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Wednesday, 19 August 2026

संसद पर अपराध का साया: 326 सांसद और 14 मुख्यमंत्री आपराधिक मामलों में घिरे, 4192 केस लंबित

संसद पर अपराध का साया: 326 सांसद और 14 मुख्यमंत्री आपराधिक मामलों में घिरे, 4192 केस लंबित
- Friday World 19 Aug 2026
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है, जहां जनप्रतिनिधि देश के कानून बनाते हैं और जनता की आवाज बुलंद करते हैं। लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में पेश एक ताजा रिपोर्ट ने इस मंदिर की छवि पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसरिया (अमिकस क्यूरी) द्वारा दायर स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार, देश के कुल 776 मौजूदा सांसदों में से 326 यानी लगभग 42 प्रतिशत सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। इनमें लोकसभा के 543 सदस्यों में से 251 और राज्यसभा के 233 में से 75 सांसद शामिल हैं।

रिपोर्ट एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के आंकड़ों और विभिन्न हाईकोर्ट से प्राप्त जानकारी पर आधारित है। लोकसभा में 170 सांसदों पर गंभीर आपराधिक मामले हैं, जिनमें पांच साल या उससे अधिक की सजा हो सकती है। राज्यसभा में भी 40 सांसदों पर ऐसे गंभीर आरोप दर्ज हैं। कुल मिलाकर मौजूदा और पूर्व सांसदों-विधायकों के खिलाफ 4,192 आपराधिक मामले अदालतों में पेंडिंग हैं। 2025 में 1,243 मामलों का निपटारा हुआ, लेकिन उसी साल 1,050 नए मामले दर्ज हो गए। नतीजा यह कि 2018 से पेंडेंसी लगभग जस की तस बनी हुई है।

और भी चौंकाने वाला तथ्य यह है कि देश के 28 राज्यों में से 14 मुख्यमंत्रियों के खिलाफ भी आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें गंभीर अपराध शामिल हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के खिलाफ सबसे ज्यादा 89 मामले हैं। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी पर 29, कर्नाटक के डी.के. शिवकुमार और आंध्र प्रदेश के एन. चंद्रबाबू नायडू पर 19-19 तथा केरल के वी.डी. सतीशन पर 18 मामले हैं।

राज्यवार आंकड़े और भी चिंताजनक हैं। केरल में 20 में से 19 सांसदों (लगभग 95 प्रतिशत) पर मामले हैं। तेलंगाना में 17 में से 14, ओडिशा में 21 में से 16, झारखंड में 14 में से 10 और तमिलनाडु में 39 में से 26 सांसद आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में भी आधे से ज्यादा सांसद घिरे हुए हैं। इसके विपरीत हरियाणा और छत्तीसगढ़ में सिर्फ एक-एक सांसद पर केस हैं। गुजरात में 25 में से पांच सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा इन मामलों की निगरानी के बावजूद स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आया। कई मामले एक दशक से भी ज्यादा समय से लंबित हैं। अमिकस क्यूरी ने रिपोर्ट में कहा कि कुछ कार्यवाहियां वर्षों से अटकी हुई हैं, जो गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने सुझाव दिया कि सांसदों-विधायकों के मामलों के लिए विशेष अदालतें बनाई जाएं, तीन साल से ज्यादा पुराने मामलों की रोज सुनवाई हो और गैर-हाजरी पर कठोर कार्रवाई की जाए।

यह स्थिति लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। जब कानून बनाने वाले खुद कानूनी उलझनों में फंसे हों, तो जनता का विश्वास कैसे बनेगा? राजनीतिक दलों को उम्मीदवार चयन में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों से बचना चाहिए। चुनावी सुधार, तेज ट्रायल और सख्त कानून की जरूरत है ताकि संसद वास्तव में लोकतंत्र का मंदिर बनी रहे, न कि अपराधियों का गढ़।

रिपोर्ट याद दिलाती है कि आरोप और सजा में फर्क है। कई मामले राजनीतिक प्रतिशोध या पुराने विवादों से जुड़े हो सकते हैं। लेकिन इतनी बड़ी संख्या में लंबित मामले और गंभीर आरोप लोकतंत्र की साख को नुकसान पहुंचाते हैं। सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई जारी रखे हुए है। उम्मीद है कि जल्द प्रभावी कदम उठाए जाएंगे ताकि न्याय की प्रक्रिया तेज हो और जनप्रतिनिधि साफ छवि वाले हों।

भारत जैसे विविध और जीवंत लोकतंत्र में साफ-सुथरी राजनीति ही असली ताकत है। जनता को जागरूक रहना होगा और दलों को जिम्मेदारी लेनी होगी। तभी संसद सही मायनों में जनता का मंदिर बनेगी।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 19 Aug 2026

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