की यात्रा करने वाले मैक्रों यूरोपीय संघ यानी EU के पहले देश के राष्ट्राध्यक्ष बने। इसे पश्चिमी देशों द्वारा "नए सीरिया" को मान्यता देने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा था। 

राष्ट्रपति शरा भी अपने नए प्रशासन के साथ पश्चिम और पश्चिम एशिया के देशों से संबंध सुधारने में जुटे हुए हैं। मैक्रों की यह यात्रा उसी कड़ी का हिस्सा थी। ऐसे समय में हुआ यह हमला सीधे तौर पर सीरिया की नई सरकार और पश्चिमी देशों के रिश्ते को चुनौती देने जैसा है।

हमले के पीछे किसका हाथ?

अभी तक किसी भी संगठन ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है। सीरियाई अधिकारियों का कहना है कि जांच जारी है। 

लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे 3 संभावित ताकतें हो सकती हैं:

1. इस्लामिक स्टेट के बचे हुए सेल: 13 साल के गृहयुद्ध के दौरान IS ने सीरिया में गहरी जड़ें जमा ली थीं। भले ही असद सरकार गिर गई हो, लेकिन रेगिस्तानी इलाकों में IS के स्लीपर सेल आज भी सक्रिय हैं। उनका मकसद नई सरकार को अस्थिर करना है।

2. असद वफादार गुट: असद समर्थक जो अभी भी सीरिया के अंदर छिपे हुए हैं, वे नई सरकार और पश्चिमी समर्थन को नाकाम करना चाहते हैं। 

3. अंदरूनी चरमपंथी समूह: राष्ट्रपति शरा बहुसंख्यक सुन्नी समुदाय से आते हैं। उन्होंने सभी समुदायों को साथ लेकर चलने का वादा किया है। लेकिन कई कट्टरपंथी और अल्पसंख्यक गुट इस नई व्यवस्था से खुश नहीं हैं और बार-बार चुनौती दे रहे हैं।

 13 साल बाद भी क्यों असुरक्षित है सीरिया?

असद का जाना सीरिया के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत थी। लेकिन हकीकत यह है कि देश अभी भी जख्मी है।

1. आतंकी नेटवर्क: IS, अल-कायदा से जुड़े गुट और अन्य चरमपंथी संगठन अभी भी देश के कई हिस्सों में मौजूद हैं। उनके पास हथियार, पैसा और नेटवर्क है।

2. टूटी हुई सुरक्षा व्यवस्था: दशकों की लड़ाई के बाद पुलिस, खुफिया और सेना का ढांचा पूरी तरह से नहीं बन पाया है। 

3. राजनीतिक अविश्वास: नए प्रशासन को अभी सभी समुदायों - कुर्द, ईसाई, अलावी, ड्रूज - का भरोसा जीतना है। जब तक यह नहीं होता, अंदरूनी टकराव की आशंका बनी रहेगी।

4. बाहरी दखल: सीरिया में तुर्की, ईरान, रूस और अब पश्चिमी देशों के हित टकराते हैं। हर बाहरी ताकत अपने समर्थक गुटों को मजबूत कर रही है।

राष्ट्रपति शरा ने वादा किया है कि वह एक समावेशी राजनीतिक व्यवस्था बनाएंगे। लेकिन इस हमले ने दिखा दिया कि वादे और जमीन की हकीकत में अभी बहुत फासला है।

मैक्रों के दौरे का क्या होगा?

हमले के बाद भी फ्रांस ने अपने रुख में कोई बदलाव नहीं किया है। एलीसी पैलेस ने साफ कहा कि मैक्रों का शेड्यूल नहीं बदलेगा। 

इसका मतलब साफ है - फ्रांस और EU "आतंक के डर" से सीरिया से दूरी नहीं बनाएंगे। बल्कि वे नई सरकार के साथ खड़े होकर सुरक्षा और पुनर्निर्माण में मदद करना चाहते हैं।

मैक्रों और शरा के बीच हुई बैठक में 3 मुद्दे सबसे ऊपर रहे होंगे:

1. सुरक्षा सहयोग: फ्रांस सीरिया को आतंकवाद से लड़ने के लिए खुफिया और तकनीकी मदद दे सकता है।

2. पुनर्निर्माण: युद्ध से तबाह हुए सीरिया के लिए EU से आर्थिक मदद का रास्ता खोलना।

3. मानवीय संकट: लाखों शरणार्थियों की वापसी और राहत कार्य।

 दुनिया के लिए क्या संकेत है?

दमिश्क का यह धमाका सिर्फ सीरिया की खबर नहीं है। यह पूरी दुनिया के लिए एक संदेश है।

पहला: मध्य पूर्व में शांति अभी बहुत नाजुक है। एक सरकार बदलने से 13 साल का जहर खत्म नहीं होता।

दूसरा: पश्चिमी देशों के लिए सीरिया अब "नो-गो जोन" नहीं रहा। मैक्रों का दौरा इस बात का सबूत है। लेकिन सुरक्षा की कीमत उन्हें भी चुकानी पड़ रही है।

तीसरा: तेल और गैस से भरपूर इस क्षेत्र में अगर अस्थिरता बनी रही तो उसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। हम पहले ही देख चुके हैं कि होर्मुज या लाल सागर में तनाव से तेल के दाम कैसे बढ़ते हैं।

आम आदमी और भारत के लिए मायने

आप सोच रहे होंगे कि दमिश्क के धमाके का भारत से क्या लेना-देना? लेना-देना है।

1. तेल की कीमतें: सीरिया खुद बड़ा तेल उत्पादक नहीं है, लेकिन पूरा पश्चिम एशिया एक जंजीर है। अगर सीरिया में अस्थिरता बढ़ती है तो निवेशक घबराकर तेल महंगा कर देते हैं। 

2. आतंकवाद: IS जैसे संगठन की वापसी का मतलब है कि भारत जैसे देशों को भी अपनी सुरक्षा और कड़ी करनी होगी।

3. शरणार्थी संकट: अगर हालात फिर बिगड़ते हैं तो नए सिरे से शरणार्थियों की लहर यूरोप और एशिया की तरफ आ सकती है।

 जख्म अभी हरे हैं

7 जुलाई का दिन दमिश्क के लिए एक चेतावनी बनकर आया है। एक तरफ राष्ट्रपति मैक्रों जैसे विश्व नेता "नए सीरिया" पर भरोसा जताने आए हैं। दूसरी तरफ उसी भरोसे को बम से उड़ाने की कोशिश हो रही है।

अच्छी बात यह है कि मैक्रों सुरक्षित हैं और कूटनीति रुकी नहीं है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि सीरिया के सामने सुरक्षा का पहाड़ अभी भी खड़ा है। 

असद गए, लेकिन असद के दौर की नफरत, आतंक और अविश्वास अभी गया नहीं है। जब तक सीरिया की नई सरकार सभी को साथ लेकर चलने में कामयाब नहीं होती, तब तक दमिश्क की सड़कों पर धमाकों की गूंज सुनाई देती रहेगी।

दुनिया अब देख रही है कि क्या अहमद अल-शरा वाकई एक नया, सुरक्षित और समावेशी सीरिया बना पाते हैं। और क्या पश्चिमी देश इस बार सिर्फ बयान देकर नहीं, बल्कि जमीन पर साथ देकर सीरिया को फिर से खड़ा करने में मदद करेंगे।

क्योंकि दमिश्क का भविष्य तय करेगा कि मध्य पूर्व में शांति आएगी या अगला धमाका फिर कब होगा।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 7 Jul 2026