-Friday World 6 Aug 2026
28 फरवरी 2026 को संयुक्त राज्य अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए बड़े पैमाने के हमलों ने मध्य पूर्व की राजनीति को एक बार फिर से आग के गोले में बदल दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद घोषणा की कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई इन हमलों में मारे गए। यह घटना महज एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के नाम पर खुली दादागिरी का प्रदर्शन थी। हजारों बेगुनाह नागरिकों की जान जाने की खबरें आईं, जबकि ट्रंप ने इसे “शांति” और “न्याय” का नाम दिया। अब ट्रंप ईरान को “समझौता करो या सरेंडर करो” की धमकी दे रहे हैं और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अमेरिकी नियंत्रण का दावा ठोक रहे हैं। यह पश्चिमी शक्तियों के उसी पुराने दोहरे चरित्र का प्रमाण है, जिसमें तबाही मचाकर खुद को शांतिदूत और डीलमेकर की तरह पेश किया जाता है।
ईरान एक संप्रभु देश है। उसकी आंतरिक व्यवस्था, नेतृत्व और नीतियां उसकी अपनी जनता और संस्थाओं का विषय हैं। फिर भी अमेरिका और उसके सहयोगी देश बार-बार मध्य पूर्व के मामलों में सीधे हस्तक्षेप करते रहे हैं। 28 फरवरी के हमलों में सैन्य ठिकानों के साथ-साथ नेतृत्व को निशाना बनाया गया। खामेनेई की हत्या की पुष्टि अमेरिकी और इजरायली पक्ष से हुई, और बाद में ईरानी राज्य मीडिया ने भी इसे स्वीकार किया। रेड क्रिसेंट जैसी संस्थाओं ने सैकड़ों मौतों और घायलों की बात कही। ये आंकड़े सिर्फ आंकड़े नहीं हैं—ये परिवारों के टूटे सपने, बच्चों के अनाथ होने और आम नागरिकों की पीड़ा की कहानी हैं। “पिनपॉइंट” बमबारी का दावा करने वाले पक्ष भी स्वीकार करते हैं कि नागरिक इलाके प्रभावित हुए।
ट्रंप का रुख और भी स्पष्ट हो गया जब उन्होंने ईरान को अल्टीमेटम दिया। “अनकंडीशनल सरेंडर” या समझौते की बातें, “लास्ट चांस” की चेतावनियां और होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण का दावा—ये सब साम्राज्यवादी मानसिकता को उजागर करते हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज विश्व के तेल व्यापार के लिए बेहद अहम है। दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल इसी रास्ते से गुजरता है। इस महत्वपूर्ण मार्ग पर किसी एक देश का एकतरफा नियंत्रण थोपना न सिर्फ आर्थिक दबाव है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय कानून और संप्रभुता का उल्लंघन भी है। ट्रंप प्रशासन के बयानों में कभी संयुक्त नियंत्रण की बात आई, कभी धमकियां, कभी “खुला रखो वरना बिजली संयंत्र और तेल सुविधाएं नष्ट कर देंगे” जैसी भाषा। यह कूटनीति नहीं, दबाव की राजनीति है।
एक तरफ अमेरिका मध्य पूर्व को जंग और तबाही की आग में झोंक रहा है, तो दूसरी तरफ खुद उसके घरेलू मोर्चे पर चुनौतियां हैं। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, मुद्रास्फीति का दबाव और आगामी चुनावों का समीकरण—ये सब ट्रंप प्रशासन को प्रभावित करते हैं। तबाही मचाकर “शांतिदूत” बनने का दावा करना पश्चिमी सत्ता के उसी दोहरे चरित्र का हिस्सा है, जो दशकों से देखा जा रहा है। इराक, लीबिया, अफगानिस्तान—इन जगहों पर “मुक्ति” और “लोकतंत्र” के नाम पर किए गए हस्तक्षेपों के नतीजे दुनिया देख चुकी है। अस्थिरता, नागरिक मौतें, शरणार्थी संकट और लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष। ईरान के मामले में भी यही पैटर्न दोहराया जा रहा है।
अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इस घटनाक्रम पर गंभीरता से सोचना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र चार्टर संप्रभुता और गैर-हस्तक्षेप के सिद्धांत पर आधारित है। किसी देश के सर्वोच्च नेता की हत्या और बड़े पैमाने पर सैन्य हमला इन सिद्धांतों के खिलाफ जाता है। अगर शक्तिशाली देश अपनी मर्जी से दूसरे देशों के नेतृत्व को बदलने या उन्हें सरेंडर के लिए मजबूर करने लगें, तो अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था ही ढह जाएगी। छोटे और मझोले देश हमेशा दबाव में रहेंगे। मध्य पूर्व की जटिलता—धार्मिक, जातीय, ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक—को नजरअंदाज करके सिर्फ सैन्य समाधान थोपना समस्या को और जटिल बनाता है।
ईरान की जनता को अपने भविष्य का फैसला खुद करना चाहिए। बाहरी ताकतों द्वारा थोपी गई “आजादी” या “शासन परिवर्तन” अक्सर स्थानीय इच्छाओं के खिलाफ जाता है और लंबे समय तक अस्थिरता पैदा करता है। ट्रंप का यह कहना कि ईरानियों को अपनी सरकार संभाल लेनी चाहिए, एक तरफ से लगता है, लेकिन दूसरी तरफ बमबारी जारी रखने और शर्तें थोपने की नीति उसके विपरीत है। सच्ची शांति दबाव से नहीं, बल्कि सम्मानजनक बातचीत, आपसी हितों की समझ और अंतर्राष्ट्रीय कानून के पालन से आती है।
यह घटनाक्रम वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए भी चेतावनी है। जब शक्तिशाली देश अपनी शर्तें थोपने लगते हैं, तो तेल, गैस, व्यापार मार्ग और रणनीतिक महत्व वाले क्षेत्र सबसे पहले निशाने पर आते हैं। होर्मुज पर नियंत्रण का दावा सिर्फ ईरान के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र और विश्व अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला कदम है। बढ़ती तेल कीमतें अंततः आम उपभोक्ताओं को चपेट में लेती हैं—चाहे वे अमेरिका में हों या एशिया-अफ्रीका में।
ट्रंप प्रशासन का यह रुख पुरानी साम्राज्यवादी परंपरा को आगे बढ़ाता है, जिसमें “शांति” और “सुरक्षा” के नाम पर सैन्य वर्चस्व कायम किया जाता है। एक तरफ खुद को डीलमेकर बताना, दूसरी तरफ अल्टीमेटम और बमबारी—यह दोहरा चरित्र स्पष्ट है। विश्व को इस प्रवृत्ति के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। संप्रभुता का सम्मान, नागरिक जीवन की रक्षा और कूटनीतिक समाधान ही टिकाऊ रास्ता है। तबाही मचाकर शांति का दावा करना न तो नैतिक है और न ही व्यावहारिक। मध्य पूर्व की आग को और भड़काने के बजाय उसे ठंडा करने की जरूरत है। अन्यथा, इसके नतीजे पूरे विश्व को भुगतने पड़ सकते हैं।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 6 Aug 2026
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