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Sunday, 23 August 2026

आरक्षण भीख नहीं, बाबा साहेब का दिया संवैधानिक अधिकार है - जंतर-मंतर पर उठी 'आरक्षण हटाओ' की मांग पर गरजे चिराग पासवान

आरक्षण भीख नहीं, बाबा साहेब का दिया संवैधानिक अधिकार है - जंतर-मंतर पर उठी 'आरक्षण हटाओ' की मांग पर गरजे चिराग पासवान
- Friday World 23 Aug 2026
नई दिल्ली/पटना: देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर इन दिनों दो अलग-अलग विचारधाराओं का टकराव देखने को मिल रहा है। एक तरफ 'आरक्षण हटाओ आंदोलन' के बैनर तले सैकड़ों लोग आरक्षण व्यवस्था को खत्म करने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार में मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने इस आंदोलन को सिरे से खारिज करते हुए आरक्षण को भारत के वंचितों का अटूट संवैधानिक अधिकार बताया है।

चिराग पासवान ने बिहार में पत्रकारों से बातचीत में दो टूक कहा, "आरक्षण हमारा अधिकार है, दान में नहीं मिला है। यह कोई दया या किसी की दी हुई भीख नहीं है।"

क्या है पूरा मामला?

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर 'आरक्षण हटाओ आंदोलन' तेजी से वायरल हो रहा है। इस आंदोलन से जुड़े पेज को 5.6 मिलियन से ज्यादा लोग फॉलो कर रहे हैं। इसी के आह्वान पर दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में युवा और विभिन्न संगठनों के लोग एकत्रित हुए।

आंदोलनकारियों की 5 बड़ी मांगें:

1. सरकारी नौकरियों, स्कॉलरशिप और शिक्षा में जाति के बजाय सिर्फ आर्थिक स्थिति को आधार बनाया जाए।
2. उच्च शिक्षण संस्थानों जैसे IIT, IIM, AIIMS में प्रवेश के लिए न्यूनतम अंकों (Minimum Marks Criteria) का सख्ती से पालन हो।
3. OBC आरक्षण में क्रीमी लेयर के नियमों को और अधिक स्पष्ट और पारदर्शी किया जाए।
4. पिछले 80 सालों में आरक्षण से कितना सामाजिक बदलाव आया, इस पर सरकार श्वेत पत्र (White Paper) जारी करे।
5. सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए EWS आरक्षण की सीमा और सुविधाओं को बढ़ाया जाए।

आंदोलनकारियों का तर्क है कि अब देश को जाति आधारित नहीं, बल्कि अर्थ आधारित व्यवस्था की ओर बढ़ना चाहिए ताकि सभी गरीबों को समान अवसर मिल सके।

चिराग पासवान ने दिया करारा जवाब

केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान, जो खुद दलित समुदाय से आते हैं, ने इस आंदोलन पर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि आरक्षण की व्यवस्था को समझे बिना इसे हटाने की बात करना देश की 80 प्रतिशत आबादी की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है।

उन्होंने कहा, "अनुसूचित जाति (SC) की पहचान सिर्फ गरीबी के आधार पर नहीं हुई थी। उनकी पहचान सदियों से चली आ रही अस्पृश्यता और घोर सामाजिक भेदभाव के आधार पर हुई थी। अनुसूचित जनजाति (ST) की अपनी अलग संस्कृति, भाषा और जीवनशैली है जो उन्हें मुख्यधारा से अलग करती थी।"

उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर को याद करते हुए कहा कि बाबा साहेब ने संविधान में आरक्षण का प्रावधान दया दिखाने के लिए नहीं, बल्कि बराबरी का हक देने के लिए किया था। इस प्रावधान को समय-समय पर संसद ने और मजबूत किया है। आज तो उच्च जातियों के गरीबों को भी 10 प्रतिशत EWS आरक्षण दिया जा रहा है, जो इस व्यवस्था के विस्तार का प्रतीक है।

पासवान ने चेतावनी दी कि किसी एक व्यक्ति या समूह के कहने से आरक्षण खत्म नहीं हो सकता। इसके लिए व्यापक संवैधानिक प्रक्रिया और गहन विचार-विमर्श की जरूरत है।

सरकार बातचीत को तैयार

हालांकि, चिराग पासवान ने एक सुलह वाला रुख भी दिखाया। उन्होंने कहा कि अगर आंदोलनकारी अपनी बात लोकतांत्रिक तरीके से और तथ्यों के साथ सरकार के सामने रखते हैं, तो सरकार उनकी बात सुनने और सकारात्मक चर्चा करने के लिए पूरी तरह तैयार है। सूत्रों के मुताबिक, चिराग पासवान व्यक्तिगत रूप से इस आंदोलन के प्रतिनिधियों से मिलकर उनकी शंकाओं को दूर कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि आरक्षण को लेकर कोई भी गलतफहमी देश में सामाजिक तनाव पैदा कर सकती है, इसलिए सरकार नहीं चाहती कि कोई भी वर्ग खुद को उपेक्षित महसूस करे।

अधिकार बनाम समानता की बहस

यह पूरा विवाद फिर से वही पुराना सवाल खड़ा करता है - क्या भारत को जाति-आधारित आरक्षण की जरूरत है या आर्थिक-आधारित आरक्षण की? एक पक्ष इसे सामाजिक न्याय का आधार मानता है, तो दूसरा इसे मेरिट के खिलाफ मानता है। लेकिन फिलहाल केंद्र सरकार और उसके सहयोगी दलों का स्टैंड साफ है - आरक्षण था, है और रहेगा। यह बाबा साहेब का दिया हुआ वह अधिकार है जो दान में नहीं मिला।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 23 Aug 2026

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