- Friday World 22 Aug 2026
जुलाई-अगस्त 2026 में भारत के दस से अधिक राज्यों और पच्चीस से ज्यादा जिलों में स्कूल के बच्चे सड़कों पर उतर आए। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, बिहार, पंजाब और अन्य जगहों पर छात्र-छात्राओं ने न कोई आधुनिक लैब, न स्मार्ट क्लासरूम की मांग की। उनकी मांगें बेहद बुनियादी थीं—पर्याप्त शिक्षक, बिजली, पंखे, साफ पीने का पानी, शौचालय, सुरक्षित भवन और सड़क। बिहार के गया जिले में सिमुआरा मिडिल स्कूल के बच्चों ने चार किलोमीटर पैदल चलकर एसडीएम कार्यालय पहुंचकर अपनी शिकायतें रखीं। राजस्थान के अलवर में स्कूल की छत का हिस्सा गिरने के बाद सुरक्षा को लेकर विरोध हुआ। ये प्रदर्शन महज स्थानीय घटनाएं नहीं, बल्कि देश की स्कूल व्यवस्था की गहरी दरार को उजागर करने वाले संकेत हैं।
शिक्षा मंत्रालय की यूडीआईएसई+ (UDISE+) 2025-26 रिपोर्ट में राष्ट्रीय स्तर पर काफी सुधार दिखाया गया है। देशभर में करीब 14.67 लाख स्कूलों में बिजली की उपलब्धता 95 प्रतिशत, पीने का पानी 99.5 प्रतिशत और लड़कियों के शौचालय 98.5 प्रतिशत स्कूलों में उपलब्ध बताए गए हैं। ये आंकड़े सुनने में सुखद लगते हैं। लेकिन इन्हीं आंकड़ों के पीछे राज्यों के बीच का भारी अंतर और जमीनी हकीकत छिपी हुई है। तमिलनाडु में बिजली की सुविधा 100 प्रतिशत और केरल में 99.8-99.9 प्रतिशत है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा करीब 88.8 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में कार्यात्मक बिजली करीब 90.7 प्रतिशत के आसपास है। स्वच्छ शौचालयों के मामले में भी राजस्थान और मध्य प्रदेश राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे हैं। रिपोर्ट में कंप्यूटर 69.9 प्रतिशत और इंटरनेट 67.4 प्रतिशत स्कूलों में उपलब्ध बताए गए हैं, लेकिन कई जगहों पर बिजली ही नहीं तो डिजिटल शिक्षा कैसे संभव?
सबसे चिंताजनक आंकड़ा शिक्षकों की भारी कमी का है। यूडीआईएसई+ 2025-26 के अनुसार देश में अभी भी 1,00,843 स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के सहारे चल रहे हैं। आंध्र प्रदेश में सबसे अधिक 16,357 ऐसे स्कूल हैं, उसके बाद झारखंड, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल का नंबर आता है। इन सात राज्यों में लगभग 65 प्रतिशत सिंगल-टीचर स्कूल हैं। राजस्थान के जालोर में 150 छात्रों के बीच मात्र एक शिक्षक होने की खबर आई। महाराष्ट्र में छात्र शिक्षकों की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे। गणित और विज्ञान जैसे महत्वपूर्ण विषयों के शिक्षक वर्षों से नहीं होने से छात्रों का भविष्य प्रभावित हो रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर प्यूपिल-टीचर रेशियो (PTR) एनईपी 2020 के मानकों के भीतर दिखता है, लेकिन स्थानीय असंतुलन इतना गहरा है कि औसत आंकड़े सच्चाई छिपा लेते हैं।
राइट टू एजुकेशन (आरटीई) अधिनियम, 2009 के तहत हर बच्चे को सुरक्षित भवन, पीने का पानी और अलग शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं कानूनी अधिकार हैं। संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकार कन्वेंशन में भी पौष्टिक आहार और शुद्ध पानी का उल्लेख है। फिर भी सरकारी दस्तावेजों में दर्ज सुधार और स्कूलों की वास्तविक स्थिति के बीच बड़ा फासला है। कई स्कूलों में बिजली का कनेक्शन तो है, लेकिन बिल न भरने, तार खराब होने या ट्रांसफॉर्मर खराब होने से बिजली कार्यात्मक नहीं। शौचालय बने हैं लेकिन साफ नहीं रखे जाते। पानी का हैंडपंप टूटा पड़ा है। मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता खराब है। ये शिकायतें उत्तर प्रदेश के फतेहपुर, बिहार के गया, राजस्थान के बाड़मेर-जालोर-अलवर और मध्य प्रदेश-महाराष्ट्र के कई स्कूलों से बार-बार सामने आईं।
समस्या सिर्फ सुविधाओं की नहीं, बल्कि व्यवस्था की है। डेटा स्कूल प्रमुखों द्वारा भरा जाता है। कई बार नौकरी खोने के डर से सच्चाई नहीं लिखी जाती। परिणामस्वरूप कागजों पर सुधार दिखता है, लेकिन बच्चे रोजमर्रा की परेशानियों से जूझते रहते हैं। सिंगल-टीचर स्कूलों में एक शिक्षक को कई कक्षाएं, प्रशासनिक काम और मिड-डे मील प्रबंधन सब संभालना पड़ता है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे संभव? ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में यह समस्या और गंभीर है। दक्षिणी राज्यों में बेहतर प्रदर्शन और उत्तरी-मध्य राज्यों में पिछड़ापन क्षेत्रीय असमानता को रेखांकित करता है।
ये विरोध प्रदर्शन बच्चों की जागरूकता और हताशा दोनों को दर्शाते हैं। वे आधुनिक सुविधाएं नहीं, बस उतनी सुविधाएं मांग रहे हैं जितनी आरटीई कानून में वादा की गई हैं। अगर बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होंगी तो ड्रॉपआउट बढ़ेगा, सीखने का स्तर गिरेगा और एनईपी 2020 के लक्ष्य दूर होते जाएंगे। सरकार को सिर्फ आंकड़े जारी करने से आगे बढ़ना होगा। शिक्षक भर्ती को तेज करना, रिक्त पदों को भरना, मौजूदा सुविधाओं के रखरखाव पर जोर देना और जमीनी निगरानी बढ़ाना जरूरी है। स्थानीय प्रशासन को बच्चों की शिकायतों को गंभीरता से लेना चाहिए, न कि सिर्फ जांच टीम भेजकर काम चला लेना।
शिक्षा किसी भी देश की रीढ़ होती है। जब बच्चे खुद सड़क पर उतरकर पानी, शौचालय और शिक्षक मांगने लगें तो यह व्यवस्था की नाकामी का सबसे बड़ा प्रमाण है। यूडीआईएसई+ रिपोर्ट सुधार की दिशा दिखाती है, लेकिन बच्चों के प्रदर्शन याद दिलाते हैं कि कागजी आंकड़े पर्याप्त नहीं। जमीनी हकीकत बदलनी होगी। तभी देश का भविष्य सुरक्षित हो सकेगा। हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार है—और यह अधिकार कागजों में नहीं, स्कूलों की दीवारों, कक्षाओं और शिक्षकों की उपस्थिति में साकार होना चाहिए।
सरकार, प्रशासन, शिक्षक और समाज सभी को मिलकर इस अंतर को पाटना होगा। बच्चों का गुस्सा सही दिशा में सुना जाए तो यह संकट अवसर बन सकता है। अन्यथा ये प्रदर्शन और बढ़ेंगे, और देश की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल और गहरे होते जाएंगे।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 22 Aug 2026
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