-Friday World September 10,2026
यमन के बड़े हिस्से, ख़ास तौर पर लाल सागर के साहिली इलाकों पर सऊदी अरब के भाड़े के सैनिकों का कब्ज़ा था। हवाई हमले, नाकाबंदी और अरबों डॉलर के हथियारों के बावजूद यमनी अवाम झुका नहीं। और अब बाज़ी पलट गई है।
यमन के अंसारल्लाह आंदोलन ने ऐलान किया है कि यमन की सरज़मीन को सऊदी और यूएई के कब्ज़े से पूरी तरह खाली कराया जाएगा। ये सिर्फ एक बयान नहीं, जमीन पर होता हुआ ऑपरेशन है।
बमबारी के बीच ज़मीनी जीत
सऊदी फाइटर जेट्स लगातार बमबारी कर रहे हैं। आसमान से आग बरसाई जा रही है ताकि आगे बढ़ती यमनी फौज को रोका जा सके। लेकिन यमनी फौज और जन-प्रतिरोध ने इन बमों के साये में भी अपनी बढ़त जारी रखी है। सऊदी समर्थित किराए की फौजें जो कभी खुद को अजेय समझती थीं, आज मैदान छोड़ कर भाग रही हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक हजारों भाड़े के सैनिकों ने या तो हथियार डाल दिए हैं या अपने मोर्चे खाली करके फरार हो गए हैं। उनके पास न कोई मकसद था, न वतन की मोहब्बत - सिर्फ पैसे के लिए लड़ी जा रही जंग आखिर कब तक टिकती।
हैस से मोखा तक - 1500 किमी की ऐतिहासिक वापसी
इस पूरे अभियान की सबसे बड़ी खबर हैस से शुरू हुई। अंसारल्लाह के जवानों ने हैस को आजाद कराया और फिर तूफान की तरह मोखा (Mocha) तक पहुंच गए। सिर्फ पिछले 24 घंटों में लगभग 1500 वर्ग किलोमीटर का इलाका सऊदी गठबंधन से वापस छीन लिया गया है। ये यमन के हालिया इतिहास की सबसे तेज़ ज़मीनी कामयाबियों में से एक है।
सामरिक तौर पर अंसारल्लाह ने जुबाब की तरफ का रास्ता जानबूझकर खुला रखा है। ये जंगी चाल है - ताकि घिरे हुए सऊदी समर्थित सैनिकों को निकलने का मौका दिया जाए और बेवजह खून-खराबा टाला जा सके। ये इस बात का सबूत है कि अंसारल्लाह सिर्फ जंग नहीं, जंग के उसूल भी जानता है।
अब नजर जिजान, नजरान और असीर पर
जैसे ही साहिली इलाके पूरी तरह से आजाद हो जाएंगे, अगला पड़ाव साफ है। यमन की नज़र अब उन तीन सूबों पर है - जिजान, नजरान और असीर। ये वो ऐतिहासिक यमनी इलाके हैं जिन पर 1930 में ब्रिटिश साम्राज्य की मदद से आले सऊद ने कब्ज़ा कर लिया था। दशकों से यमनी अवाम इसे अपना छीना हुआ हक मानती है।
अब जब लाल सागर का किनारा आजाद हो रहा है, तो ये मांग फिर से ज़ोर पकड़ रही है कि इन इलाकों को भी वापस लिया जाए।
आले सऊद के पास दो ही रास्ते
आज आले सऊद हुकूमत एक दोराहे पर खड़ी है। पहला रास्ता - 2022 में यमन के साथ जो समझौता किया था, उसे शराफत से मान ले, जंग बंद करे और यमन की संप्रभुता का एहतराम करे।
दूसरा रास्ता - अगर वो इसी जिद पर अड़ा रहा, तो उसे अपनी हुकूमत छोड़ कर भागने के लिए तैयार रहना चाहिए। क्योंकि वक्त बदल चुका है।
अमेरिका, जो हमेशा सऊदी की ढाल बनता था, आज खुद ईरान के साथ सीधे टकराव में बुरी तरह फंसा हुआ है। वो अब रियाद को बचाने की हालत में नहीं है। पैसे से खरीदी गई फौजें मैदान में नहीं टिकतीं, और बमों से कौमों का हौसला नहीं टूटता - यमन ने ये साबित कर दिया है।
ये सिर्फ एक जंग की खबर नहीं, ये एक पैगाम है कि जब कोई कौम अपने वतन के लिए उठ खड़ी होती है, तो बड़ी से बड़ी ताकतें भी उसे रोक नहीं सकतीं।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World September 10,2026
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