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Sunday, 23 August 2026

121 चीनी मिलों वाला यूपी भी कंगाल, 80 साल का रिकॉर्ड टूटा - क्या इथेनॉल ने खा ली चीनी की मिठास?

121 चीनी मिलों वाला यूपी भी कंगाल, 80 साल का रिकॉर्ड टूटा - क्या इथेनॉल ने खा ली चीनी की मिठास?
-Friday World 23 Aug 2026
विदेश से 10 लाख टन चीनी मंगाने को मजबूर हुआ भारत, किराना दुकान पर 61 रुपये किलो पहुंची चीनी, जानिए आम आदमी की थाली से मिठास क्यों गायब हो रही है

लखनऊ / नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश को देश का चीनी का कटोरा कहा जाता है। यहां 121 चीनी मिलें पेराई सीजन में चलती हैं, जो पूरे देश की लगभग 35% चीनी पैदा करती हैं। फिर भी आज हालत ये है कि अलीगढ़, मुजफ्फरनगर और लखनऊ में चीनी 61 रुपये प्रति किलो बिक रही है। पिछले डेढ़ महीने में ही 17 रुपये किलो की बढ़ोतरी हुई है। हर दिन 1-2 रुपये का इजाफा हो रहा है।

सवाल सबके मन में एक ही है - जब मिलें हमारे यहां हैं, गन्ना हमारे खेत में है, तो चीनी विदेश से क्यों मंगानी पड़ रही है? और आम पब्लिक की चाय इतनी कड़वी क्यों हो गई?

 1. आंकड़ों का खेल जो बिगड़ गया

कहानी शुरू होती है गलत अनुमान से। सरकार और इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन ने इस सीजन 2025-26 के लिए 343 लाख टन चीनी उत्पादन का अनुमान लगाया था। लेकिन जमीन पर उत्पादन सिमट कर 306 लाख टन पर आ गया।

क्यों? दो बड़ी वजहें -

रेड रॉट और टॉप बोरर बीमारी: पश्चिमी यूपी में गन्ने की फसल में लाल सड़न रोग ने 15% तक फसल खराब कर दी।

जल-जमाव: ज्यादा बारिश से खेतों में पानी भर गया, गन्ने की मिठास कम हो गई।

देश में कुल उपलब्धता का गणित देखिए: नया उत्पादन 279 लाख टन (24 लाख टन इथेनॉल के लिए निकालने के बाद) + पुराना स्टॉक 47 लाख टन = 326 लाख टन। देश की सालाना खपत 280 लाख टन है। इसमें से 8 लाख टन सरकार ने नवंबर 2024 और फरवरी 2025 में निर्यात करने की अनुमति दे दी। अब बचा स्टॉक सिर्फ 35-39 लाख टन। जबकि नियम कहता है कि नए सीजन (1 अक्टूबर) से पहले कम से कम 60 लाख टन बफर स्टॉक होना चाहिए। यही कमी आयात की नौबत ले आई।

आखिरी बार भारत ने 2016-17 में चीनी का आयात किया था। 9 साल बाद फिर वही स्थिति है।

 2. क्या इथेनॉल वाकई में विलेन है?

बाजार में सबसे ज्यादा चर्चा इसी पर है। थोक व्यापारी विशाल भगत का कहना है - मिलों ने गन्ने से चीनी की जगह इथेनॉल ज्यादा बनाया, इसलिए चीनी कम पड़ी।

लेकिन केंद्र सरकार के उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने 22 अगस्त को इसे सिरे से खारिज कर दिया। सरकार का तर्क है:

2022-23 में कुल चीनी का 12% हिस्सा इथेनॉल में जाता था। 2025-26 में यह घटकर सिर्फ 9% रह गया है। आज भारत का 75% इथेनॉल मक्का और अनाज से बन रहा है, गन्ने से नहीं।

तो फिर असली वजह क्या है? सरकार के अनुसार - त्योहारी मांग, कम उत्पादन और जमाखोरी।

दरअसल, इथेनॉल प्रोग्राम ने चीनी उद्योग को बचाया है। जब चीनी का भाव 17 रुपये किलो था अंतरराष्ट्रीय बाजार में, तब मिलें बंद होने की कगार पर थीं। इथेनॉल से उन्हें पैसा मिला और किसानों को 76,000 करोड़ का भुगतान हो पाया।

 3. अदानी के स्टॉक भंडार ने चीनी को कड़वा किया? सच क्या है?

सोशल मीडिया पर एक और थ्योरी वायरल है - बड़े औद्योगिक घरानों ने चीनी का स्टॉक कर लिया है, इसलिए दाम बढ़े हैं। इसमें अदानी ग्रुप का नाम भी लिया जा रहा है।

तथ्यों पर बात करें तो सरकार ने खुद माना है कि जमाखोरी हो रही है। इसी कारण 1 सितंबर से 30 नवंबर 2026 तक सख्त स्टॉक लिमिट लगाई गई है:

- छोटे डीलरों के लिए अधिकतम 400 टन का स्टॉक
- बड़े थोक उपभोक्ता (जो महीने में 10 टन से ज्यादा चीनी इस्तेमाल करते हैं) सिर्फ 15 दिन की जरूरत का स्टॉक रख सकते हैं।

सरकार ने मिलों में फिजिकल वेरिफिकेशन के लिए केंद्रीय और राज्य टीमों को भी भेजा है। किसी एक कंपनी का नाम लेकर स्टॉक जमा करने का आधिकारिक प्रमाण अभी तक किसी सरकारी रिपोर्ट में नहीं है। वैश्विक कारण भी बड़ा है - पूरी दुनिया में 33 लाख टन चीनी की कमी का अनुमान है। 30 जून को अंतरराष्ट्रीय भाव 474 डॉलर प्रति टन था, जो 20 अगस्त को 552 डॉलर हो गया, यानी 16% की सीधी बढ़ोतरी।

 4. सरकार ने क्या कदम उठाए?

20 अगस्त 2026 को केंद्र ने बड़ा फैसला लिया - 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी का शून्य शुल्क (ड्यूटी-फ्री) आयात। यह TRQ सिस्टम के तहत 31 अक्टूबर तक होगा। एक दशक में पहली बार भारत बिना टैक्स के चीनी मंगा रहा है।

उम्मीद है कि इससे त्योहारी सीजन - दशहरा, दिवाली में मिठाई और कोल्ड ड्रिंक कंपनियों की मांग पूरी होगी और दाम 50 रुपये के नीचे आएंगे।

 5. आम पब्लिक क्यों हो रही परेशान?

असर सीधा रसोई पर है।

- फुटकर व्यापारी मनोज कुमार कहते हैं - ग्राहक रोज बहस करते हैं। उन्हें लगता है हम ज्यादा कमा रहे हैं, जबकि पीछे से ही महंगी आ रही है।
- एक गरीब परिवार जो महीने में 5 किलो चीनी लेता था, अब 3 किलो पर आ गया है। चाय फीकी, खीर-सिवइयां त्योहार पर ही बन रही हैं।
- हलवाई और बिस्किट-नमकीन उद्योग की लागत 40% बढ़ गई है। इसका असर उनके उत्पादों पर भी पड़ेगा।


मिठास लौटेगी, पर सबक जरूरी है

यूपी की 121 मिलें होना ताकत है, लेकिन सिर्फ मिलें होना काफी नहीं। गन्ने की बीमारी-रोधी किस्म, सही उत्पादन अनुमान और निर्यात पर समय पर ब्रेक - यही भविष्य में इस संकट को रोक सकता है। इथेनॉल दुश्मन नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा का साथी है। जरूरत है संतुलन की, ताकि पेट्रोल की टंकी भरने के लिए थाली की मिठास कम न हो।

अक्टूबर में नया पेराई सीजन शुरू होने तक 10 लाख टन विदेशी चीनी ही आम आदमी की चाय में मिठास घोलेगी।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 23 Aug 2026

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