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Monday, 6 July 2026

शहीद ख़ामनेई बनाम सद्दाम हुसैन: इतिहास के तराजू में ईरान की जीत और अमेरिकी मोहरों की हार

शहीद ख़ामनेई बनाम सद्दाम हुसैन: इतिहास के तराजू में ईरान की जीत और अमेरिकी मोहरों की हार
-Friday World 6 Jul 2026 
1980 का दशक। ईरान अभी-अभी इस्लामी क्रांति की आग से निकला था। नई सरकार बनी थी, लेकिन पूरी तरह स्थिर नहीं हुई थी। ठीक इसी वक़्त दुनिया की दो महाशक्तियाँ – अमेरिका और सोवियत रूस – ने ईरान पर अपनी त्योरियाँ चढ़ा दीं। इन दोनों ने मिलकर एक “मुर्गा” तैयार किया – सद्दाम हुसैन। सितंबर 1980 में सद्दाम ने ईरान पर हमला बोल दिया। आठ साल तक चली यह जंग (1980-88) दोनों देशों को तबाह कर गई। लाखों सैनिक और आम नागरिक मारे गए। पैसे, संसाधन और विकास सब बर्बाद हो गए।

जंग खत्म हुई तो अमेरिका ने अपने मोहरे सद्दाम का वही हश्र किया जो बाद में उसने ओसामा बिन लादेन का 2011 में किया। सद्दाम को “मर्द-ए-मुजाहिद” कहकर सराहा गया, बच्चों का नाम उनके नाम पर रखा गया, लेकिन इतिहास के पन्ने पलटते ही सच्चाई सामने आई – सद्दाम महज़ एक मोहरा था।

आज जब हम ख़ामनेई और सद्दाम को वक़्त के तराजू में तौलते हैं तो पलड़ा ख़ामनेई का भारी पड़ता है। एक तरफ़ सद्दाम का नामोनिशान मिट चुका है और इराक अमेरिका-रूस का गुलाम बना हुआ है, दूसरी तरफ़ ईरान एक स्वाधीन, शक्तिशाली और भावी सुपरपावर के रूप में उभरा है। यह कहानी सिर्फ़ दो नेताओं की नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं की है – एक दादागिरी और मोहरों की, दूसरी प्रतिरोध और आत्मनिर्भरता की।
        सद्दाम: अमेरिका का उपयोगी मोहरा

सद्दाम हुसैन को शुरू में अमेरिका और पश्चिमी देशों का भरपूर समर्थन प्राप्त था। ईरान की क्रांति को रोकने के लिए सद्दाम को हथियार, खुफिया जानकारी और आर्थिक मदद दी गई। आठ साल की ईरान-इराक जंग में सद्दाम को रासायनिक हथियारों तक की छूट दी गई। लाखों लोग मारे गए, लेकिन जंग का असली मकसद ईरान को कमज़ोर करना था।

जंग के बाद सद्दाम को लगा कि वह अब क्षेत्रीय ताक़त बन गया है। लेकिन जब उसने कुवैत पर हमला किया तो अमेरिका ने उसी सद्दाम को निशाना बना लिया। 2003 में इराक पर हमला, सद्दाम की गिरफ्तारी और 2006 में फाँसी – पूरा खेल अमेरिकी शतरंज का हिस्सा था। सद्दाम का अंत यही साबित करता है कि जो शक्तियाँ मोहरा बनाती हैं, वही उसे नष्ट भी कर देती हैं।

ख़ामनेई: प्रतिरोध का प्रतीक

दूसरी तरफ आयतुल्लाह अली ख़ामनेई। इमाम ख़ुमैनी के बाद उन्होंने ईरान की कमान संभाली। देश तबाह हालत में था – युद्ध के घाव, प्रतिबंध और दबाव। लेकिन ख़ामनेई ने कभी झुककर समझौता नहीं किया। उन्होंने ईरान को “न न पूरब, न पश्चिम” की राह पर चलाया।

उनके नेतृत्व में ईरान ने:

- परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाया।

- मिसाइल और ड्रोन तकनीक में आत्मनिर्भरता हासिल की।

- क्षेत्रीय रेसिस्टेंस (हिज़बुल्लाह, हमास, अंसारुल्लाह) को मजबूत किया।

- आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद घरेलू उत्पादन बढ़ाया।

आज ईरान दुनिया की सबसे बड़ी शक्तियों को भी चुनौती दे रहा है। इज़रायल पर सीधे हमले, अमेरिकी ठिकानों पर जवाबी कार्रवाई और क्षेत्रीय प्रभाव – ये सब ख़ामनेई की दूरदर्शिता का नतीजा हैं।

 ईरान-इराक जंग: दोनों तरफ़ का नुकसान

1980-88 की जंग ने दोनों देशों को भारी कीमत चुकानी पड़ी। ईरान पर हमला सद्दाम ने किया, लेकिन असली मास्टरमाइंड अमेरिका था। जंग में रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल हुआ। लाखों लोग मारे गए। ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा गई, लेकिन उसकी जनता की इच्छाशक्ति नहीं टूटी।

ख़ामनेई ने इस जंग के बाद देश को फिर से खड़ा किया। उन्होंने शिक्षा, विज्ञान और रक्षा पर निवेश किया। आज ईरान हाइपरसोनिक मिसाइलें, एडवांस्ड ड्रोन और साइबर क्षमता में आगे है।

 अमेरिकी दादागिरी और ईरान का इंकार

दुनिया भर में अमेरिका ने कई देशों को दबाया – वियतनाम, अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, सीरिया, वेनेजुएला आदि। लेकिन ईरान ने कभी घुटने नहीं टेके। ख़ामनेई ने स्पष्ट कहा – हम न तो अमेरिका के गुलाम बनेंगे और न ही किसी की अधीनता स्वीकार करेंगे।

आज इराक अमेरिकी प्रभाव में है। सद्दाम का नाम इतिहास की किताबों में सिमट गया। लेकिन ईरान आज भी खड़ा है। उसकी आवाम ख़ामनेई को हीरो मानती है। शहीद ख़ामनेई की छवि ज़िंदा ख़ामनेई से ज़्यादा ताक़तवर साबित हो रही है।

भावी सुपरपावर ईरान

ईरान अब सिर्फ़ एक देश नहीं, बल्कि एक विचार है – ज़ुल्म के खिलाफ़ प्रतिरोध का। उसके पास:

- युवा आबादी- प्राकृतिक संसाधन 

- उन्नत तकनीक- मजबूत सैन्य क्षमता

ये सब उसे भावी सुपरपावर बना सकते हैं। चीन और रूस के साथ बढ़ते संबंध, ब्रिक्स जैसी संस्थाओं में सक्रिय भूमिका और क्षेत्रीय प्रभाव – ईरान धीरे-धीरे विश्व पटल पर अपनी जगह बना रहा है।

सबक इतिहास से

सद्दाम हुसैन की कहानी सिखाती है कि विदेशी ताक़तों का मोहरा बनना अंत में विनाश लाता है। वहीं ख़ामनेई की कहानी सिखाती है कि सिद्धांतों पर अडिग रहना और जनता के साथ खड़े रहना ही असली ताक़त है।

ईरान ने साबित किया कि मौत से डरने वाले नहीं, बल्कि शहादत को गले लगाने वाले ही इतिहास बनाते हैं। आज जब पूरी दुनिया महाशक्तियों की दादागिरी देख रही है, तब ईरान का मॉडल एक विकल्प पेश करता है – स्वाधीनता, आत्मनिर्भरता और प्रतिरोध का मॉडल।


80 के दशक में शुरू हुई जंग आज भी याद की जाती है। सद्दाम मोहरा था, ख़ामनेई दूरदर्शी नेता। इराक आज गुलामी की राह पर, ईरान स्वाधीनता की मिसाल। इतिहास का तराजू ख़ामनेई का पलड़ा भारी तौलता है। शहीद ख़ामनेई की विचारधारा आज भी ज़िंदा है और ईरान को आगे बढ़ा रही है।

यह कहानी सिर्फ़ ईरान की नहीं, बल्कि हर उस देश और व्यक्ति की है जो दादागिरी के सामने सिर नहीं झुकाता। हुसैनी रूह आज भी ज़िंदा है – और यही ईरान की सबसे बड़ी ताक़त है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 6 Jul 2026