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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Thursday, 10 September 2026

बगदाद से 17 KM दूर धू-धू कर जला सद्दाम का सपना - जब इजरायल ने 2000 KM जाकर उड़ा दिया इराक का परमाणु रिएक्टर!

बगदाद से 17 KM दूर धू-धू कर जला सद्दाम का सपना - जब इजरायल ने 2000 KM जाकर उड़ा दिया इराक का परमाणु रिएक्टर!
-Friday World September 10,2026
1979 के बाद इजरायल ने राहत की सांस ली थी।

मिस्र के साथ शांति समझौते के बाद अरब दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य प्रतिद्वंद्वी शांत हो गया था। लेकिन उसी वक्त बगदाद में एक नया खतरा पनप रहा था। सत्ता पर सद्दाम हुसैन काबिज थे और फ्रांस की मदद से इराक अपना परमाणु कार्यक्रम तेजी से बना रहा था।

बगदाद से लगभग 17 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में ओसिराक (Osirak) नाम का परमाणु रिएक्टर बन रहा था। इराक में इसे तम्मूज-1 कहा जाता था। इराक और फ्रांस का कहना था कि ये सिर्फ शांतिपूर्ण अनुसंधान के लिए है। लेकिन तेल अवीव को इस पर जरा भी भरोसा नहीं था।

इजरायल की सोच साफ थी - किसी भी दुश्मन को वो क्षमता हासिल नहीं करने देंगे जो भविष्य में इजरायल के अस्तित्व के लिए खतरा बन जाए।

पहले कूटनीति, फिर खुफिया नजर

इजरायल ने पहले फ्रांस और बाकी देशों के सामने अपनी चिंता रखी। खुफिया एजेंसी मोसाद रिएक्टर की हर ईंट पर नजर रखे हुए थी। लेकिन समय निकल रहा था। इजरायली नेतृत्व जानता था कि एक बार रिएक्टर एक्टिव हो गया और उसमें परमाणु सामग्री आ गई, तो उस पर हमला करने का मतलब होगा पूरे इलाके में रेडिएशन फैलना।

इसलिए फैसला लिया गया - रिएक्टर के एक्टिव होने से पहले ही उसे खत्म करना है।

7 जून 1981 - 2000 KM का सबसे खतरनाक मिशन

और फिर वो दिन आया जिसकी दुनिया को उम्मीद नहीं थी। 7 जून 1981 को इजरायली वायुसेना के 8 एफ-16 लड़ाकू विमान, 6 एफ-15 विमानों की सुरक्षा में इराक के लिए रवाना हुए।

इजरायल से इराक तक करीब 2000 किलोमीटर की दूरी। जॉर्डन और सऊदी अरब के रडार से बचते हुए, बेहद कम ऊंचाई पर उड़ान। ईंधन खत्म होने का खतरा और वापस लौटने की गारंटी नहीं।

शाम होते-होते विमान बगदाद के पास ओसिराक पहुंच गए। कुछ ही मिनटों में एफ-16 ने बम गिराए और पूरा रिएक्टर बुरी तरह तबाह हो गया। सभी 14 विमान सुरक्षित वापस लौट आए। हमले में वहां काम कर रहा एक फ्रांसीसी टेक्नीशियन मारा गया। इजरायल ने इस मिशन को नाम दिया - ऑपरेशन ओपेरा।

दुनिया आग-बबूला, इजरायल कायम

इजरायल में इसे भविष्य के परमाणु खतरे को रोकने वाली कार्रवाई माना गया। लेकिन दुनिया भर में प्रतिक्रिया उल्टी थी। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव 487 पारित कर इजरायल की कड़ी निंदा की। यहां तक कि अमेरिका ने भी उस वक्त इजरायल की आलोचना की और कुछ सैन्य मदद रोक दी।

लेकिन प्रधानमंत्री मेनाखेम बेगिन अड़े रहे। उन्होंने कहा - इजरायल किसी शत्रु देश को परमाणु हथियार तक पहुंचने नहीं देगा। यहीं से जन्म हुआ उस सिद्धांत का जिसे आज “बेगिन डॉक्ट्रिन” कहा जाता है।

सद्दाम हुसैन ने क्या किया?

ये सबसे अहम सवाल है। रिएक्टर तबाह हो चुका था और सद्दाम पहले से ईरान के साथ खूनी जंग में उलझा था। उसने तुरंत इजरायल पर कोई बड़ा हमला नहीं किया।

उसने इस हमले को मौके में बदल दिया।

पहला - उसने दुनिया भर में इजरायल के खिलाफ सहानुभूति बटोरी। UN में निंदा प्रस्ताव का समर्थन लिया और अरब देशों को एकजुट करने की कोशिश की।

दूसरा - 23 जून 1981 को अपने पहले बड़े भाषण में सद्दाम ने दुनिया के “शांतिप्रिय देशों” से अरब देशों को परमाणु हथियार हासिल करने में मदद करने की अपील की। उसने कहा कि जब इजरायल के पास परमाणु बम है तो अरबों को भी चाहिए।

तीसरा - उसने इस इजरायल-विरोधी लहर का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ जंग में अरब देशों का समर्थन लेने के लिए किया।

अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने तब लिखा था कि सद्दाम के इस बयानबाजी के बाद कई देश इराक को परमाणु तकनीक देने से और डरने लगे।

विडंबना देखिए - इजरायल ने रिएक्टर रोकने के लिए मारा था, लेकिन उसी हमले ने सद्दाम और पूरे अरब जगत में ये भावना और पक्की कर दी कि इजरायल का मुकाबला करने के लिए रणनीतिक हथियार जरूरी हैं। बाद में पता चला कि ओसिराक तो सद्दाम के परमाणु सपने का सिर्फ एक हिस्सा था, उसका असली प्रोग्राम तो और भी गुप्त और बड़ा था।

एक हमले ने बदल दी रणनीति

7 जून 1981 का ऑपरेशन ओपेरा सिर्फ एक बमबारी नहीं थी। इसने दुनिया को संदेश दिया कि इजरायल अपने दुश्मन को परमाणु ताकत बनने से पहले ही रोक देगा। यही सोच आगे चलकर 2007 में सीरिया के रिएक्टर पर हमले और ईरान के खिलाफ नीति की बुनियाद बनी।

लेकिन ये कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। अगले ही साल 1982 में इजरायल एक नए मोर्चे पर कूदने वाला था - इस बार इराक नहीं, लेबनान।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World September 10,2026 

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