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Thursday, 6 August 2026

एशिया की सबसे पुरानी हाईवे: ग्रेण्ड ट्रंक रोड की 2500 साल पुरानी गौरवगाथा, शेरशाह सूरी से लेकर आधुनिक भारत तक

एशिया की सबसे पुरानी हाईवे: ग्रेण्ड ट्रंक रोड की 2500 साल पुरानी गौरवगाथा, शेरशाह सूरी से लेकर आधुनिक भारत तक
-Friday World 7 Aug 2026
ग्रेण्ड ट्रंक रोड, जिसे आम भाषा में जीटी रोड कहा जाता है, सिर्फ एक सड़क नहीं है। यह एशिया की सबसे प्राचीन और सबसे लंबी सड़कों में से एक है, जो सदियों से व्यापार, संस्कृति, युद्ध और सभ्यताओं का साक्षी रही है। बांग्लादेश के टेक्नाफ से लेकर अफगानिस्तान के काबुल तक फैली यह सड़क लगभग 2500 से 3655 किलोमीटर लंबी है और चार देशों – बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान – से होकर गुजरती है। भारत में इसका बड़ा हिस्सा आज नेशनल हाईवे-19 (NH-19) और NH-44 के रूप में जाना जाता है।

 प्राचीन उत्पत्ति: उत्तरापथ से शुरुआत

इस सड़क की जड़ें बहुत गहरी हैं। लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य और बाद में सम्राट अशोक के शासनकाल में इसे **उत्तरापथ** के नाम से विकसित किया गया था। यह मार्ग तक्षशिला (आज का पाकिस्तान) से पाटलिपुत्र (आज का पटना) तक व्यापार और प्रशासन को जोड़ता था। अशोक ने इस मार्ग पर स्तंभ और सुविधाएं स्थापित कीं, जिससे यह साम्राज्य की जीवन रेखा बन गई।

सदियों तक यह मार्ग व्यापारियों, तीर्थयात्रियों और सेनाओं के लिए मुख्य मार्ग बना रहा। समय के साथ यह क्षतिग्रस्त होता गया, लेकिन इसकी उपयोगिता कभी खत्म नहीं हुई।

 शेरशाह सूरी का योगदान: सड़क-ए-आजम का जन्म

16वीं शताब्दी में इस प्राचीन मार्ग को नया जीवन देने का श्रेय **शेरशाह सूरी** को जाता है। 1540 से 1545 तक के अपने संक्षिप्त लेकिन प्रभावशाली शासनकाल में शेरशाह ने इस सड़क का बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण और विस्तार किया। उन्होंने इसे सड़क-ए-आजम या शाह राह-ए-आजम (महान सड़क) का नाम दिया।

शेरशाह ने सिर्फ सड़क को चौड़ा और मजबूत नहीं किया, बल्कि यात्रियों की सुविधा के लिए हर कुछ कोस पर सराय (रैन बसेरे), कुएं, बाग और छायादार पेड़ लगवाए। दूरी मापने के लिए **कोस मीनार** स्थापित किए गए, जिनमें से कुछ आज भी मौजूद हैं। उनका उद्देश्य साम्राज्य को एकजुट रखना, व्यापार को बढ़ावा देना और डाक व्यवस्था को मजबूत करना था। शेरशाह के शासनकाल में यह सड़क सोनारगाँव (बांग्लादेश) से लेकर सिंधु नदी और आगे तक फैली।

यह मिथक है कि शेरशाह ने अकेले पांच साल में 3655 किलोमीटर लंबी सड़क बना दी। वास्तव में उन्होंने पहले से मौजूद मार्ग को सुधारा, विस्तारित किया और व्यवस्थित किया। उनके काम ने इस सड़क को मध्यकालीन भारत की सबसे महत्वपूर्ण जीवन रेखा बना दिया।

मुगल काल और ब्रिटिश युग

मुगल सम्राटों – अकबर, जहांगीर और शाहजहां – ने भी इस मार्ग पर सराय और सुविधाएं बढ़ाईं। इसे बादशाही सड़क कहा जाने लगा।

19वीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन के दौरान इस सड़क का आधुनिकीकरण हुआ। 1833 से 1860 के बीच इसे मेटल्ड रोड बनाया गया और “Grand Trunk Road” नाम दिया गया। ब्रिटिश काल में इसका उद्देश्य सैन्य आवाजाही, व्यापार और प्रशासन को सुगम बनाना था। कलकत्ता से पेशावर तक इसे व्यवस्थित रूप से विकसित किया गया। रुडयार्ड किपलिंग ने अपनी प्रसिद्ध कृति “किम” में इस सड़क का जीवंत वर्णन किया है – “यह जीवन की ऐसी नदी है जो दुनिया में कहीं और नहीं मिलती।”

भारत में मार्ग और राज्य

भारत में ग्रेण्ड ट्रंक रोड मुख्य रूप से निम्नलिखित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से होकर गुजरती है:

- पश्चिम बंगाल  
- झारखंड  
- बिहार  
- उत्तर प्रदेश  
- दिल्ली  
- हरियाणा  
- पंजाब  

NH-19 का मुख्य हिस्सा आगरा से दानकुनी (कोलकाता के पास) तक लगभग 1300-1323 किलोमीटर लंबा है, जो उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से होकर गुजरता है। दिल्ली से आगे का हिस्सा NH-44 के रूप में अमृतसर तक जाता है।

प्रमुख शहरों में कोलकाता, दुर्गापुर, धनबाद, सासाराम, वाराणसी, प्रयागराज, कानपुर, आगरा, दिल्ली, पानीपत, अम्बाला, लुधियाना, जालंधर और अमृतसर शामिल हैं।

वर्तमान स्थिति

आज ग्रेण्ड ट्रंक रोड भारत की सबसे व्यस्त और महत्वपूर्ण आर्थिक धमनियों में से एक है। NH-19 गोल्डन क्वाड्रिलेटरल का हिस्सा है और एशियन हाईवे-1 (AH1) का भी अंग है। अधिकांश हिस्से को 4 से 6 लेन का आधुनिक हाईवे बना दिया गया है। फ्लाईओवर, बाईपास, सर्विस रोड और बेहतर सुरक्षा व्यवस्था के साथ यात्रा पहले से कहीं अधिक सहज हो गई है।

हालांकि कुछ हिस्सों में भारी ट्रक ट्रैफिक के कारण भीड़भाड़ रहती है, लेकिन कुल मिलाकर सड़क की हालत अच्छी है और लगातार सुधार के कार्य चल रहे हैं। यह मार्ग व्यापार, पर्यटन, तीर्थयात्रा और रोजमर्रा की आवाजाही के लिए आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व

ग्रेण्ड ट्रंक रोड सिर्फ पत्थर और डामर नहीं है। यह सदियों की कहानियों का संग्रह है। इस मार्ग पर शेरशाह का मकबरा (सासाराम), वाराणसी के घाट, प्रयागराज का संगम, आगरा का ताजमहल, दिल्ली का इतिहास और अमृतसर का स्वर्ण मंदिर स्थित हैं। यह सड़क हिंदू, बौद्ध, इस्लामी और सिख संस्कृतियों का संगम रही है।

व्यापारियों के कारवां, तीर्थयात्री, सैनिक और आम लोग सदियों से इस मार्ग पर चलते रहे हैं। आज भी यह भारत की एकता और विविधता का प्रतीक है।


ग्रेण्ड ट्रंक रोड एशिया की धरोहर है। चंद्रगुप्त मौर्य से शुरू होकर शेरशाह सूरी के सुधार, मुगलों के संरक्षण और ब्रिटिश आधुनिकीकरण से गुजरती हुई यह सड़क आज आधुनिक भारत की प्रगति की निशानी बन चुकी है। 2500 साल बाद भी यह जीवित है, व्यस्त है और देश की अर्थव्यवस्था को गति दे रही है।

यह सड़क हमें याद दिलाती है कि अच्छी बुनियादी ढांचा सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि सभ्यता की रीढ़ होती है। ग्रेण्ड ट्रंक रोड का इतिहास हमें सिखाता है कि दूरदृष्टि और निरंतर सुधार से कोई भी मार्ग अमर हो सकता है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 7 Aug 2026

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