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Saturday, 29 August 2026

मिलिट्री हमलों और आर्थिक घेराबंदी के बावजूद ईरान अडिग, समय को अपना सबसे बड़ा हथियार मान रही तेहरान सरकार

मिलिट्री हमलों और आर्थिक घेराबंदी के बावजूद ईरान अडिग, समय को अपना सबसे बड़ा हथियार मान रही तेहरान सरकार
-Friday World 29 Aug 2026
दुनिया की नजरें एक बार फिर मध्य पूर्व पर टिकी हुई हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका और इजरायल की संयुक्त सैन्य कार्रवाई तथा कड़े आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद ईरान अपनी जगह पर मजबूती से कायम है। लगभग छह महीने पहले हुए हमलों में सुप्रीम लीडर को निशाना बनाने और उनके बेटे व संभावित उत्तराधिकारी को घायल करने की कोशिश के बावजूद ईरानी शासन व्यवस्था ढही नहीं है। बल्कि तेहरान अब यह दावा कर रहा है कि समय उसके पक्ष में है।

एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने रॉयटर्स को दिए बयान में कहा कि अमेरिका की मौजूदा रणनीति पुरानी और असफल प्लेबुक का दोहराव मात्र है। अधिकारी के अनुसार चीन जैसे बड़े व्यापारिक भागीदार अमेरिका के हितों की पूर्ति के लिए ईरान के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को अचानक नहीं रोकेंगे। यह बयान उस धारणा को बल देता है जिसमें ईरान अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और क्षेत्रीय प्रभाव को बनाए रखने का दावा कर रहा है।

सऊदी अरब स्थित गल्फ रिसर्च सेंटर के चेयरमैन अब्दुलअज़ीज़ सागर ने भी इसी दिशा में टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि खाड़ी देशों की सरकारों को शक है कि केवल प्रतिबंध और बैन तेहरान के व्यवहार में तेजी से बदलाव ला सकते हैं। ईरान की नेतृत्व क्षमता और अंदरूनी नियंत्रण की मजबूती ऐसे किसी भी दबाव को आसानी से झेलने में सक्षम बताई जा रही है। सागर के अनुसार ईरान की राजनीतिक संरचना और सुरक्षा तंत्र अभी भी काफी हद तक एकजुट नजर आते हैं।

 दबाव के बावजूद टिकी व्यवस्था

ईरान पर लगे सैन्य हमलों और आर्थिक घेराबंदी ने देश की अर्थव्यवस्था को जरूर प्रभावित किया है। तेल निर्यात, बैंकिंग लेन-देन और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रुकावटें आई हैं। फिर भी शासन व्यवस्था ने आंतरिक नियंत्रण बनाए रखा है। सरकार का मानना है कि समय बीतने के साथ अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों में दरारें पड़ेंगी और नई भू-राजनीतिक वास्तविकताएं सामने आएंगी। तेहरान के रणनीतिकारों का तर्क है कि लंबे संघर्ष में धैर्य और अंदरूनी एकजुटता निर्णायक साबित होती है।

विश्लेषकों के अनुसार ईरान इस बात पर भरोसा जता रहा है कि अमेरिका और उसके सहयोगियों की नीतियां लंबे समय तक एक जैसी नहीं रह सकतीं। घरेलू राजनीति, आर्थिक लागत और क्षेत्रीय जटिलताएं किसी भी लंबे अभियान को चुनौतीपूर्ण बना देती हैं। इसीलिए ईरानी नेतृत्व समय को अपना सबसे बड़ा सहयोगी मान रहा है।

क्षेत्रीय और वैश्विक प्रतिक्रिया

खाड़ी देशों में भी इस पूरे घटनाक्रम को लेकर सतर्कता बनी हुई है। कई सरकारें प्रत्यक्ष टकराव से बचते हुए अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों को प्राथमिकता दे रही हैं। चीन जैसे देशों का रुख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक संबंधों के कारण बीजिंग तेहरान के साथ अपने संबंधों को पूरी तरह समाप्त करने के पक्ष में नहीं दिखता। यह स्थिति अमेरिका की रणनीति के लिए अतिरिक्त जटिलता पैदा करती है।

ईरान की अंदरूनी स्थिति को लेकर भी अलग-अलग आकलन हैं। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि दबाव बढ़ने से शासन के भीतर असंतोष बढ़ सकता है, जबकि दूसरे पक्ष का कहना है कि बाहरी खतरे ने राष्ट्रवादी भावनाओं को मजबूत किया है। सुप्रीम लीडर के खिलाफ हमले की कोशिश और उनके परिवार पर हुए हमले ने शासन को एकजुट करने का काम भी किया हो सकता है।

 आगे की राह

फिलहाल ईरान यह संदेश देने की कोशिश में लगा है कि सैन्य बल और आर्थिक प्रतिबंध उसके मूल चरित्र और क्षेत्रीय भूमिका को नहीं बदल सकते। तेहरान का दावा है कि उसकी लीडरशिप मजबूत है और आंतरिक नियंत्रण प्रभावी बना हुआ है। वहीं अमेरिका और इजरायल पक्ष अपनी रणनीति को जारी रखने पर जोर दे रहे हैं।

यह पूरा घटनाक्रम मध्य पूर्व की राजनीति में नई अनिश्चितताएं पैदा कर रहा है। छह महीने बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। ईरान समय के साथ दबाव कम होने की उम्मीद लगाए बैठा है, जबकि विरोधी पक्ष दबाव बनाए रखने की रणनीति पर अडिग है। आने वाले महीने बताएंगे कि धैर्य और दबाव में से कौन जीतता है।

इस बीच भारत जैसे देशों के लिए क्षेत्रीय स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा के मद्देनजर पूरे घटनाक्रम पर नजर रखना जरूरी है। वैश्विक तेल बाजार, व्यापार मार्ग और कूटनीतिक संतुलन—ये सभी इस तनाव से प्रभावित हो सकते हैं।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 29 Aug 2026

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